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शोकसभा

shokasbha

अशोक मिश्र

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शोकसभा

अशोक मिश्र

और अधिकअशोक मिश्र

    हिंदी पत्रकार श्यामधर हैदराबाद स्थित एक आर्यसमाजी मिज़ाज वाले दैनिक अख़बार में नौकरी कर रहे थे। यह बीसवीं शताब्दी का अंतिम साल 2000 का था। पत्नी बच्चे की उम्मीद से थी, श्यामधर के लिए अकेले होने के चलते उसे साथ रखना संभव था, बड़ा सवाल था कि पत्नी की देखभाल कौन करता। घर चूँकि गाँव में था और ससुराल शहर में इसलिए सासू माँ ने कहा कि दामाद बाबू बिटिया यहीं रहे तो ठीक है, माँ-पिताजी को भी यही ठीक लगा।

    श्यामधर पत्नी को प्रसव के लिए अंबेडकर नगर स्थित ससुराल छोड़कर वाया दिल्ली हैदराबाद जाने के लिए दिल्ली गए थे। श्यामधर सुबह की ट्रेन से उतरकर सीधे दिल्ली के पटपड़गंज स्थित अपने गुरु और संरक्षक हिमांशु दा के घर मुलाक़ात के लिए जा पहुँचे। कुछ ही देर बाद टहलकर लौटते ही हिमांशु जी ने जैसे ही उसको देखा ख़ुश हुए और कुछ देर तक हम हैदराबाद की विशेषताओं और वहाँ की पत्रकारिता पर चर्चा करते रहे चाय का कप आते ही बोले देखो आज शाम को पाँच बजे मंडी हाउस के पास ही रवींद्र भवन के लान में हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार उमेश कालरा की शोकसभा है वहाँ जाना, कुछेक साथियों को अभी यहीं से ही फ़ोन कर दो। जी सर साहब कहकर वह चुप हो गया। श्यामधर को अच्छी तरह याद था कि 1999 तक दुनिया में मोबाइल नाम की चीज़ का अस्तित्व ही था। अधिकतर घरों में काला चोंगा वाला फ़ोन या हरा लाल फ़ोन होता था। श्यामधर ने कालाचोंगा वाला फ़ोन उठाकर दो चार मित्रों को नंबर घुमाकर फ़ोन कर हिमांशु दा का संदेश बता दिया।

    हिमाचल भवन श्यामधर का प्यारा अड्डा था। श्यामधर अपने कुछ मित्रों के साथ अकसर दिल्ली की उदासी और अकेलेपन से भरी शामें उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच हिचकोले खाते आस-पास के इलाक़े में आवारापन, बंजारापन के अंदाज़ में काटा करते थे। हिमाचल भवन के सामने स्थित चाय की दुकान चिर परिचित युवक-युवतियों के चेहरों और सिगरेट की कश लगाते लोगों से गुलज़ार रहती थी। यहाँ आने वाले ज़्यादातर चेहरे रंगकर्मी, पेंटर, लेखक, पत्रकार क़िस्म के लोग हुआ करते थे, इसकी एक वजह यह भी थी कि श्रीराम सेंटर और त्रिवेणी सभागार नज़दीक ही था।

    दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिंदी अख़बारों में श्यामधर नौकरी की तलाश करते कि शायद किसी दिन उप संपादकी हाथ लग जाए और हम भी शहर की हवा में सांस लेने का आक्सीजन पा जाएँ। शहर की कई अनजानी गलियों में सारा दिन भटकने के बाद वे और कुछ दोस्त शाम को मंडी हाउस पहुँच ही जाते। फिर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए एक-दूसरे से दिन कैसे बीता इसकी कहानी सुनाते साथ ही दुख-दर्द भी बयाँ किया करते। यहाँ भी श्यामधर के कई मित्र अकसर कुछ बातें दोस्तों से साझा करते क्योंकि सबकी मंजिल एक ही थी। सबके बीच का भाईचारा अच्छा ख़ासा था। सभी एक-दूसरे की परवाह भी करते और सामर्थ्य भर मदद भी। कभी-कभार श्रीराम सेंटर से मित्रों को मंचित होने वाले नाटकों के फ्री पास मिल जाते तो फिर सबकी शाम ख़ासी ख़ुशगवार हो जाती थी।

