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वारिस

varis

मोहन राकेश

और अधिकमोहन राकेश

    घड़ी में तीन बजते ही सीढ़ियों पर लाठी की खट्‌-खट्‌ होने लगती और मास्टर जी अपने गेरुआ बाने में ऊपर आते दिखाई देते। खट्‌-खट्‌ आवाज़ सुनते ही हम भागकर बैठक में पहुँच जाते और अपनी कापियाँ और किताबें ठीक करते हुए ड्योढ़ी की तरफ़ देखने लगते, घड़ी तीन बजा चुकी होती, तो उनके ऊपर पहुँचते-पहुँचते बजा देती। मैं बहन के कान के पास मुँह ले जाकर, कहता, “एक-दो-तीन...।”

    और मास्टर जी बैठक में पहुँच जाते। अगर घड़ी उनके वहाँ पहुँचने से दो-तीन मिनट पहले तीन बजा चुकी होती, तो वे उस पर शिकायत की एक नज़र डालते, भरकर रखे हुए गिलास में से दो घूँट पानी पीते और पढ़ाने बैठ जाते। मगर बैठकर भी दो-एक बार उनकी नज़र ऊपर हमारी दीवार-घड़ी की तरफ़ उठती, फिर अपने हाथ पर लगी हुई बड़े गोल डायल की पुरानी पीली-सी घड़ी पर पड़ती और वे 'हूं' या 'त्वत्' की आवाज़ से अपना असंतोष प्रकट करते—जाने अपने प्रति, अपनी घड़ी के प्रति या हमारी घड़ी के प्रति।

    हमें मैद्रिक की परीक्षा देनी थी और वे हमें पढ़ाने के लिए आते थे। बहन मुझसे एक साल बड़ी थी, मगर उसने उसी साल ए, बी, सी, से अँग्रेज़ी सीखी थी। मैं भी अँग्रेज़ी इतनी ही जानता था कि बिना हिचकिचाहट के 'वंडरफुल' के ये हिज्जे बता देता था—डब्लू एन्, डो आर, एफ यू डबल एल—वंडरफुल। मास्टर जी कविता बहुत उत्साह के साथ पढ़ाते थे। वे टेनीसन, ब्राउनिंग और स्काट की पंक्तियों की व्याख्या करते हुए जैसे कहीं और ही पहुँच जाते थे। उनकी आँखें चमकने लगती थीं और दोनों हाथ हिलने लगते थे। भाषा उनके मुँह से ऐसी निकलती थी जैसे ख़ुद कविता कर रहे हों। मुझे कई बार कविता की पंक्ति तो समझ में जाती थी, उनकी व्याख्या समझ में नहीं आती। मैं मेज़ के नीचे से बहन के टखनों पर ठोकर मारने लगता। ऊपर से चेहरा गंभीर बनाए रहता। ठोकर मारना इसलिए ज़रूरी था कि अगर मैं उसे ध्यान से पढ़ने देता, तो वह बीच में मास्टर जी से कोई सवाल पूछ लेती थी जिससे ज़ाहिर होता था कि बात उसकी समझ में रही है, और इस तरह अपनी हतक होती थी।

    कविता पढ़ाकर मास्टर जी हमसे अनुवाद कराते। अनुवाद के 'पैसेज' वे किसी किताब में से नहीं देते थे, जबानी लिखाते थे। उनमें कई बड़े-बड़े शब्द होते जो अपनी समझ में ही आते। वे लिखाते :

    “भावना जीवन की हरियाली है। भावना-विहीन जीवन एक मरुस्थल है जहाँ कोई अंकुर नहीं फूटता।”

    हम पहले उनसे भावना की अँग्रेज़ी पूछते, फिर अनुवाद करते :

    “सेण्टीमेण्ट इज़ लाइफ़'स् वेजीटेबल। सेण्टीमेण्टलेस लाइफ़ इज़ डेजर्ट व्हेयर ग्रास डज़ नाट ग्रो।”

