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पत्रकार बुद्धिराम @ पत्रकारिता डॉट कॉम

patrakar buddhiram @ patrakarita Daut kaum

अशोक मिश्र

अशोक मिश्र

पत्रकार बुद्धिराम @ पत्रकारिता डॉट कॉम

अशोक मिश्र

और अधिकअशोक मिश्र

    बुद्धिराम की निगाहें कंप्यूटर पर और ऊंगलियाँ की बोर्ड पर थीं मगर ख़बर थी कि बन ही रही थी...

    वह कहीं और ख़यालों में विचर रहा था। सीट पर सिर्फ़ उसका तन था जबकि मन कहीं और। सोच रहा था कि जिनकी वह दिल से इज़्ज़त करता है, जिनके एक आदेश पर टाइलेट तक रोककर काम करता है, वे उसे आदमी समझते ही नहीं बल्कि ढोर, डाँगर समझकर व्‍यवहार करते हैं। शायद न्‍यूज एडीटर ठाकुर के मन में यह बात घर कर गई है कि वह दलित है। अगर वह दलित है तो इसमें उसकी क्‍या ग़लती। वह भी अन्‍य छात्रों की तरह पढ़ाई करके ही इस पेशे में आया था पत्रकार बनने। उसे लगता है कि अब यह सपना कभी नहीं पूरा होगा। आज उसकी हालत किसी सड़क किनारे बैठे मज़दूर से भी गई गुजरी है। मज़दूर के पास कम से कम स्‍वाभिमान तो है कि तीन पाँच करते ही दूसरा दरवाज़ा देख वहां दिहाड़ी कर लेगा, मगर यहाँ तो उसके अस्तित्‍व को पूरी तरह नकारते हुए बार-बार फटकारा जा रहा है। फिर गाँव और शहर का फ़र्क़ क्‍या...? बुद्धिराम के कान में बार-बार न्‍यूज एडीटर ठाकुर के शब्‍द रह-रहकर बज रहे थे—आपने बिना किसी से पूछे ‘दलितों का घर जलाया’... ख़बर दो कालम में क्‍यो लगाई... आप दलित हैं ये ठीक है मगर यह कोई दलितों का अख़बार नहीं है। इतना ही शौक है तो राजनीति करिए, उनके हकों के लिए लड़िए, संस्‍थान का समय क्‍यों जाया कर रहे हैं? दलित हमारे पाठक नहीं हैं। ये लोग दो टाइम का खाना तो जुटा नहीं पाते फिर ख़रीदकर अख़बार पढ़ना तो दूर की बात है। पत्रकारिता करना है तो जो कहा जाए वही करें अपना दिमाग़ लगाएँ। आपको एक हफ़्ते के लिए सस्‍पेंड किया जा रहा है। एक हफ़्ते बाद फैसला होगा कि आप काम करने लायक हैं या नहीं...

    बुद्धिराम एक दलित परिवार में पैदा हुआ था। उसका घर फ़ैज़ाबाद जिले के सोहावल ब्‍लाक के दुर्जन का पुरवा गाँव में हुआ था। उसकी प्रारंभिक स्‍कूली शिक्षा गाँव की ही एक प्राथमिक पाठशाला में हुई, जहाँ के हेडमास्‍टर रामकुमार दूबे थे।

    दूबेजी की ख़ासियत थी उनकी मूँछें, जिनको वह हमेशा हाथों की चु‍टकियों से ऐंठते ही रहते थे। उनकी एक और विशेषता थी कि वे हर दस मिनट पर खैनी बनाते उसे ठोंकते और मुँह में दबा लेते। सुबह स्‍कूल खुलते ही प्रार्थना के बाद वे साथी अध्‍यापकों के साथ बैठकर गप्पें मारते। दूसरी तरफ़ छात्रों के समूह किताबें खोलकर हो-हल्‍ला कर रहे होते। वैसे छात्र दूबेजी से बहुत घबराते थे। वे पूरे स्‍कूल में मरकहा टीचर के नाम से विख्‍यात थे।

