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वह मैं ही थी

wo main hi thi

मृदुला गर्ग

मृदुला गर्ग

वह मैं ही थी

मृदुला गर्ग

और अधिकमृदुला गर्ग

    जब भी उमा को वह औरत याद आती, एक ख़ौफ़ उसके वजूद पर तारी हो जाता। वह औरत, जो उसी कमरे में पलंग पर बच्चा पैदा करते मर गई थी, जिस पर आजकल उसे लेटना पड़ता था। कई बार सोचती थी, अपना बिस्तर उठाकर दूसरे कमरे में ले जाए और फ़र्श पर बिछाकर सो रहे। पर अपने ख़ौफ़ को दूसरों पर ज़ाहिर करना इतना आसान नहीं था। मनीश पर तो बिल्कुल नहीं। उससे कहा तो वह अबूझ आँखों से उसे देखता रहेगा और अपनी बात समझा पाने का डर उसकी दहशत को और गाढ़ा कर देगा। माँजी ने कहा तो वे वही क़िस्सा बयान करना शुरू कर देंगी, जिससे उसे ख़ौफ़ आता था!

    जब वह इस घर में आई, तुम्हारी तरह गर्भवती थी। यहाँ कारख़ाने की नई शाखा शुरू हुई तो उसके पति का तबादला अचानक बड़े शहर से इस क़स्बे में हो गया। आख़िरी महीना बहुत बुरा बीता उसका। रात को बिस्तर पर लेटती तो घंटे आधे घंटे में उठ बैठती। छाती मसलकर कहती, साँस नहीं रही। बार-बार यही कहती, साँस नहीं आती। लोग सुनते और कहते, सब्र करो, आदत पड़ जाएगी। यह जो कारख़ाने में सीमेंट उड़ता है, वही हवा को भारी बना देता है, उसी से साँस नहीं आती। किसी को नहीं आती, शुरू-शुरू में, फिर आदत पड़ जाती है। सबको पड़ गई तो उसे क्यों नहीं पड़ेगी। वह पूरी-पूरी रात बैठकर गुज़ार देती। कोशिश करती, ज़्यादा चले-फिरे नहीं, पति को नींद पूरी करनी थी न! कारख़ाने में नया-नया तबादला, काम का बोझ इतना कि बिस्तर पर लेटते ही नाक बजाने लगता।

    फिर भी, दिन में जब-तब वह उससे कह उठती। वह जानती है, वह बच्चे को जन्म देने में बचेगी नहीं। शुरू-शुरू में पति सुनता और सुस्त हो जाता। कैसे बुरे वक़्त इस क़स्बे में पटका गया। अस्पताल, डॉक्टर, पर करता क्या बेचारा! ख़ुद की माँ ज़िंदा, पत्नी की, छोड़ता भी तो कहाँ छोड़ता उसे? उसके सामने वह यही दिखलाता कि घबराने की कोई बात नहीं थी। उसकी बात हँसी में टालते-टालते आदत पड़ गई और धीरे-धीरे उसने ध्यान देना बंद कर दिया। रोज़-रोज़ एक ही बात, कोई कब तक सुने?

    उमा सुनती और सोचती, पर यह तो मेरी कहानी है। बिल्कुल मेरी कहानी। पर कहती नहीं। कैसे कहती? मनीश की माँ ज़िंदा थी और उसकी ख़ुद की भी।

    फिर उस औरत पर सफ़ाई का फ़ितूर सवार हो गया। रात-भर सोए, साँस ले, बस घर को सजाती घूमे। कलात्मक रुचि की थी, चित्र बनाया करती थी। अब क्या कि दिन-रात कैनवास पर रंग उँड़ेलने में अपने को खपा दिया। घर की तमाम दीवारें अपने बनाए चित्रों से पाट दीं। फ़र्श की जो धुलाई-रगड़ाई की कि पूछो मत। कंपनी की भेज-कुर्सियाँ उठाकर स्टोर में बंद कर दीं। यह पलंग उसने ख़ुद खड़े होकर बढ़ई से बनवाया था। पलंग क्या, तख़्त समझो। हाँ, लकड़ी बढ़िया लगवाई और बनवाया ख़ूब लंबा-चौड़ा, पर नीचा तो देखो कितना है; फ़र्श से कुल छह इंच ऊपर। गद्दा भी पतला-सा। पतला है क्यों? दिमाग़ में यह ख़याल चढ़ गया कि सारा सामान कमरे से बाहर निकालकर नीचा तख़्त डालेगी तो कमरा बड़ा और ख़ाली लगेगा। ख़ाली जगह में हवा क़ाबू जाएगी और वह साँस ले पाएगी। साँस आने पर, कौन जाने एक रात नींद भी जाए। पर उम्मीद कहाँ रंग लाई। सीमेंट के कण उसी तरह हवा को बोझिल बनाए रहे, उसके फेफड़ों को चुनौती देते रहे और वह छाती मसलती रात-भर इधर-उधर डोलती रही। उसे लगता, उसका अजन्मा बच्चा आकर छाती में अटक गया है। कभी-कभी महसूस होता, वह ज़िंदा नहीं, मर चुका है। अंदर पड़ा-पड़ा फोड़े की तरह सड़ रहा है। इसलिए साँस नहीं आती, नींद ग़ायब हो गई है, खुली आँख बुरे-बुरे सपने आते हैं। पर पक्का पता करने का को तरीक़ा नहीं था। क़स्बे में अस्पताल था, एक्से-रे मशीन और डॉक्टर। इंतज़ार के सिवा चारा था। उस क्षण का, जब पेट में दर्द की ऐंठन शुरू हो और बच्चा ख़ुद-ब-ख़ुद जन्म ले ले। दाई का काम तो नाल काटना और बच्चे को नहलाना भर था। प्रकृति साथ दे तो मौत से कौन लड़ सकता है। दाई जो कर सकती थी, किया। उस औरत की क़िस्मत ख़राब थी। बच्चे का सिर माँ के जिस्म में अटका रह गया। बाहर ही नहीं पाया। बाद में सुना, बड़े शहर में उसके परिचित कह रहे थे, फ़ॉरसेफ़ लगाकर बच्चे को बाहर खींच लेते तो दोनों की जान बच जाती। पर यहाँ कौन लगाता लेटी फ़ॉरसेफ़? मर गई बच्चे समेत इसी कमरे में, इसी बड़े तख़्त पर, जिस पर तुम हुई हो। बदक़िस्मत थी बेचारी।