    बहन संशोधन करती कि 'डज़ नाट ग्रो' नहीं 'डू नाट ग्रो' होना चाहिए, ग्रास 'सिंगुलर' नहीं 'प्लूरल' है। मैं उसके हाथ पर मुक्का मार देता कि कल ए-बी-सी सीखनेवाली लड़की आज मेरी अँग्रेज़ी दुरुस्त करती है। वह मेरे बाल पकड़ लेती कि एक साल छोटा होकर यह लड़का बड़ी बहन के हाथ पर मुक्का मारता है! मगर जब मास्टर जी फैसला कर देते कि 'डू नाट ग्रो' नहीं 'डज़ नाट ग्रो” ठीक है, तो मैं अपने अँग्रेज़ी की शान पर फूल उठता और बहन का चेहरा लटक जाता हालाँकि मारपीट के मामले में डाँट मुझी को पड़ती।

    मास्टर जी के आने का समय जितना निश्चित था, जाने का समय उतना ही अनिश्चित था। वे कभी डेढ़ घंटा और कभी दो घंटे पढ़ाते रहते थे। पढ़ते-पढ़ते पाँच बजने को जाते तो मेरे लिए 'नाउन' और 'एडजेक्टिव' में फ़र्क करना मुश्किल हो जाता। मैं जम्हाइयाँ लेता और बार-बार ऊबकर घड़ी की तरफ़ देखता। मगर मास्टर जी उस समय ‘पास्ट पार्टीसिपल’ और ‘परफेक्ट पार्टीसिपल’ जैसी चीज़ों के बारे में जाने क्या-क्या बता रहे होते। पढ़ाई हो चुकने के बाद वे दस मिनट हमें जीवन के संबंध में शिक्षा दिया करते थे। वे दस मिनट बिताना मुझे सबसे मुश्किल लगता था। वे पानी के छोटे-छोटे घूँट भरते और जोश में आकर सुंदर और असुंदर के विषय में जाने क्या कह रहे होते, और मैं अपनी कापी घुटनों पर रखे हुए उसमें लिखने लगता :

    सुंदर मुन्दरियो, हो!

    तेरा कौन बिचारा, हो!

    दुल्ला भट्टीवाला, हो!

    बहन का ध्यान भी मेरी कापी पर होता क्योंकि वह आँख के इशारे से मुझे यह सब करने से मना करती। कभी वह इशारे से धमकी देती कि मास्टर जी से मेरी शिकायत कर देगी। मैं आँखों-ही-आँखों से उसकी ख़ुशामद कर लेता। जब मास्टर जी का सबक ख़त्म होता ओर उनकी कुर्सी 'च्याँ' की आवाज़ करती हुई पीछे को हटती, तो मेरा दिल ख़ुशी से उछलने लगता। सीढ़ियों पर खट्‌-खट्‌ की आवाज़ समाप्त होने से पहले ही मैं पतंग और डोर लिए हुए ऊपर कोठे पर पहुँच जाता और 'आ बोऽऽ काटा काटाऽऽ ईऽऽबोऽऽ!' का नारा लगा देता।

    मास्टर जी के बारे में हम ज़्यादा नहीं जानते थे—यहाँ तक कि उनके नाम का भी हमें नहीं पता था। एक दिन अचानक ही वे पिताजी के पास बैठक में पहुँचे थे। उन्होंने कहा था कि एक भी पैसा होने से वे बहुत तंगी में हैं मगर वे किसी से ख़ैरात नहीं लेना चाहते, काम करके रोटी खाना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बी. एल. किया है और बच्चों को बंगला और पंजाबी पढ़ा सकते हैं। पिताजी हम दोनों की अँग्रेज़ी की योग्यता से पहले ही आतंकित थे, इसलिए उन्होंने उसी समय से उन्हें हमें पढ़ाने के लिए रख लिया। कुछ दिनों बाद वे उन्हें और ट्यूशन दिलाने लगे, तो मास्टर जी ने मना कर दिया। वे हमारे घर से थोड़ी दूर एक गंदी-सी गली में चार रुपए महीने की एक कोठरी लेकर रहने लगे थे। यह वे पूछने पर भी नहीं बताते थे कि बी. एल. करने के बाद उन्होंने प्रेक्टिस क्यों नहीं की और घर-बार छोड़कर गेरुआ क्यों धारण कर लिया। वे बस उत्तेजित-से पढ़ाने आते, और उसी तरह उत्तेजित-से उठकर चले जाते।