    गाँव के पास के एक प्राथमिक स्‍कूल में बुद्धिराम फटी जाँघिया-छेदही बनियान और फटी किताबें-कापियाँ और मैला-कुचैला झोला लिए पढ़ने जाता और शाम तक वापस घर को लौट आता। बुद्धिराम बचपन से ही दूसरे बच्‍चों से भिन्‍न स्‍वभाव था। अध्‍यापकों को यह बात अच्‍छी तरह पता थी कि यहाँ ग़रीब-ग़ुरबा परिवारों के बच्‍चे पढ़ने आते हैं, जबकि संपन्‍न और खाते पीते घरों के लोग अपने बच्‍चों को कॉन्वेंट स्‍कूलों में पढ़ने भेजते हैं। यही कारण था कि गाँव के इन ग़रीब दलित, पिछड़े और अल्‍पसंख्‍यक परिवारों के बच्‍चों को पढ़ाने की परवाह सवर्ण शिक्षक नहीं करते थे।

    बारह वर्ष का बुद्धिराम पांचवीं उतीर्ण कर आगे की पढ़ाई के लिए ग्राम समाज इंटर कालेज जा पहुँचा। इस बीच उसके भीतर सोचने और समझने की शक्ति भी विकसित हो चुकी थी। बुद्धिराम कालेज का मनुवादी माहौल देखकर और भी दंग रह गया। कालेज के चपरासी से लेकर सारे अध्‍यापक और प्रधानाचार्य तक सभी पदों पर बाभन, ठाकुर और कायस्‍थ जातियों के लोग थे। मामला सिर्फ़ यही तक सीमित नहीं था बल्कि दिखावे के लिए एक दो टीचर निचली जातियों के भी थे।

    कॉलेज के ज़्यादातर अध्‍यापकों के मन में दलित या पिछड़े बच्‍चों के प्रति जाने कैसी दुर्भावना भरी हुई थी कि ऐसे किसी भी छात्र को देखते ही वे नफ़रत से भर जाते थे। बुद्धिराम कालेज में पढ़ाई से लेकर पानी पीने तक क़दम-क़दम पर सामाजिक भेदभाव और व्‍यवहार के स्‍तर पर गैर बराबरी का सामना कर रहा था। इस सबने उसके भीतर पढ़ाई के प्रति एक विरक्ति की भावना को जन्‍म दिया था। कालेज में पूरे दिन बुद्धिराम किताब खोलकर सामने रखे रहता था मगर बाल मन का हाहाकार कम होने का नाम ही नहीं लेता था।

    बुद्धिराम कॉलेज के दो तीन अध्‍यापकों के चेहरे देखकर ही मन ही मन सिहर उठता था। ऐसी ही एक घटना उसे याद है जब गणित के अध्‍यापक जी.पी. सिंह ने कहा कि— ‘अबे तय वाभन ठाकुर के इसकूल मा पढि़बै, अरे ससुर जाए के कहूँ गाय भैंस चराय के दूध बेंच...’

    ‘साले सूअर की औलाद वाभन, ठाकुर कय बराबरी कइके अंबेडकर बनय चला हय...’

    ए‍क दिन क्‍लास में ही जी.पी. सिंह ने सिर्फ़ एक सवाल करके लाने पर बुद्धिराम को वहशियों की तरह सिरसैया की छपकी से इस बुरी तरह मारा था कि उसका हाथ लहूलुहान हो गया। कई दिन उसकी माई रेंड का पता और हल्‍दी तेल लगाती रहीं, तब जाकर हफ़्तों में ठीक हुआ था उसका हाथ। उसके बापू तो इस घटना से खासे उद्वेलित हो गए थे। वे कई बार कहते थे—‘इ हमार जौन सामाजिक व्‍यवस्‍था हय वहिमा वाभन ठाकुर का छोड़ बाकी सब मनई ढोर डाँगर हैं। मगर अब जे यहि दुनिया मा आय गवा चाहे जैसे ओका जियय का तो परिबे करी।’