    बदक़िस्मत या महज़ औरत, उमा सोचती। यह उसकी कहानी है या मेरी या हर उस औरत की, जो अपने वर्ग और स्थान से तोड़कर दूसरी जगह फेंक दी जाती है? जब वह शादी से पहले कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाया करती थी तो उसकी हेड ने एक बार कहा था, विवाह करते हुए जिस बात का ख़याल रखना चाहिए, वह है स्थानमूलक तुष्टिगुण, यानी प्लेस युटिलिटी। उमा समेत सब हँस दिए थे। विवाह के अर्थशास्त्रीय विवेचन पर हँसने के सिवा कर भी क्या सकते थे? आज समझ में आता है, उनकी बात में दम था। भारत जैसे भीषण असमानताओं वाले देश में वर्ग और स्थान की भूमिका एक जैसी है। सिर्फ़ औरत ऐसी चीज़ है जिसे कहीं से उखाड़कर कहीं फेंका जा सकता है, इस धारणा के साथ कि वह जड़ें जमा ही लेगी। ऐसे तो कोई कीकर-बबूल से भी पेश नहीं आता। पर क़सूर किसका है? ख़ुद औरत का न। परजीवी की तरह इंतज़ार क्यों करती है कि कोई सुदृढ़ जड़ों वाला वृक्ष मिले तो उसके कंधों पर चढ़कर जीना शुरू कर दे? जड़विहीन क्यों बनाए रखती है ख़ुद को!

    नहीं, उमा यह सब माँजी से नहीं कहती। उनका एक ही जवाब होता, तुम्हारे माँ-बाप को शादी से पहले सोचना चाहिए था। माँ-बाप को, उमा को नहीं। मनीश से कहने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। अबूझ, अकबकाए भाव से उसे देखते रहने पर, जो समझ उसकी आँखों से उपजती, वह सिर्फ़ यह कहती कि उसकी बातों का बुरा क्या मानना, गर्भवती स्त्रियाँ ऊलजलूल सोचा ही करती हैं। कहती क्या, वह सिलसिलेवार सोचती भी नहीं थी। यों ही टुकड़ा-टुकड़ा तर्क दिमाग़ में उठता और किरच-किरच दहशत मन में रड़कती रहती। फिर रात के अँधेरे में एक क्षण ऐसा आता, जब निस्सीम आतंक उसके पूरे अस्तित्व पर हावी हो जाता।

    चाहकर भी उसे वही कहानी बार-बार सुननी पड़ती थी। माँजी सुनाएँ तो कोई और औरत सुना जाती थी। उन्होंने भी तो उन्हीं सबसे सुन-सुनकर रटी थी। मनीश का नया-नया तबादला उस क़स्बे में हुआ था, इसलिए कारख़ाने में काम करने वाले सभी अफ़सरों और बाबुओं की बीवियाँ एक-एक करके उससे मिलने चुकी थीं। उसकी ज़बान पर छह महीने पहले मरी औरत की कहानी थी, जिसे अपनी अपनी शैली में वे सुना जाती थीं।

    औरत मर गई तो पति का दिल टूट गया। इस घर में रह नहीं पाया। अगले दिन पड़ोसी के घर जा टिका और मैनेजर को दरख़्वास्त दे दी कि उसका घर बदल दिया जाए। इस घर के पीछे, ज़रा दाएँ को जो घर है, वह अलॉट हुआ है उसे। आजकल यहाँ है नहीं। शादी कराने दिल्ली गया हुआ है। आदमी अकेला कब तक रहे। छह महीने बीत चले। अच्छा हुआ, बच्चा माँ के साथ निबट लिया, वरना कौन पालता बेचारे को? आदमी का तो दिल ऐसा टूटा कि घर छोड़कर जाते वक़्त यह पलंग यहीं छोड़ गया। कहने लगा, मुझसे देखा नहीं जाएगा। उसकी हैबतनाक चीख़ों और बच्चे की बेआवाज़ मौत का साक्षी है यह। हर वक़्त उसकी याद दिलाएगा। बड़ी साध से बनवाया था बदक़िस्मत ने।