    एक दिन घड़ी ने तीन बजाये तो हम लोग रोज़ की तरह भागकर बैठक में पहुँच गए और दम साधकर अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ गए। मगर काफ़ी समय गुज़र जाने पर भी सीढ़ियों पर खट्‌-अट्‌ की आवाज़ सुनाई नहीं दी। एक मिनट, दो मिनट, दस मिनट। हम लोगों को हैरानी हुई—मुझे ख़ुशी भी हुई। चार महीने में मास्टर जी ने पहली बार छुट्टी की थी। इस ख़ुशी में मैं अँग्रेज़ी की कापी में थोड़ी ड्राइंग करने लगा बहन से 'बी' और 'एफ्‌' हमेशा एक-से लिखे जाते थे—वह उनके अंतर को पकाने लगी। मगर यह ख़ुशी ज़्यादा देर रही। सहसा सीढ़ियों पर खट्‌-खट्‌ सुनाई देने लगी, जिससे हम चौंक गए और निराश भी हुए। मास्टर जी अपने रोज़ के कपड़ों के ऊपर एक मोटा गेरुआ कंबल लिए बैठक में पहुँच गए। मैंने उन्हें देखते ही अपनी बनाई हुई ड्राइंग फाड़ दी। वे हाँफते-से आकर आराम-कुर्सी पर बैठ बए और दो घूँट पानी पीने के बाद 'पोयट्री' की किताब खोलकर पढ़ाने लगे :

    “टेल मी नाट इन मोर्नफुल नंबर्ज

    लाइफ़ इज़ बट ऐन एम्प्टी ड्रीम...”

    मैंने देखा, उनका सारा चेहरा एक बार पसीने से भीग गया और वे सिर से पैर तक काँप गए। कुछ देर वे चूप रहे। फिर उन्होंने गिलास को छुआ, मगर उठाया नहीं। उनका सिर झुककर बाँहों में गया और कुछ देर वहीं पड़ा रहा। उस समय मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सामने सिर्फ़ कंबल में लिपटी हुई एक गाँठ ही पड़ी हो। जब उन्होंने चेहरा उठाया, तो मुझे उनकी नाक और आँखों के बीच की झुर्रियाँ बहुत गहरी लगीं। उनकी आँखें झपतीं और कुछ देर बंद ही रहतीं, फिर जैसे प्रयत्न से खुलतीं। वे होंठों पर जबान फेरकर फिर पढ़ाने लगते :

    “फार सोल इज़ डेड दैट स्लंबर्ज़,

    एंड थिंग्ज़ आर नाट वाट दे सीम।”

    मगर उसके साथ उनका सिर फिर झुक जाता। मैंने डरी हुई-सी नज़र से बहन की तरफ़ देखा।

    “मास्टर जी, आज आपकी तबीयत ठीक नहीं है, बहन ने कहा, “आज हम और नहीं पढ़ेंगे।”