    बुद्धिराम सारी सामाजिक प्रताड़नाओं और उपेक्षापूर्ण व्‍यवहार को रोजमर्रा की ज़िंदगी में जैसे सांस ली जाती है जीने के लिए उसी तरह सब कुछ पीकर, जज्‍ब कर स्‍कूल जाता रहा। अच्‍छी कापी लिखने के बावजूद कभी भी उसे बेहतर अंक नहीं मिला। इसे भी वह सामाजिक विद्वेष की रणनीति का षड़यंत्र मानकर चुप ही रहा। वजह भी थी उसकी अपनी ग़रीबी। बापू के पास अधिया बटाई के थोड़ा बहुत खेत थे, ऊपर से तक़रीबन चार पाँच किलो एक भैंस का दूध और घी जिसे वे ख़ुद खाकर घर का ख़र्चा चलाने के लिए अपने पास रख लेते थे। दूध तो साकेत डेरी की गाड़ी सुबह आकर मुहारे-मुहारे से ले जाती। बापू अक्‍सर आधी टाँग वाली लुंगी और दर्ज़ी से सिलवाई मिरजई पहने रहते।

    बापू के कांधे पर एक गमछा रहता मौसम चाहे जाड़ा, गर्मी या बरसात कोई भी हो यही उनकी पोशाक थी। माँ सामान्‍य सी सूती साड़ी ब्‍लाउज वाले पहनावे में रहती। बचपन में लगभग दस साल की उम्र तक बुद्धिराम जाँघिया बनियान पहने नंगे ही घूमा करता था। कपड़े तीज-त्‍यौहार होली-दीवाली को छोड़कर मिले हों उसे याद नहीं। गाँव में सब कुछ था मगर कमाई के साधन नहीं थे। यही गाँव की सबसे बड़ी समस्‍या थी। कुछ लोग सुबह होते ही सा‍इकिल उठाकर मेहनत-मज़दूरी के लिए पास के क़स्‍बे या फ़ैज़ाबाद शहर की ओर चल देते थे, जहाँ कुछ कुछ काम मिल ही जाता था। ख़ैर दिन, हफ़्ता, महीना और साल दर बीतता रहा और देखते-देखते बुद्धिराम ने जैसे तैसे इंटर पास कर लिया।

    मंदिर मंडल वाला समय :

    बुद्धिराम देख रहा था कि यह 1980 का समय था जब मंदिर था मंडल और ही राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ था। सब कुछ बहुत शांत चल रहा था। इमरजेंसी अर्थात् 1975 से लेकर 1977 के दौरान इंदिरा गांधी के लाड़ले बेटे और उसकी उच्‍छृंखल मंडली ने राजनीति के शक्ति केंद्रों पर कब्‍जा कर लिया था मंत्रियों, मुख्‍यमंत्रियों को ऊँगली के इशारे पर नचाता। कई वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता तो लाड़ले बेटे के जूते तक उठाते और पहनाते। इसी दौर में बीस सूत्रीय कार्यक्रम के नाम पर नौजवानों और साठ साला बूढ़ों की पकड़कर नसबंदी कर दी गई। जनता में इंदिरा सरकार के प्रति ख़ासा आक्रोश भरता जा रहा था। उसी दौर में बुद्धिराम के गाँव में सुबह संघ की शाखा लगा करती थी, जिसमें दस बरस से ऊपर के किशोर बच्‍चे भाग लिया करते थे।