    दाई के बाहर आकर कहने पर कि दोनों ख़त्म हो गए, वह रोता हुआ कमरे में दाख़िल हुआ तो सबसे पहले ख़ून से तरबतर पलंग देखा। फिर पलंग पर पड़ी उसकी लाश। वह तो चीख़ मारकर बेहोश हो गया, बाक़ी लोग भी डर से जकड़े खड़े रह गए। औरत की लाश की आँखें चौड़ी खुली हुई थीं और ऐसा ख़ौफ़ और दर्द भरा था उनमें कि किसी की हिम्मत पास जाने की नहीं हुई। सुना, मरघट के डोम ने ही आँखें बंद कीं उसकी। बच्चा उसी के साथ जला। अटका जो पड़ा था बीच में। पूरा बाहर, पूरा अंदर। कोई लेडी डॉक्टर होती तो बाहर खींचकर देख लेती, मरा है या ज़िंदा। पर...देखकर होता क्या? ज़िंदा होता भी तो पालता कौन? तुमने देखे नहीं, बच्चों के कितने सुंदर-सुंदर चित्र बनाए थे उसने। उस घर में लगे हैं, देख आना किसी दिन। सारे के सारे सहेजकर ले गया उसका पति। बस, एक यह पलंग छोड़ गया। यों धो-पोंछकर साफ़ कर दिया था एक पड़ोसी ने, पटना शहर से डिब्बा लाकर पॉलिश भी मार दी थी, बिस्तर फिंक ही चुका था, पर वह ले जाने को तैयार नहीं हुआ। मैनेजर कहने लगा, कारख़ाने के स्टोर में पलंग वैसे भी कम हैं, कुछ टूट-फूट गए, कुछ अफ़सरों की बहाली बढ़ गई। जो अगला अफ़सर इस मकान में आएगा, इस्तेमाल कर लेगा। पलंग है बढ़िया, नहीं?

    कहानी सुनते-सुनते उमा का चेहरा पीला पड़ जाता, साँस घुटने लगती, पेट में हौल का गोला उठ आता, सिर में चक्रवात भर जाता और उबकाई लेती वह उसी तख़्त पर निढाल पड़ जाती। आने वाली अफ़सर की बीवी होती, तो कान के पास आकर फुसफुसाती, 'बच्चा यहाँ मत होने दो। यहाँ की दाई दस बच्चे करवाती है तो सात माँएँ मर जाती हैं। मेरे दोनों बच्चे शहर में हुए, माँ के घर। तुम अपनी माँ के पास दिल्ली क्यों नहीं चली जातीं?' क्लर्क की बीवी होती तो त्रस्त आँखों से कहती, 'आपने यह घर कैसे ले लिया? छह महीने से ख़ाली पड़ा था, कोई यहाँ आने को तैयार नहीं था। उस औरत का भूत...आप तो गर्भवती भी हैं। बच्चा जनने अपनी माँ के पास क्यों नहीं चली जातीं? आपकी सास नहीं मानेगी क्या?' कोई-कोई औरत माँजी से कह भी देती। तब वे लंबी आह भरकर कहतीं, 'इसके माँ-बाप! उन्हें अपने सैर-सपाटे से फ़ुर्सत मिले तब न!'

    वह बात नहीं है। उसके माँ-बाप और छोटी बहनें संवेदनशील नहीं हैं। वह तो उनकी महानगरीय दृष्टि है, जो उन्हें बिहार के इस धुर क़स्बे की वास्तविकता देखने नहीं देती। वे जानते ही नहीं कि उनके देश में ऐसे गाँव-क़स्बे भी हैं, जहाँ डॉक्टर नहीं हैं, चिकित्सा की सुविधाएँ नहीं हैं, जहाँ हर बीमारी का इलाज एस्पिरीन की गोली या तुलसी का काढ़ा है। दिल्ली शहर में भी लाखों लोग हैं, जो इसी क़स्बाई तरीक़े से जीते-मरते हैं, उनके बारे में भी वे क्या जानते हैं? उनके लिए बच्चे के जन्म में औरत का मरना बाज़ारू फ़िल्म का लटका है या सस्ते उपन्यास की गप। वे जानते ही नहीं, क़स्बा होता क्या है। उनके लिए छोटे-से-छोटा शहर है, जयपुर या कानपुर, जहाँ अस्पताल कम-ज़्यादा आधुनिक होते हैं; डॉक्टर कम-ज़्यादा काबिल, पर होते ज़रूर हैं। घर के बिस्तर पर, दाई की मदद से एक भगोना उबले पानी के भरोसे, बच्चे नानी-दादी ने पैदा किए थे, जिन्हें उसकी आधुनिक बहनें मनुष्य का दर्जा देने को भी तैयार नहीं थीं। वे संवेदनहीन नहीं, संवेदनशील थीं अपने वातावरण के प्रति। वही अर्थशास्त्र का स्थानमूलक तुष्टिगुण। वर्ग और स्थान का पट सकने वाला अंतर उन्हें बिहार के इस औद्योगिक क़स्बे की सच्चाई जानने नहीं दे सकता था।