    हिमाचल भवन पर शाम को चार बजे ही हम पहुँच गए थे। यह फरवरी की एक जाड़ों वाली गुनगुनी शाम थी। फिजाँ में हल्का-सा हाफ़ स्वेटर वाला जाड़ा और हवाओं में बसंत की फुरफुरी-सी थी। हिमाचल भवन के ठीक सामने श्रीराम सेंटर की चाय वाली दुकान पर चाय की प्याली सुड़कते और सिगरेट के कश लेते हुए कई सारे लोग एक-दूसरे से बातचीत में कुछ ऐसे खोए थे कि उनको आस-पास की हलचलों से कोई वास्ता था। किसी को अपने मित्र का इंतज़ार था तो किसी को प्रेमिका का, कुछेक युवतियां भी थीं जिनको शायद अपने ब्वाय फ़्रेंड का इंतज़ार था। इस जगह पर मगर कुछ ऐसे उदास चेहरे भी थे जो सिर्फ़ टाइमपास के लिए आया करते थे।

    शोकसभा का समय होते ही हम कुछ मित्रों ने धीरे-धीरे फ़िरोजशाह रोड़ की ओर क़दम बढ़ाना शुरू कर दिया। वहाँ पहुँचते ही हमने देखा कि ललित कला अकादेमी के गेट पर ही पच्चीस तीस लोग जमा हो चुके थे कि इतने में हिमांशु जी आते दिखे तो किसी ने कहा कि अब शुरू कर दिया जाए।

    हिंदी के एक वरिष्ठ पत्रकार ने वहाँ आकर कहा कि आप लोग लान में चलें ललित कला अकादेमी ने हमें शोकसभा के लिए सभागार नहीं दिया है। यह सुनते ही कुछ लोग उत्तेजित होकर नारे लगाने लगे अकादेमी प्रशासन मुर्दाबाद—दोगली नीतियाँ मुर्दाबाद—लेखकों की ताक़त का असर या भय कि जिस लेखक की विधिवत् सभागार में शोकसभा की अनुमति नहीं दी थी वह उसी परिसर की कैंटीन के पास स्थित छोटे से लान की हरी घास पर अनौपचारिक रूप से हो रही थी।

    इतने में हिमांशु जी ने हंगामा देखकर कहा कि—देखिए हम बुद्धिजीवी हैं और शोकसभा करने आए हैं, कोई विरोध प्रदर्शन नहीं—आप लोग कृपया शांत रहें।

    हिमांशु जी के खड़े होते ही सबको सांप सूंघ गया था क्योंकि वे हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार और पत्रकारों की बिरादरी के बहुत ही सम्मानित सदस्य थे, जिनका सभी आदर करते थे।

    शोकसभा की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ पत्रकार गंगवारजी ने कहा कि आज हम हरदिल अज़ीज़ साथी उमेश कालरा के असामायिक निधन पर एकत्रित हुए हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन साहित्य, पत्रकारिता को समर्पित कर दिया था—वे हम सभी के बहुत ही प्रिय साथी थे। वे बोले—‘हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पर रोती है—बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा, कुछ ऐसा प्रतिभाशाली व्यक्तित्व था कालरा का। उनके भीतर कुछ ऐसा तुर्श भरा रहता था कि वे सच ही बोलते थे, जो कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को कतई रास आता। जो उनको नौकरी देता था, वे उसी से हत्थे से उखड़ जाया करते। बास कहते कि देखो फलानेजी तो ख़ुद को पता नहीं क्या समझते हैं, उनके मन में हमेशा ग़ुबार और भाषा तंज़ से भरी रहती है।

    इतने में श्यामधर को लगा कि छोटे कहकर कोई कान में फुसफुसा रहा है। कान में किसी के शब्द थे देख रहे हो छोटे कि पूरे समाज ने मिलकर हर स्थान पर मुझको परे किया जो कि कह सकते हो कि हत्या की ओर ढकेला—(यह शायद कालरा की आत्मा थी जो कि श्यामधर के कान में फुसफुसा रही थी)