    अचानक एक सुबह-सवेरे पुलिस ने धावा बोलकर भगवा ध्‍वज-लाठी दोनों को निकालकर सारे बच्‍चों को डराकर भगा दिया। बच्‍चों से काफ़ी धींगड़ शाखा के सूत्रधार संचालक लल्‍लन भैय्या को पकड़ ले गई। जनता इमरजेंसी के नाम पर किए जा रहे ज़ुल्‍मों-सितम से आजिज़ चुकी थी। देश में इमरजेंसी हटने के बाद चुनाव होते ही आम आदमी ने नई नवेली जनता पार्टी को सत्‍ता की बागडोर सौंपी मगर जनता पार्टी सरकार नेताओं की अंतरकलह के चलते गिर गई थी। इमरजेंसी के दर्द को पूरी तरह से भूलकर एक बार फिर देश की जनता ने गांधी नेहरू परिवार को सत्‍ता सौंप दी थी।

    यही वह समय था जब प्रेम पर अघोषित सेंसरशिप लगा दी गई थी जिसके चलते अधिकांश संपादक विरोध की मुद्रा छोड़कर केंचुए की मानिंद लगे थे। इसी दौरान एक पागल अक्‍सर गाता रहता...

    इसी देश की एक थी रानी

    उसके दो थे राजदुलारे

    नाना राजा माँ भी रानी

    छोटे ने फिर ये मन में ठानी

    करता फिरता था मनमानी

    पढ़ा लिखा कुछ ख़ास नहीं था

    दसवीं भी वो पास नहीं था

    तबियत का शौकीन बहुत

    आदत का रंगीन बहुत

    फिर एक दिन ऐसा झोंका आया

    जिसने किया उसका सफ़ाया।

    साकेत महाविद्यालय के दिन :

    बुद्धिराम ने अपनी बदहाली और परिस्थितियों से लड़ते भिड़ते वर्ष 1980-81 में फ़ैज़ाबाद स्थित कामता प्रसाद सुंदरलाल साकेत महाविद्यालय में बी.ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश ले लिया था। यह विद्यालय पढ़ाई-लिखाई के लिए कम गुंडागर्दी के लिए अधिक जाना जाता था। यहाँ का प्राचार्य संस्‍कृत विभाग का अध्‍यक्ष था जो कि ख़ुद को दुष्‍यंत की जगह रखकर हर लड़की में शंकुलता का अक्स निहारता था। वह क्‍लास में कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम पढ़ाते समय स्‍त्री सौंदर्य का वर्णन बेहद रस लेकर करता और उस दौरान उसकी निगाह छात्राओं के वक्ष की ओर होतीं।

    इस बीच बुद्धिराम ने देखा कि छात्र संघ के चुनाव हुए और एक साल गोंडा जिले का एक नामी गुंडा छात्र आनंद भूषण सिंह छात्र संघ महासचिव के रूप में चुना गया। छात्रों के बीच दबी जबान से चर्चा थी कि जीतना तो सुनील शुक्‍ला को था लेकिन अज्ञात लोगों ने उसकी गोली मारकर हत्‍या करवा दी और फिर आनंद भूषण चुनाव जीता। आनंद भूषण की जीत का एक और कारण था कि उसने तमाम छात्रों को इस कदर डरवा दिया था कि लोगों ने मन मसोसकर उसे वोट दे दिया। छात्र संघ छात्रों के हित के लिए काम करने में असफल रहा। छात्र संघ की उपयोगिता छात्रों के हित में रहकर अध्‍यक्ष और मंत्री के लिए कमाने खाने का जरिया बन गई थी। बुद्धिराम सोहावल से दून एक्‍सप्रेस पकड़कर बारह बजे के आस-पास महाविद्यालय पहुँचता।