    जब उसके गर्भवती होने के बाद, मनीश का तबादला अचानक यहाँ होने के आदेश आए, तो उसने सुझाव दिया भी था कि उमा माँ-बाप के पास जाकर बच्चे को जन्म दे। सुनकर वे भौचक रह गए थे। दोनों छोटी बहनों को लगा था, शहर में दंगा हो गया। उनकी व्यस्त सामाजिक ज़िंदगी की रफ़्तार में अड़चन तभी आती थी, जब शहर में फसाद हो जाए। कॉलेज के बाद पिक्चर, पार्टी, नाटक, सैर-सपाटा उनकी दिनचर्या के अभिन्न अंग थे। अस्पताल की भागमभाग और बच्चे की चिल्लपों की उसमें गुंजाइश नहीं थी। ऐसा नहीं था कि उसके बच्चा पैदा करने या पालने में उन्हें हाथ बँटाना पड़ता, बच्चा अस्पताल में डॉक्टर-नर्स के भरोसे पैदा होता, पर बेफ़िक्री और तफ़रीह में कुछ मनोवैज्ञानिक फ़र्क़ पड़ ही जाता। माहौल भी कोई चीज़ होती है। रात को बच्चा 'टाऊँ-टाऊँ' करके नींद ख़राब करता और दिन में मौज़-मस्ती करते यह अहसास मन को सालता रहता कि उमा अकेली है। पेट बढ़ी औरत को साथ लेकर बाहर जाना बहनों की सोफिस्टिकेटेड प्रकृति को रास नहीं आता और उसका अकेले घर पर पड़े रहना न्यायपूर्ण नहीं लगता। बेकार के धर्मसंकट में कोई पड़े क्यों, जब उनके महानगरीय धर्म के अनुसार, बच्चे का जन्म उसकी और उसके पति की अंतरंग समस्या थी, जिससे उनका कोई संबंध नहीं था। माँ-बाप की सहानुभूति भी अपने माहौल के प्रति थी। उमा उन्हें क्या दोष देती? शादी से पहले वही कहाँ जानती थी कि हिंदुस्तान में ऐसे गाँव-क़स्बे भी हैं, जहाँ डॉक्टर, अस्पताल, चिकित्सा-यंत्र, ऑक्सीजन तो दूर, मामूली दवाइयाँ और इंजेक्शन भी नहीं होते। होता एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, कंपाउंडर, दाई, एस्पिरीन की गोली और उबला गर्म पानी। जानती तो अनजान अंधे की तरह, गर्भ धर, इस क़स्बे में चली आती। पर...जाती कहाँ?

    शुरू-शुरू में उसने मिलने आने वाली औरतों से पूछा भी था, 'यह कैसी जगह है कि यहाँ कारख़ाना है, घर है, फ़र्नीचर है, पर अस्पताल या डॉक्टर नहीं है?

    जवाब मिला था, 'हैं क्यों नहीं! आम बीमारियों के लिए प्राथमिक दवाख़ाना है। एक प्राइवेट जनरल फ़िज़ीशियन भी है। गंभीर बीमारी हो तो कंपनी अपने मातहतों को इलाज के लिए पटना भेजी देती है। बस, लेडी डॉक्टर नहीं है। तो भई, देहात में तो बच्चे दाई ही जनवाती है। हाँ, जच्चा-बच्चा की मृत्यु-दर काफ़ी ज़्यादा है। पर क्या किया जाए, गँवई गाँव का यही हाल है अपने देश में। जिनका मन यहाँ नहीं टिकता, मायके या ससुराल चली जाती हैं। तुम जानो, हमारे यहाँ लड़कियाँ मायके जाना ही पसंद करती हैं। एकाध कोई ससुराल जा टिकती है। इसीलिए लेडी डॉक्टर की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई। पर अब कंपनी के मालिक बूढ़े हो चले। नई हवा के उनके लड़के-बहू चाहते हैं, यहाँ अस्पताल खुले, इलाज का वाजिब इंताज़ाम हो, लेडी डॉक्टर तक बहाल की जाए। योजना बन गई है, दो-तीन साल तक

    अस्पताल हो जाएगा यहाँ।'