    रामनारायण एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक थे, उनके खड़ा होते ही कोई धीरे से बोला कि देख रहे हो टकले को कितना खुर्राट और घाघ है, बड़े आराम से पत्रिका निकाल रहा है और हमेशा ग़रीबी का अखंड रोना रोता रहता है—कि पत्रिका संकट में है—रोते-रोते बीस साल गुज़ार दिए बहुत ही घुन्ना आदमी है—पत्रिका में कभी भी संपादकीय नहीं लिखता, छोटा-मोटा लेखकों का गिरोह बना रखा है और कहानियाँ ख़ुद चुनकर अपने कथाकार मित्रों से चुनवाता है। किसी ने कहा—अरे ये तो पहले एक पत्रिका में प्रूफ़ रीडर हुआ करता था।

    एक और संपादक ने आते ही कहा कि—आज दिल बहुत ही तकलीफ़ से भरा है कि हमारे बीच से एक होनहार प्रतिभा अचानक बीच राह में साथ छोड़ गई है—मेरी ओर से उनको विनम्र श्रद्धाजलि।

    अगले वक्ता हिंदी के एक झोलाछाप बुद्धिजीवी थे—वे बोले—उमेश कालरा हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार संपादक थे। मंडे मेल बंद हो जाने के बाद वे बेरोज़गार हो गए थे। इन दिनों वे हाई डिप्रेशन के चलते अधिक मात्रा में शराब पीने लगे थे जिसके चलते उनकी किड़नी फेल हो गई थी। वे पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। वे हिंदी की एक बड़ी व्यावसायिक पत्रिका के सहायक संपादक थे। उन्होंने हिंदी की बहुत सारी प्रतिभाओं को झाड़, पोंछकर प्रकाशित किया, कईयों को कथाकार बनने के लिए मशविरा दिया।

    इतने में लान में बैठे लेखक चिल्लाए अरे भाई शोकसभा में उनकी रचनाओं और कार्यों पर चर्चा करें कि निजी जीवन पर कीचड़ उछालने का काम करें। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं सो कम-से-कम उनकी आत्मा को आहत करने का काम तो ही किया जाए।

    कुछ देर बाद एक निजी प्रयासों से निकल रही लघु पत्रिका के संपादक सभाजीत यादव ने कहा कि उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं हो सका। उन्हें रामलाल नंदन एक साप्ताहिक पत्रिका मंडे मेल की संपादकीय टीम में नंबर दो की हैसियत से सहायक संपादक बनाकर ले गए और उनका करिअर चौपट कर दिया।

    अगले वक्ता थे कालरा के पुराने साथी सहीराम उन्होंने गला खखारकर कहा कि दरअसल कालरा अच्छे कथाकार थे उनके लेखन में मेहनतकश मजूदरों, किसानों की पीड़ा झलकती थी लेकिन वे किसी गिरोह में शामिल नहीं हो पाए और ख़ुद शक्ति केंद्र नहीं बन पाए बहुत स्वाभिमानी आदमी थे। कालरा को लेखक संगठनों ने भी कोई तवज्जो नहीं दी क्योंकि वे किसी संगठन के सदस्य नहीं थे। वे एक बड़ी ही प्रसिद्ध कथा पत्रिका के संपादक मंडल में थे, चाहते तो बहुत सारे लाभ ले सकते थे, नहीं लिया।

    इतने में एक कथाकार चिल्लाए—अरे भाई उन्होंने कितने ही कहानीकारों को शराब की बोतल लिए बिना प्रकाशित नहीं किया।

    अध्यक्ष हिमांशु जी ने हस्तक्षेप किया भाई आप लोग शोकसभा को खुंदक सभा क्यों बना रहे हैं थोड़ा शालीनता बनाकर रखिए आख़िरकार हम लोग बुद्धिजीवी हैं फिर कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    अगले वक्ता के रूप में रघुवर दयाल जिन्होंने उमेश कालरा के साथ काम किया था वे आए और बोले कि उमेश के जाने से जो शून्य पैदा हुआ है उसे भर पाना मुश्किल है उसे भरने की कोशिश में वे सदैव याद आते रहेंगे। वे मुक्तिबोध की भांति हमेशा बीड़ी का बंडल और खैनी, तंबाकू जेब में रखे रहते थे। उन्होंने कई ऐसी कहानियाँ लिखीं जो मेहनतकश मजदूरों की पीड़ा से भरी हुई थीं।