    नहीं पढ़ेंगे—यह सुनकर मेरे दिल में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। मगर उस हिलती हुई गठरी को देखकर डर भी लग रहा था। मास्टर जी ने आँखें उठाईं और धीरे-से कुछ कहा। फिर उन्होंने पुस्तक की तरफ़ हाथ बढ़ाया, तो बहन ने पुस्तक खींच ली। कुछ देर मास्टर जी हम लोगों की तरफ़ देखते रहे—जैसे हम उनसे बहुत दूर बैठे हों और वे हमें ठीक से पहचान पा रहे हों। फिर एक लंबी साँस लेकर चलने के लिए उठ खड़े हुए।

    पूरे चार सप्ताह वे टाइफाइड में पड़े रहे।

    उन दिनों मेरी ड्यूटी लगाई गई कि मैं कोठरी में जाकर उन्हें सूप वगैरह दे आया करूँ। वैद्य जी के पास जाकर उनकी दवाई-अवाई भी मुझे ही लानी होती थी। मेरा काफ़ी समय उनकी कोठरी में बीतता। वे अपने कंबल में लिपटकर चारपाई पर लेटे हुए 'हाय-हाय' करते रहते और मैं ऊपर-नीचे होते हुए कंबल के रोयों को देखता रहता। कभी मिट्टी के फ़र्श पर या स्याह पड़ी हुई दीवारों पर उँगली से तस्वीरें बनाने लगता। कोठरी निहायत बोसीदा थी और उसमें चारों तरफ़ से पुरानी सीलन की गंध आती थी। दीवारों का पलस्तर जगह-जगह से उखड़ गया था और कुछ जगह उखड़ने की तैयारी में इंटों से आगे को उभर आया था। मुझे उस पलस्तर में तरह-तरह के चेहरे नज़र आते। पलस्तर का कोई टुकड़ा झड़-कर खप से नीचे गिरता, तो मैं ऐसे चौंक जाता जैसे मेरी आँखों के सामने किसी मुर्दा चीज़ में जान गई हो। कभी मैं उठकर खिड़की के पास चला जाता। खिड़की में सलाखों की जगह बाँस के टुकड़े लगे थे। गली से उठती हुई भयानक दुर्गंध से दिमाग़ फटने लगता। वह गली जैसे शहर का कूड़ा-घर थी। एक मुर्गा गली के कूड़े को अपने पैरों से बिखेरता रहता और हर आठ-दस मिनट के बाद जोर से बाँग दे देता।

    मास्टर जी के पास ज़्यादा सामान नहीं था, पर जो कुछ भी था उसे देखने को मेरे मन में बहुत उत्सुकता रहती थी। एक दिन जब थोड़ी देर के लिए मास्टर जी की आँख लगी, तो मैंने कोठरी के सारे सामान की जाँच कर डाली। कपड़ों के नाम पर वही चंद चीथड़े थे जो हम उनके शरीर पर देखा करते थे! डंडे और कमण्डल के अतिरिक्त उनकी संपत्ति में कुछ पुरानी फटी हुई पुस्तकें थीं जिनमें से केवल भगवदगीता का शीर्षक ही मैं पढ़ सका। शेष पुस्तकें बंगला में थीं। एक पुस्तक के बीच में एक लिफ़ाफ़ा रखा था जिस पर सात साल पहले की हावड़ा और मिदनापुर की मोहरें लगी थीं। मैंने डरते-डरते लिफ़ाफ़े में से पत्र निकाल लिया। यह भी बंगला में था। बीच में कोई-कोई शब्द अँग्रेज़ी का था—स्टैंडर्ड मीन्ज़... ओवरकान्फिडेंस...डिस्गस्टिंग…हेल...। मैंने जल्दी से पत्र वापस लिफ़ाफ़े में रख दिया। पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ पुराने और नए फुलस्केप काग़ज़ थे जिनपर बंगला और अँग्रेज़ी में बहुत कुछ लिखा हुआ था। वे काग़ज़ अभी मेरे हाथों में ही थे कि मास्टर जी की आँख खुल गई और वे खाँसते हुए उठकर बैठ गए। मैं काँपते हुए हाथों से काग़ज़ रखने लगा तो वे पहले मुस्कराए और फिर हँसने लगे।