    पर उमा का बच्चा तो अगले महीने पैदा होना था। उसे रोककर नहीं रखा जा सकता था। दो-तीन साल क्या, प्रकृति एक बार निर्णय ले ले तो घंटा-आधा घंटा भी रोका नहीं जा सकेगा। तभी न, इतना आसान है बच्चे का जन्म और इतना दुष्कर। अपने हाथ में कुछ हैं ही नहीं—उसका जी करता था, पटना चली जाए, दस-पंद्रह दिन किसी होटल में रहे और दर्द शुरू होने पर अस्पताल में भर्ती हो जाए। वहाँ वह अकेली हो सकेगी। वह औरत नहीं जाएगी उसके साथ। पर कैसे? पैसा कहाँ था उसके पास? जो कमाया, साथ-साथ ख़र्च करती रही; तब आर्थिक स्वतंत्रता विलास की वस्तु थी। जो बचाया, अपनी शादी में लगा दिया, थोड़ा-बहुत फिर भी जो बचा रहा, शादी के रूप में मौज-मज़े में होम कर दिया। अब वह पूरी तरह मनीश पर निर्भर थी। मनीश के पास इतना पैसा नहीं था कि उसे हफ़्ते-दो हफ़्ते सस्ते से सस्ते होटल में ठहरवा सके। फिर ज़रूरत क्या थी? बच्चे किसके नहीं होते। गाँव-क़स्बों में शहरों से ज़्यादा होते हैं। सबकी सब औरतें बच्चा जनने में मर जातीं तो देहात में बढ़ती आबादी यों अजाब बनी होती। रहने दो। मैं जच्चा-बच्चा की मृत्यु-दर नहीं जानना चाहता। मैंने तुम्हारी तरह अर्थशास्त्र नहीं पढ़ा। आँकड़ों पर मेरी आस्था नहीं है, अपनी आँखों पर है। कोई एक औरत बच्चा जनते इस घर में मर गई तो इसका यह मतलब नहीं कि सब मरेंगी। औरतों को तो बात में से बात निकालने का चस्का होता है। मेरे पास इतना वक़्त कहाँ है? अभी तबादला हुआ है। नया काम समझने निबटाने के बाद बिस्तर पर लेटता हूँ, तो बदन चस-चस कर रहा होता है। मुझे तो साँस लेने में कोई तकलीफ़ नहीं होती, किसी औरत का भूत मुझे सताता है। बढ़िया, चौड़ा, आरामदेह पलंग है। टीसते बदन को सुख मिलता है। गहरे सोऊँ नहीं तो अगले दिन काम कैसे करूँ?

    हर आदमी अपने-अपने वर्ग-स्थान के प्रति संवेदनशील था। बच्चा उमा को पैदा करना था। इस क़स्बे के इस घर के उस पलंग पर, जिस पर वह औरत मरी थी। मनीश को नहीं, उमा के माँ-बाप या बहनों को। वे सब अपने दायरों में सुरक्षित थे। वह औरत तो सिर्फ़ उमा के साथ रहती थी।

    उसे हल्का-हल्का बुख़ार रहता था। जब-तब पेट और कमर में दर्द की मरोड़ उठा करती थी। दिन फिर भी गुज़र जाता, पर रात होने पर बिस्तर पर लेटती तो घंटे-भर बाद उठ बैठती। नाक-मुँह दोनों से साँस लेने की कोशिश करती, पर साँस आता नहीं। कभी-कभी इतना घबरा जाती कि मनीश को झकझोरकर जगा देती। कहती, 'दम घुट रहा है मेरा, साँस नहीं रहा।'

    'बेवक़ूफ़ी की बात मत करो', वह कहता, 'हवा में सीमेंट के कण हैं इसीलिए साँस लेने में तकलीफ़ होती है। शुरू-शुरू में सभी को होती है, फिर आदत पड़ जाती है। सबको पड़ गई, तुम्हें क्यों नहीं पड़ेगी? दम घुटकर कोई नहीं मरा आज तक। कोशिश करो, नींद जाएगी। आदमी चाहे तो बैठे-बैठे भी सो सकता है। और चारा भी क्या है, तुम्हीं बतलाओ, मैंने तो कहा था कि दिल्ली चली जाओ पर तुम...’

    उमा निरुत्तर हो जाती और मनीश करवट बदलकर पलंग के दूसरे कोने पर सरक जाता। ख़ूब चौड़ा पलंग था, चार ताबूतों के बराबर। मनीश और उसके बीच वह औरत आराम से लेटती थी। उसी का था पलंग, साध से बनवाया हुआ। होनी को टालकर साँस लेने की ज़िद्दी आस में वह उमा के बराबर में लेटी रहती। साँस उसे आती, उमा को। उमा आँखें पूरी खोल, नीले चेहरे पर जड़ी, भय से फटी उन आँखों में देखती, जिनमें मौत ने रोशनी तो छीनी, त्रास नहीं छीन पाई। ख़ौफ़ और दर्द का ऐसा आलम था, जिसने मरकर भी उसकी आँखों को बंद नहीं होने दिया। उमा और गहरे उनमें झाँकती। वह औरत मंद-मंद मुस्कुराने लगती, पर आँखों का आतंक बना रहता। उमा को लगता वह उसका अजन्मा बच्चा ही था, जो अब उसकी कोख से जन्म लेने वाला था। उसके घर में, उसी के पलंग पर। उसका मन पसीज उठता। वह उसे भरोसा देने लगती कि इस बार उसका बच्चा ज़िंदा जन्म लेगा। वह उसे सहेजकर रखेगी, उसकी अमानत की तरह। औरत मुस्कुराना बंद कर देती। उसकी पुतलियाँ और फैलतीं, त्रास और गहराता और उसके साथ उमा को भी वह हैबतनाक मंज़र दीख जाता, जिसने कभी ख़त्म होने वाला ख़ौफ़ उसकी रूह में भर दिया था। हौल का बवंडर उठता और उसके पूरे वजूद पर तारी हो जाता।

    पता नहीं कितनी रातें उसने उस औरत के साथ एक बिस्तर पर गुज़ारीं। फिर सहना नामुमकिन हो गया। वह उसे मनीश के पास छोड़, भटकी रूह की तरह घर में डोलने लगी। मनीश उस औरत की बग़ल में आराम से सोया रहता। उमा इस कमरे से उस कमरे में भागती, वक़्त काटने के लिए कोने-कोने की सफ़ाई करने लगती।