    इतने में ही पुलिस के कुछ सिपाही डँडा टनकाते हुए पहुँचे वे संख्या में दो थे उनमें से एक बोला कि—आप लोग अकादेमी की परमीशन के बिना यहाँ सभा कर रहे हैं इसलिए जल्द समाप्त कीजिए ऊपर से आदेश है सेक्रेटरी का फ़ोन है।

    शोकसभा में शामिल एक पत्रकार ने कहा कि हम कोई सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश नहीं कर रहे हैं आप लोग अपनी तशरीफ़ ले जाइए, अगर ख़र्चा पानी की नीयत से आए हैं तो कुछ नहीं मिलने वाला।

    लोगों के तेवर देख पुलिस के सिपाही डर गए कि कहीं कोई पावरफुल आदमी हो इन सबके बीच जो हमारी ही वर्दी उतरवा दे और हम कहीं के रहें—फिर धीरे से वे पुलिसवाले निकल जाने में अपना भला समझ कर चल दिए—

    जनवादी लेखक संघ के महावीर चौहान ने कहा कि कालरा हिंदी साहित्य विशेषकर कहानी और लघुकथा जैसी नई विधा को प्रमुखता से मंच देने वालों में रहे उनका कहानी संग्रह नंग धडंग की कहानियाँ पढ़ने के बाद अहसास होता है कि वे कितने बड़े कथाकार थे। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से सिद्ध कर दिया था कि नेहरू का विदेशी माडल फेल हो गया है और गांधी का ग्राम स्वराज का सपना अधूरा रहने वाला है। वे चंड़ीगढ़ के एक संपन्न परिवार से ताल्लुक़ रखते थे। परिवार के कुछ लोग अमेरिका सेटल हो गए थे। वे भगत सिंह के बताए रास्ते पर चलने वाले साथी थे सो, पत्रकारिता के माध्यम से समाज को बदलना चाहते थे। मगर अफ़सोस यहाँ भी पूंजीवादियों के एजेंट उनको छलते रहे—हम कह सकते हैं कि पत्रकारिता को भी लालाओं की अगली पीढ़ी ने धंधा बना लिया और एक-एक कर शनै: शनै: पत्रिकाएँ बंद होती रहीं और बतरा जैसे लेखक सड़क पर आकर भटकते रहे यही उनकी ज़िंदगी की कहानी का सच था। पत्रकारिता के इस मिशनरी सिपाही और ग़रीबों के कथाकार को लेखक संघ अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है इन शब्दों के साथ—हम होंगे कामयाब एक दिन—पूरा है विश्वास—

    इसी बीच शोकसभा चल ही रही थी कि कुछेक लोग चुपके से आकर पीछे की खाली जगह पर बैठ गए—जिसमें कुछ ऐसे जाने पहचाने गोष्ठी वाले चेहरे थे जो मंडी हाउस के आस-पास होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में दिख जाते थे। ऐसे लोग अगर गोष्ठी में चाय पानी का प्रबंध होता तो आराम से चाय पीते, समोसा खाते और कुछ देर बैठते या खड़े रहकर धीरे से खिसक लेते। दिल्ली की गोष्ठियों में ऐसे घुसपैठियों की कमी नहीं थी जो कुछ देर के लिए किसी कार्यक्रम में बतौर श्रोता भीड़ बढ़ा देते थे।

    इसी बीच एक और वक्ता आए और उन्होंने कहा कि कालरा को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए कोई पुरस्कार या किसी पत्रिका का यादगार विशेषांक निकालें ताकि नई पीढ़ी उनके कामकाज से परिचित हो सके।