    “इन्हें इधर ले आओ”, वे बोले।

    मैं अपराधी की तरह काग़ज़ लिए हुए उनके पास चला गया। उन्होंने काग़ज़ मुझसे ले लिए और मुझे पास बिठाकर मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगे।

    “जानते हो, इन काग़ज़ों में क्या है?” उन्होंने बुखार के कारण कमज़ोर आवाज़ में पूछा।

    “नहीं।” मैंने सिर हिलाया।

    “यह मेरी सारी ज़िंदगी की पूँजी है”, उन्होंने कहा ओर उन काग़ज़ों को छाती पर रखे हुए लेट गए। लेटे-लेटे कुछ देर उन्हें उथल-पुथलकर देखते रहे, फिर उन्होंने उन्हें अपनी दाईं ओर रख लिया। कुछ देर वे अपने में खोए रहे और जाने क्या सोचते रहे। फिर बोले, “बच्चे, जानते हो, मनुष्य जीवित क्यों रहना चाहता है?”

    मैंने सिर हिला दिया कि नहीं जानता।

    “अच्छा, मैं तुम्हें बताऊँगा कि मनुष्य क्यों जीवित रहना चाहता है और कैसे जीवित रहता है। मैं तुम्हें और भी बहुत कुछ बताना चाहता हूँ, मगर अभी तुम छोटे हो। जरा बड़े होते तो...। ख़ैर...अब भी जो कुछ बता सकता हूँ, ज़रूर बताऊँगा। तुम मेरे लिए मेरे अपने बच्चे की तरह हो...तुम दोनों...दोनों ही मेरे बच्चे हो।''

    उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरा दिल बैठने लगा कि वे जो कुछ बताना चाहते हैं, उसी समय बताने लगें क्योंकि मैं जानता था कि वे जो कुछ भी बताएँगे वह ऐसी मुश्किल बात होगी कि मेरी समझ में नहीं आएगी। समझने की कोशिश करूँगा, तो कई मुश्किल शब्दों के अर्थ सीखने पड़ेंगे। मेरा अनुभव कहता था कि शब्द ख़ुद जितना मुश्किल होता है, उसके हिज्जे उससे भी ज़्यादा मुश्किल होते हैं। हिज्जों से मैं बहुत घबराता था।

    मगर उस समय उन्होंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ मेरा हाथ पकड़कर लेटे रहे।

    अच्छे होकर जब वे हमें फिर पढ़ाने आने लगे, तो उन्होंने कहा कि अब से वे अँग्रेज़ी के अतिरिक्त हमें थोड़ी-थोड़ी बंगला भी सिखाएँगे क्योंकि बंगला सीखकर ही हम उनके विचारों को ठीक से समझ सकेंगे। अब वे तीन बजे आते और साढ़े पाँच-छः बजे तक बैठे रहते। मैं साढ़े तीन-चार बजे ही घड़ी की तरफ़ देखना आरंभ कर देता और जाने किस मुश्किल से वह सारा वक़्त काटता। उनकी दो महीने की जी-तोड़ मेहनत से हम बहन-भाई इतनी बंगला सीख पाए कि एक-दूसरे को बजाये तुम के ‘तूमि’ कहने लगे। वह कहती, “तूमि मेरी कापी का वरका मत फाड़ो।” और मैं कहता, “तूमि बकवास मत करो।”