    एक वक़्त आया कि सफ़ाई-सजावट का फितूर उसके सिर पर सवार हो गया। छोटे क़स्बे में और जो हो, प्राकृतिक संपदा काफ़ी थी। उसने सारा दिन आसपास के मैदानों-जंगलों में गुज़ारना शुरू कर दिया। तरह-तरह की आकर्षक आकार वाली डालियाँ, फलियाँ, लतरे, बाँस, जड़ें और जंगली फूल-पत्तियाँ ढूँढ़-ढूँढ़कर जमा करती और घर ले आती। फिर उनमें से कुछ फूलदानों में सजाती, कुछ के कोलाज बना डालती। फ़र्श और दीवारों पर सीमेंट की परत बार-बार साफ़ करती, उन्हें झाड़ती, पोंछती, चमकाती और अपनी बनाई कलाकृतियाँ उन पर सजा देती। फ़र्श पर छोटी मचियों पर रखे फूलदान, दीवार पर रंग-बिरंगे जीवन की हँसी-ख़ुशी को मूर्त करते कोलाज। अपने सबसे प्रिय कोलाज से उसने शयनकक्ष की दीवार ढक दी। पत्रिकाओं में से हँसते-खिलखिलाते बच्चों के चित्र काटकर उनके बीच उगते सूरज और अनगिनत झिलमिलाते सूरजमुखी के फूलों के बिंब रंगकर कोलाज तैयार किया था। उसकी कोशिश थी कि घर को इतनी सुंदरता और जीवंत हँसी से भर दे कि मौत अपना देखा हुआ रास्ता भूल जाए।

    इस कोशिश में किसी-किसी रात बदन की हरारत ज़ोर पकड़ लेती। जूड़ी से थरथर काँपता शरीर तेज़ ज्वर के क़ब्ज़े में जाता। वह तय नहीं कर पाती, एस्पिरीन की गोली खाए या नहीं? कभी मेहनत से क्लांत देह ताप के सामने समर्पण कर देती और वह वहीं कमरे के धुले-पुँछे फ़र्श पर ढह जाती। नीम बेहोशी नींद का काम देती। माँजी का ध्यान उस पर चला जाता तो उठाकर फ़र्श पर बिछे अपने बिस्तर पर लिटा देतीं। उमा को कुछ राहत मिलती। जब से उसने देखा है, माँजी फ़र्श पर ही अपना बिस्तर बिछाती हैं। मनीश को ज़मीन पर पसरने से ख़ास चिढ़ है, वह जानती है। पर माँजी से उसने समझौता कर रखा है। एक बार बतलाया था उन्होंने, कैसे पति के मरने पर जब उन्हें धरती पर उतारा गया तो वे भी उतर आई थीं। दुबारा पलंग पर नहीं चढ़ी थीं। मनीश की कहासुनी के बावजूद ज़मीन पर सोने का नियम बना लिया था।

    उमा को वहाँ लिटाकर वे उसके सिर में तेल की मालिश करते हुए उसे ढाढ़स बँधातीं, 'ऐसे घबराया नहीं करते, भगवान पर भरोसा रखो। मैंने दस बच्चों को जन्म दिया, ज़िंदा रहे कुल चार। तीन लड़कियाँ और यह एक लड़का, मनीश। भगवान की मर्ज़ी। हिम्मत रखो। भगवान जो करेगा, अच्छा ही करेगा।'

    उमा की हिम्मत जवाब दे जाती। वह यह पूछने लायक़ भी नहीं रहती कि दस बच्चों में से कुल चार जीवित रखकर भगवान ने अच्छा क्या किया? वह औरत आकर उसके पैताने खड़ी हो जाती और अपनी दहशत-भरी आँखों से उसे ताकती रहती। वह काँप-काँप जाती। माँजी और मनीश उसे आम बीमारियों का इलाज करने वाले प्राइवेट फ़िज़ीशियन को दिखलाने के बारे में इस-उससे सलाह करते, गर्भावस्था में दिखलाना ठीक रहेगा या नहीं? निर्णय लिए जाने से पहले बुख़ार उतर जाता और इंतज़ार का पुराना सिलसिला शुरू हो जाता। उस दिन का, जब समय पूरा होने पर, प्रकृति उसे उस गुरुभार से मुक्त कर देगी।

    एक महीने तक उसने इसी तरह घर को सजाया, सँवारा, सुंदर-स्वास्थ्यकर बनाया। फिर बरसात के मौसम के शुरुआती हफ़्ते में, रात के तीसरे पहर, जब वह घर के अंदर घुस आई चींटियों-मकोड़ों को बुहारकर बाहर फेंकने की नाकाम कोशिश कर रही थी, उसे लगा, उसके भीतर कुछ फट गया। ढेर सारा पानी टाँगों के बीच से निकलकर फ़र्श पर बहने लगा। कोई ज़ोर से चीख़ पड़ा। शायद वह औरत थी।

    माँजी दौड़ी आई और गुहार मचाने लगीं कि बरसाती रात के उसी अँधियारे पहर में मनीश भागकर जाए और दाई को बुला लाए। उमा को ले जाकर पलंग पर लिटाने लगीं तो उसने कहर बरपा कर दिया, दूसरा पलंग लाओ। कहीं से भी लाओ, दूसरा लाओ! यह नहीं! इस पर नहीं।

    वह साफ़ देख रही थी, उस पलंग पर वह औरत लेटी हुई थी।

    पागल हुई हो, मनीश ने कहा, इस वक़्त दूसरा पलंग कहाँ से आएगा?