    महाविद्यालय का भी हाल गाँव के समाज जैसा ही था। यहाँ भी दलित छात्रों के प्रति प्राध्‍यापक हिक़ारत का भाव रखते और ऐसे छात्रों को देखते ही नाक-भौं सिकोड़ते या फिर किसी तरह टरका देते। देखते ही देखते चार साल बीत गए और अब बुद्धिराम को समाजशास्‍त्र में एम.ए. की डिग्री मिल गई थी। पोस्‍ट ग्रेजुएशन की डिग्री मिलने के बाद बुद्धिराम कुछ उत्‍साह में था कि शायद किसी इंटर कालेज में लेक्‍चर की नौकरी मिल जाए। इसी बीच नौकरियों के लिए आवेदन देते—फ़ार्म भरते तीन साल बीत गए पर कुछ हुआ। एकाएक उसे पंडितपुर के रमणक जूनियर हाईस्‍कूल में सहायक अध्‍यापक एल.टी. ग्रेड में रख लिया गया जिसके मेहनताने के रूप में तीन सौ रुपए मिलते। वर्ष 1987-88 में वह बीएड का फ़ार्म भरता है और उसे अकबरपुर के बीएनकेबी महाविद्यालय में दाख़िला मिल जाता है।

    बीएड की डिग्री मिलने के बाद बुद्धिराम को दुनिया अपनी मुट्ठी में लगती है। वह उत्‍साह में आकर कई ऐडेड कालेजों में अप्‍लाई करता है मगर हर जगह डोनेशन यानी अप्रत्‍यक्ष घूस के नाम पर उनसे एक लाख़ रूपए की मांग की जाती है। युवा होने के बावजूद बुद्धिराम को के बराबर शौक था। धीरे-धीरे बुद्धिराम को साहित्‍य और पत्र-पत्रिकाओं से लगाव हो जाता है। वो प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, रेणु, जयशंकर प्रसाद समेत एक-एक कर सभी को पढ़ डालता है। बैठे-बैठे एक दिन वह सोचता है कि अध्‍यापन के स्‍थान पर अगर पत्रकारिता करे तो क्‍या अच्‍छा हो? यह विचार उसके भीतर सपना बनकर पलने लगा है। वह सोचता है कि माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, रघुवीर सहाय, अज्ञेय, राजेंद्र माथुर और महात्मा गांधी समेत कई महान विचारक अपने जीवन के आरंभिक काल में पत्रकार रहे हैं...

    बुद्धिराम को लगा कि पत्रकारिता में कलम एक ऐसा हथियार है जिसके माध्‍यम से समाज को जागरूक बनाया/बदला जा सकता है।

    दलदल अख़बार का :

    अंतत: बुद्धिराम एक दिन ठान लेता है कि वह अब पत्रकार बनकर ही दम लेगा। एक दिन अचानक पास के क़स्‍बे में एक साहित्यिक संस्‍था के वार्षिक समारोह में जनपद के एकमात्र दैनिक जनमोर्चा के कामरेड संपादक आनंद सिंह मुख्‍य अतिथि के रूप में आते हैं। यहाँ जलपान के दौरान बुद्धिराम लपककर उन्‍हें नमस्‍कार कर अपने मन की बात उगल देता है। वे धीरे से मुस्‍कुराते हैं और कहते है—‘देखिए हमारा बहुत ही छोटा और सहकारिता के आधार पर संचालित देश का एकमात्र हिंदी दैनिक है। यहाँ पर काम ज़रूर सीख सकते हैं लेकिन कोई स्‍टाईपेंड या वेतन दे पाना अख़बार के लिए संभव नहीं होगा। आप किसी दिन आकर दफ़्तर में मिलें तो मैं न्‍यूज एडीटर विनय मोहन जी को बोल दूंगा।’ अगले दिन ही वह सिंह साहब से मिलता है। वे इंटरकाम पर ही न्‍यूज एडीटर को निर्देश दे देते हैं।