    हमारी इस प्रगति से मास्टर जी बहुत निराश हुए और कुछ दिनों बाद उन्होंने हमें बंगला सिखाने का विचार छोड़ दिया। अनुवाद के लिए अब वे पहले से भी मुश्किल 'पैसेज' लिखाने लगे, मगर इससे सारा अनुवाद उन्हें ख़ुद ही करना पड़ता। उस माध्यम से भी हमें बड़ी-बड़ी बातें सिखाने का प्रयत्न करके जब वे हार गए, तो उन्होंने एक और उपाय सोचा। वे फुल-स्केप काग़ज़ बीच में से आधे-आधे फाड़कर उन पर दोनों ओर पेंसिल से अँग्रेज़ी में बहुत कुछ लिखकर लाने लगे। बहन के लिए वे अलग काग़ज़ लाते और मेरे लिए अलग। उनका कहना था कि वे रोज़ उन काग़ज़ों में हमको एक-एक नया विचार देते हैं, जिसे हम अभी चाहे समझें, बड़े होने पर ज़रूर समझ सकेंगे, इसलिए हम उन कागज़ों को अपने पास संभालकर रखते जाएँ। पहले छ-आठ दिन तो हमने काग़ज़ों की बहुत संभाल रखी, मगर बाद मे उन्हें संभालकर रखना मुश्किल होने लगा। अक्सर बहन मेरे काग़ज़ कहीं से गिरे हुए उठा लाती और कहती कि कल वह मास्टर जी से शिकायत करेगी। मैं मुँह बिचका देता। एक दिन मैंने देखा, अलमारी में सिर्फ़ बहन के काग़ज़ ही तह किए रखे हैं, मेरा कोई काग़ज़ नहीं है। चारों तरफ़ खोज करने पर भी जब मुझे अपने काग़ज़ नहीं मिले, तो मैंने बहन के सब पुलिंदे उठाकर फाड़ दिए। इस पर बहन ने मेरे बाल नोच लिए। मैंने उसके बाल नोच लिए। उस दिन से हम दोनों इस ताक में रहने लगे कि कल मास्टर जी के दिए हुए एक के काग़ज़ दूसरे के हाथ में लगें कि वह उन्हें फाड़ दे। मास्टर जी से कागज़ लेते हुए हम चोर आँख से एक-दूसरे की तरफ़ देखते और मुश्किल से अपनी मुस्कुराहट दबाते। मास्टर जी किसी किसी दिन अपने पुराने कागज़ों के पुलिंदे साथ ले आते थे और वहीं बैठकर उनमें से हमारे लिए कुछ हिस्से नक़ल करने लगते थे। हम दोनों उतनी देर कापियों पर इधर-उधर के रिमार्क लिखकर आपस में कापियाँ तबदील करते रहते। इधर मास्टर जी ये पुलिंदे हमारे हाथों में देकर सीढ़ियों से उतरते, उधर हमारी आपस में छीना-झपटी आरंभ हो जाती और हम एक-दूसरे के काग़ज़ को मसलने और मोचने लगते। अक्सर इस बात पर हमारी लड़ाई हो जाती कि मास्टर जी एक को अठारह और दूसरे को चौदह पन्ने क्यों दे गए हैं।

    परीक्षा में अब थोड़े ही दिन रह गए थे। पिताजी ने एक दिन हमसे कहा कि हम मास्टर जी को अभी से सूचित कर दें कि जिस दिन हमारा अँग्रेज़ी का 'बी' पेपर होगा उस दिन तक तो हम उनसे पढ़ते रहेंगे मगर उसके बाद...। उस दिन मास्टर जी के आने तक हम आपस में झगड़ते रहे कि हममें से कौन उनसे यह बात कहेगा। आख़िर तीन बज गए और मास्टर जी गए। उन्होंने हमेशा की तरह घड़ी की तरफ़ देखा, 'त्‌चत्‌ च्चत्‌' की आवाज़ के साथ सिर को झटका दिया और पानी का एक घूँट पीकर 'पोयट्री' की किताब खोल ली। हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और आँखें झुका ली। “मास्टर जी!” बहन ने धीरे से कहा।

    उन्होंने आँखें उठाकर उसकी तरफ़ देखा और पृछा कि क्या बात है—उसकी तबीयत तो ठीक है?