    माँजी इस क़दर घबरा गईं कि ज़िंदगी में पहली बार, इकलौते बेटे को गाली दे डाली, नामुराद, बच्चा जनती औरत की बात सुना करते हैं। कहीं से भी एक खाट लेकर आ, माँगकर, चुराकर, कैसे भी ला।

    क्या उन्होंने भी उस औरत को देख लिया था?

    मनीश को याद आया, घर के सामने जो आम का बगीचा था, उसके बाहर एक तख़्त पड़ा रहता था। चौकीदार और उसके साथी उस पर बैठकर खैनी फाँकते और ताश पीटा करते थे। इस बरसात में वह ख़ाली होगा। वह जाकर वही उठा लाया।

    तख़्त बारिश के पानी से भीगा हुआ था। आम से झड़ा बौर सड़कर उस पर चिपक गया था। उमा उस पर लेटी तो एक बार लिसलिसाहट ज़रूर महसूस की, फिर बदन से बेतरह झर रहे पसीने ने उसे एकाकार कर लिया। बच रहीं दर्द की उठती-गिरती लहरें और हर ज्वार के बाद शरीर पर रेंगने-काटने का अहसास। जब तक दर्द की लहर उतरकर दुबारा चढ़ने में पंद्रह मिनट का वक़्फ़ा देती रही, देह पर कीड़े रेंगने का अहसास तीव्रता से महसूस होता रहा। उसे लगा, वह औरत दूसरे कमरे में खिसकाए गए पलंग से उठकर, उसके बराबर में लेटी थी। वह उसी ठंडी-नीली उँगलियों का स्पर्श था, जो सहलाने-गुदगुदाने के बजाए बदन पर रेंग-रेंगकर डंक मार रहा था। डरकर वह चीख़ उठी। दर्द ने चीख़ को समेट लिया और उस लिजलिजे-चुँटते अहसास से छुटकारा दिलाने के लिए पाँच-पाँच मिनट पर उठने लगा। जब तक दाइ वहाँ पहुँची, दर्द से निजात का वक़्त बेमानी रह गया था, फिर भी उमा ने उसके दोनों हाथ पकड़कर कहा, “मेरे बदन पर कुछ रेंग रहा है, काटे जा रहा है।

    दाई हँस पड़ी। बोली, यह बोसीदा तख़्त कहाँ से उठा लाए, चीटियाँ ही चींटियाँ भरी पड़ी हैं सड़ी लकड़ी में। वह बढ़िया पलंग कहाँ गया, जिस पर मैंने पहले वाली की जचगी करवाई थी?

    नहीं, वह नहीं, उमा चीख़ पड़ी, उस पर मैं उसका बच्चा ज़िंदा नहीं जन पाऊँगी!

    दाई ने कंधे झटक दिए और अपने काम से लगी। उसके दोनों हाथ अपने बलिष्ठ हाथों में जकड़कर, बच्चा जनने के लिए, सामर्थ्य से बाहर का ज़ोर लगाने के लिए उसे उकसाने लगी। दर्द पूरे उठान पर था। उमा उस औरत से मिन्नत कर रही थी कि वह उसके बराबर से उठ जाए, जिससे वह इस सँकरे तख़्त पर पूरा फैलकर लेट सके और उसके बच्चे को ज़िंदा जन्म दे सके। ओठों ही ओठों में वह कहे जा रही थी, 'इस बार तुम्हारा बच्चा ज़रूर ज़िंदा रहेगा, तुम देख लेना, ज़रूर रहेगा। इस ख़ौफ़ को अपनी आँखों से निकाल दो, मेरे बोसीदे पलंग से उठ जाओ। मुझे अकेला छोड़ दो। मैं वादा करती हूँ, कितनी भी ताक़त लगे, मैं तुम्हारे बच्चे को ज़िंदा जन्म दूँगी।' उमा ने आँखें बंद कीं, दाँत कसे, दाई के हाथों पर नाख़ून गड़ाए और शरीर के निचले भाग को शक्ति का केंद्र बना लिया। पल-भर के लिए उस औरत ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं। उतनी विमुक्ति काफ़ी थी। ख़ौफ़ से आज़ाद होते ही, उसकी देह में एक नई इच्छाशक्ति ने जन्म लिया। शरीर की ताक़त से परे की चीज़ थी वह इच्छाशक्ति, जिसके बल पर, बदन से निकला ख़ून का फव्वारा शिशु को भी बाहर खींच लाया।