    श्यामधर की स्मृतियों में मंडी हाउस की वह ख़ुशगवार शाम भुलाए भूल रही थी जब वह अपने प्रिय साथी सभाजीत के साथ मुफ़लिसी और आवारागर्दी के दिनों के साथी निरंजन की प्रतीक्षा कर रहा था कि इतने में टी स्टाल वाला, पहले से बोली गई दो कप चाय—लाकर हाथ में पकड़ा गया। अचानक सीमेंट के उसी चबूतरे पर पड़ोस में बैठे दाढ़ी वाले कृशकाय से शख़्स ने कहा कि भाईजी एक चाय पीना चाहता हूँ, साथ में एक मट्ठी भी अगर आपको एतराज़ हो। अधेड़ क़िस्म के उस व्यक्ति को देखते ही श्यामधर को लगा कि यह ज़रूर ही कोई लेखक, पत्रकार या फिर बहुत मुमकिन है कि वक्त का मारा कोई पेंटर, या रंगकर्मी है। उस व्यक्ति की शक्ल में कुछ ऐसी कशिश थी कि हम अपनी बातचीत छोडकर उस व्यक्ति के बारे में सोचने लगे। हमने चाय वाले को उसकी वांछित चाय, मट्ठी लाने का इशारा कर दिया। यह इलाक़ा ही कुछ ऐसा था कि कला, साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता से जुड़े लोगों को अपनी ओर ख़ींच ही लेता था। इस इलाक़े की विशेषता थी कि यहाँ त्रिवेणी सभागार, आर्ट गैलरी, श्रीराम सेंटर, राष्ट्रीय नाटय विद्यालय, साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादेमी, दूरदर्शन भवन की बिल्डिंगे थी, जिस कारण सांस्कृतिक गतिविधियों की भरमार रहती थी। उस जमाने में दिल्ली मेट्रो का स्टेशन था, पड़ोस में बंगाली मार्केट की नत्थू स्वीटस की दुकान ज़रूर खान-पान के शौकीन लोगों का अडडा थी। उस जमाने में श्रीराम सेंटर में वाणी प्रकाशन की बुक शाप थी, जहाँ लघु पत्रिकाएँ आतीं थी वह लेखकों की आवाजाही का अड़्डा बना रहता था।

    कुछ देर बाद उस शख़्स ने श्यामधर की ओर देखकर सवाल उछाला पत्रकार लगते हैं आप लोग।

    इस बात पर सभी साथियों ने समवेत हुँकारी भरी—जी बिल्कुल सही अंदाज़ा है आपका।

    अगला सवाल था कि किस अख़बार में कहाँ काम करते हैं—सर हिंदी मिलाप हैदराबाद- श्यामधर ने जवाब दिया।

    वह फिर बोले—अच्छा वो सन्यासीजी के परिवार वाला। श्यामधर ने जवाब दिया सर मालिक़ों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है मुझे। वह बोला मुझे है—ये लोग आर्यसमाजी हैं शायद आप जानते हों...।

    कुछ देर बाद ही श्यामधर का एक और दोस्त निरंजन गया था वह शंख नाम की पत्रिका निकालता था और बिहार के कटिहार जिले से आया था, जहाँ उसके परिवार के पास अच्छी ख़ासी ज़मीन थी, मगर उसको साहित्यिक पत्रकारिता का भूत सवार था। वह राजेंद्र यादव जैसी पत्रिका निकालकर साहित्य और समाज में बहुत बड़ी क्रांति करना चाहता था लेकिन गाँव के एक पोस्टमैन के श्रीनिवासपुरी स्थित सरकारी क्वार्टर में रहकर सिगरेट पीते हुए बदलाव का सपना देखता था जबकि चायवाला उससे उधारी की चाय के पैसे मांगकर उसकी इज़्ज़त उतार दिया करता था। निरंजन ने आते ही उस कृशकाय व्यक्ति को बड़े ही सम्मान के साथ नमस्कार किया फिर हम लोगों की ओर मुख़ातिब होकर कहा कि—आप हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार उमेश कालरा हैं जो कि मंडे मेल के बंद होने के नए अख़बार में नौकरी पाने की उम्मीद में भटक रहे हैं। परिचय सुनकर हम जैसे आसमान से गिरे खजूर में आकर अटक गए हों—अब श्यामधर को किसी शायर की ये पक्तियाँ ध्यान में रही थीं— उठ गई हैं सामने से ये कैसी-कैसी सूरतें-रोइए किसके लिए किस-किस का मातम कीजिए।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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