    बहन ने एक बार मेरी तरफ़ देखा, मगर मेरी आँखें ज़मीन में धसी रहीं।

    “मास्टर जी, पिताजी ने कहा है”... और उसने रुकते-रुकते बात उन्हें बता दी।

    “क्या मैं नहीं जानता?” माथे पर त्यौरियां डालकर सहसा उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, ''मुझे यह बताने की क्या ज़रूरत थी?'' और वे जल्दी जल्दी कविता की पंक्ति पढ़ने लगे :

    शेड्स आफ़ नाइट वर फ़ालिंग फ़ास्ट।

    व्हेन थ्रू, ऐन एल्पाइन विलेज पास्ट।

    यूथ...

    सहसा उनका गला भर्रा गया। उन्होंने जल्दी से दो घूँट पानी पिया और फिर से पढ़ने लगे :

    शेड्स आफ़ नाइट वर फ़ालिंग फ़ास्ट...

    उस दिन पहली बार उन्होंने जाने का समय जानने के लिए भी घड़ी की तरफ़ देखा। पूरे चार बजते ही वे काग़ज़ समेटते हुए उठ खड़े हुए। अगले दिन आए, तो आते ही उन्होंने हमारी परीक्षा की 'डेट छीट' देखी और बताया कि जिस दिन हमारा 'बी' पेपर होगा उसी दिन वे यहाँ से चले जाएँगे। उन्होंने निश्चय किया था कि वे कुछ दिन जाकर गरुड़चट्टी में रहेंगे, फिर उससे आगे घने पहाड़ों में चले जाएँगे, जहाँ से फिर कभी लौटकर नही आएँगे। उस दिन उनसे पढ़ते हुए जाने क्यों मुझे उनके चेहरे से डर लगता रहा।

    हमारा 'बी' पेपर हो गया। मास्टर जी मे काँपते हाथों से हमारा पर्चा देखा। उन्होंने जो-जो कुछ पूछा, मैंने उसका सही जवाब बता दिया। मैं हाल से निकलकर हर सवाल के सही जवाब का पता कर आया था। बहन जवाब देने से अटकती रही। मास्टर जी ने मेरी पीठ थपथपाई, पानी पिया और चले गए। मगर शाम को वे फिर आए। पिताजी से उन्होंने कहा कि वे जाने से पहले एक बार बच्चों से मिलने आए हैं। हम दोनों को अंदर से बुलाया गया। मास्टर जी ने हमसे कोई बात नहीं की, सिर्फ़ हमारे सिर पर हाथ फेरा और “अच्छा” कहकर चल दिए। हम लोग उनके साथ-साथ ड्योढ़ी तक आए। वहाँ रुककर उन्होंने मेरी ठोड़ी को छूआ और कहा, “अच्छा, मेरे बच्चे!” और काँपते हाथ से उन्होंने किसी तरह अपना भूरा-सा फ़ाउंटेन पेन जेब से निकाला और मेरे हाथ में दिया।

    “रख लो, रख लो”, उन्होंने ऐसे कहा जैसे मैंने उसे लेने से इंकार किया हो।

    “बहुत अच्छा तो नहीं है, मगर काम करता है। मुझको अब इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। तुम अपने पास रख छोड़ना...या फेंक देना...।”

    उनकी आँखें भर आई थीं इसलिए उन्होंने मुस्कुराने का प्रयत्न किया और मेरा कंधा थपथपाकर खट्‌-खट्‌ सीढियाँ उत्तर गए। बहन स्पर्द्धा की दृष्टि से मेरे हाथ में उस फ़ाउंटेन पेन को देख रही थी। मैंने उसे अँगूठा दिखाया और पेन खोलकर उसके निब की जाँच करने लगा।

    मगर उसके कुछ ही दिन बाद वह निब मुझसे टूट गया—और फिर वह पेन भी जाने कहाँ खो गया!

    स्रोत :
    • रचनाकार : मोहन राकेश

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