    लड़की है।” दाई ने कहा।

    गर्व से उमा का चेहरा दीप्तिमान हो गया। डर, दर्द, बदन पर रेंगती चींटियाँ सब भूलकर वह बुदबुदा उठी, मैं जीत गई। अपनी बच्ची को रोते सुना मैंने। उसने आँखें खोलीं और बच्ची के बजाए औरत को देखा। उसकी आँखें भी खुली थीं और उनका ख़ौफ़ बरकरार था। उमा ने अपनी ग़लती महसूस की। हार-जीत का सवाल कहाँ था? यह जन्म उन दोनों का साझा था। मेरी नहीं तुम्हारी बच्ची, उसने प्रार्थना के स्वर में कहा, एक बार देखो तो उसे, कितनी स्वस्थ है। सुनो उसका जीवन-क्रंदन और इस भय को अपनी आँखों से मिटा दो। प्यार करो उसे और विदा लो।

    ख़ौफ़जदा चेहरे और फटी आँखों के साथ वह औरत हँस दी। अगर फ़व्वारे की तरह उमा का ख़ून बाहर बह रहा होता तो उस हैबतनाक हँसी को देख जम जाता। कँपकँपी तो छूट ही गई। फिर थर-थर, थर-थर, उसका बदन थरथराता ही चला गया।

    मेरा काम ख़त्म हुआ। मुझे इनाम दो, मैं जाऊँ, दाई ने कहा, अब किसी डॉक्टर को बुलाओ। ख़ून गिरना बंद नहीं हो रहा। ताप चढ़ रहा है। यह काम मेरा नहीं, डॉक्टर का है।

    माँजी फिर गुहार मचा उठीं, लेडी डॉक्टर को मार गोली। जा मनीश, किसी मर्द डॉक्टर को ही बुला ला। कुछ तो करेगा। ऐसे मर जाएगी बहू।

    एक बार फिर बरसाती रात के अँधेरे और पानी को कोसता मनीश घर से बाहर निकला।

    कुछ नहीं बदला, उस औरत ने कहा, इच्छाशक्ति मुझमें तुमसे कम नहीं थी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि मेरा बच्चा पहले मरा, मैं बाद में और तुम पहले मरोगा तुम्हारा बच्चा बाद में।

    ऐसा मत कहो, थरथराते बदन, किटकिटाते दाँत और बहते ख़ून को नज़रअंदाज़ करके उमा ने कहा, यह तुम्हारी ही बच्ची है, जिसने मेरी कोख से जन्म लिया है। यह ज़िंदा रहेगी। ज़रूर रहेगी। तुम देखो तो सही एक बार। मनीश जवान नौसिखिया डॉक्टर को लिए कमरे में दाख़िल हुआ। डॉक्टर ने देख और सिर हिला दिया। बहुत देर कर दी। गुर्दे नाकाम हो गए हैं। रक्तस्त्राव रोकने का मेरे पास उपाय नहीं है। यह केस अस्पताल का था। उमा ने सुना और नहीं भी सुना। उसका पूरा ध्यान उस औरत पर केंद्रित बच्ची? उसने आर्तनाद करके कहा।

    आख़िर वह औरत अपना ख़ौफ़-ज़दा चेहरा लिए बच्ची के ऊपर झुक ही गई। उमा उसे एकटक निहारती रही। उस औरत की आँखों का फैलाव कम हुआ, पलकें झपकीं, पुतलियाँ सिकुड़ीं और उनमें आँसू उमड़ आए। फिर दुनिया-भर की ममता और करुणा उनमें भर गई। अब जब उसने उमा को देखा तो उसकी आँखों में दहशत के बजाए करुणा का दर्द लहरा रहा था। उमा का डर जाता रहा। उसने अपनी बाँहें फैला दीं। वह पास चली आई। उसे अपनी बाँहों में थाम उसके बराबर में लेट गई। उमा ने उसके सीने पर सिर रखकर कहा, मैं मरना नहीं, जीना चाहती हूँ

    मैं भी जीना चाहती थी। बहुत कोशिश की थी मैंने।

    जानती हूँ तुम्हारी कहानी। बहुत बार सुन चुकी हूँ।

    भूल जाओ उसे, अब यह तुम्हारी कहानी है। ख़त्म होकर फिर शुरू होने वाली। वह देखो। उसने उसका चेहरा बच्ची की तरफ़ घुमा दिया। हाँ, एक औरत अभी ज़िंदा है, वह जो अभी पैदा हुई है, आख़िरी हिचकी के साथ उमा ने कहा। बच्ची पर टिकी उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं।

    इसके प्राण भी आँखों से निकले। माँजी ने काँपकर कहा।

    सनाका खिंच गया। कोई आगे बढ़कर उन खुली आँखों में छाया ख़ौफ़ और दर्द देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। तभी बच्ची धीमे सुर में रो पड़ी। एक औरत दुनिया में गई। माँजी का मन ममता से भर गया। वे बच्ची को उठाने आगे बढ़ीं। हिम्मत करके उमा की पलकें मूँदने को हाथ बढ़ाया। देखा, चींटियों ने उसके पूरे बदन को ढँक लिया था, पर उसकी आँखों में ख़ौफ़ नहीं, अपार करुणा भरी हुई थीं। उन्होंने मर चुकी औरत की आँखें बंद कर दीं और अभी पैदा हुई औरत को चींटियों के बीच से उठा, उस कमरे में दौड़ गई, जहाँ साध से बना पुराना पलंग रखा था।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 279)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : मृदुला गर्ग
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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