    बुद्धिराम जैसे ही न्‍यूज एडीटर विनय मोहन के कमरे में प्रवेश करता है कि वे उसे नख से शिख तक किसी नायिका की भांति देखते हैं। कहते हैं बैठिए। वे बुद्धिराम से उसकी शिक्षा-दीक्षा, पारिवारिक स्थिति के बारे में जानकारी लेते हैं। उसे अगले दिन बारह बजे दोपहर से साँए छह बजे तक बैठने और पत्रकारिता का पहला बुनियादी पाठ प्रूफ़ रीडिंग सीखने का निर्देश दिया जाता है। बुद्धिराम अज्ञाकारी शिष्‍य की भांति पूरे प्राणप्रण से प्रशिक्षण में जुट जाता है। संपादकीय सहकर्मियों को जब पता चलता है कि एक कारसेवक काम सीखने चुका है, तो अगले दिन से वे अपने हिस्‍से का काम बुद्धिराम के आगे फेंककर दोपहर बाहर से तीन का शो देखने चल देते हैं। संपादकीय विभाग वाले ट्रेनिंग के लिए आने वाले नए आगंतुकों को कूटभाषा में ‘कारसेवक’ कहते थे। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो किसी कारसेवक के आते ही दफ़्तरवालों के पौ बारह हो जाते थे। बुद्धिराम ने देखा कि बड़ा ही पुराना टीनशेड वाला दफ़्तर था जो गर्मी में झुलसाकर रख देता था। गर्मी के दिनों में आदमी का तेल निकल जाता था। दफ़्तर में दो पुराने टेलीप्रिंटर थे जिन पर वार्ता—भाषा के समाचार लगातार आते रहते और किर्र-किर्र-किर्र की आवाज़ होती रहती। दफ़्तर की कुर्सी और मेज़ ही नहीं बल्कि पंखे भी काफ़ी बाबा आदम के ज़माने के थे जिस पर बैठकर लोग अपना काम जैसे-तैसे निपटाते।

    बुद्धिराम सारा काम पूरी तन्‍मयता से करते हुए न्‍यूज एडीटर मोहन जी के हर निर्देश का अक्षरश: पालन करता। विनय मोहन जी उन समाचार संपादकों में से थे जो कि अख़बार में प्रूफ़, वर्तनी या फिर शीर्षक की किसी भी ग़लती के लिए उप संपादकों को माफ़ नहीं करते थे। किसी तरह की ग़लती करने पर सही क्‍या है उसे पूरे तर्क के साथ समझाते हुए ही डाँटते। उनके द्वारा सिखाए गए लोग कई बड़े प्रादेशिक अख़बारों में काफ़ी बेहतर काम कर रहे थे। उसे अच्‍छी तरह याद है कि जब उसने एक बार—‘तमंचे की नोंक पर मुसाफ़िर को लूटा’ शीर्षक लगा दिया था। उस समय उन्‍होंने डाँटते हुए कहा कि ‘चाकू की नोंक तो होती है मगर तमंचे की नहीं।’ इतना कहकर वे अपने काम में मशग़ूल हो गए। विनय मोहन जी ऐसे पत्रकारों में थे जो कि हर समय अख़बार को जीते थे। वे कभी किसी भी कर्मचारी पर अकारण रूआब दिखाने का प्रयास नहीं करते थे। उनके भीतर काम के प्रति बेहद लगाव, स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण और ग़ज़ब का उत्‍साह देखने को मिलता। ठीक यही स्थिति आनंद जी की थी जिन्‍हें दफ़्तर का हर सदस्‍य पिता तुल्‍य सम्‍मान देता। अख़बार की विचारधारा सर्वहारा और मार्क्‍सवाद के साथ जुड़ी थी। जनमोर्चा पढ़कर ही लोग शहर, कचहरी या विश्‍वविद्यालय के लिए निकलते। अगर किसी कारण शहर में बंद, हड़ताल, धरना-प्रदर्शन-जुलूस होता, तो उसकी ख़बर अख़बार में ज़रूर रहती।

    अख़बार सिर्फ़ शहर बल्कि सुदूर गाँवों में सड़कों के किनारे चाय के ढाबों और पान की गुमटियों तक भी जाता था। ऐसी ही जगहों पर आकर गाँवों के लोग जनमोर्चा पढ़कर देश-दुनिया और जिले की ख़बरों से रूबरू होते थे।

    जनमोर्चा पढ़े बिना लोगों का खाना नहीं हज़्म होता था। सुबह शहर के चौराहों पर खड़े होकर हाकर आवाज़ लगाता—वकीलों में मारपीट, हड़ताल से कचहरी में काम ठप...डीएम से नाराज़ मुख्‍यमंत्री ने ली क्‍लास...और फिर देखते ही देखते उसके हाथ में लिया अख़बार फटाफट बिक जाता। अख़बार बेच वह तुरंत आगे बढ़ जाता क्‍योंकि कई बार वह जिन ख़बरों को चिल्‍लाकर अख़बार बेचता वे ख़रीदने के बाद ढूँढने से भी नहीं मिलती थी।

    बहादुशाह ज़फ़र की दिल्‍ली :

    जनमोर्चा में ट्रेनिंग समाप्‍त होते ही बुद्धिराम फ़ैज़ाबाद में कोई संभावना देख सीधे दिल्‍ली चला आया। यहां कविता-कहानी लिखने के चलते कुछेक शीर्षस्‍थ कहानीकार उसे जानने लगे थे। ऐसे ही लोगों में थे दिल्‍ली निवासी चर्चित कथाकार और पत्रकार हिमांशु दिव्‍याल। दिव्‍यालजी दिल्‍ली से नए-नए शुरू हुए हिंदी दैनिक राष्‍ट्रीय समाचार के एसोसिएट संपादक के रूप में एडीट पेज और मुद्दों पर केंद्रित वीकली सप्‍लीमेंट के प्रभारी थे। हिमांशुजी का बौद्धिक हलकों में ख़ासा नाम था।

    उनकी गिनती देश के चोटी के पत्रकारों में होती थी। वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले नवांकुर रचनाकारों और पत्रकारों का मार्गदर्शन करते और उन्‍हें नौकरी दिलाने का प्रयास करते। नई दिल्‍ली स्‍टेशन से फ़ोन कर बुद्धिराम हिमांशुजी के घर दिलशाद गार्डन जा पहुँचता है। हिमांशुजी आए और बहुत ही अपनापे के साथ मिले। कंधे पर हाथ रखते हुए बोले कि सब ठीक हो जाएगा थोड़ा धैर्य रखो। उनका पहला सवाल था कि तुम रहोगे कहाँ जिसका जवाब वह ठीक से दे पाया। आख़िर देता भी कैसे इस विषय में सोचा भी नहीं था। अंतत: उन्‍होंने अपने एक विधुर मित्र के घर उसके रहने की व्‍यवस्‍था करा दी। लगभग एक हफ़्ते के बाद हिमांशुजी ने राष्‍ट्रीय समाचार के प्रबंधन से बातचती कर उसको ट्रेनी जर्नलिस्‍ट के तौर पर रखवा दिया था। अख़बार में ट्रेनी की सेलरी दो हज़ार रूपए प्रति माह थी। संपादक ने उसकी ड्यूटी बिहार डेस्‍क पर लगा दी थी। यहाँ प्रभारी के रूप में सारा कामकाज रिंदजी नाम के एक पुराने शायर देख रहे थे। उन्‍होंने बुद्धिराम से प्रारंभिक जानकारी ली और बोले कि तुम तो शक्‍ल से ही गंवार और जाहिल दिखते हो ऐसे में क्‍या करोगे पत्रकारिता। पत्रकारिता तो बड़ा जटिल काम है। रिंदजी धीरे से बुदबुदाते हुए बोले—‘जाने कहाँ-कहाँ से जंगली लोग चले आते हैं।’ महात्‍मा गांधी तो मर गए पर दलितों का दिमाग़ ख़राब कर गए। बुद्धिराम को अखरा तो बहुत। उसका मन किया कि वह रिंदजी को सीट से उठाकर फेंक दे मगर मन मसोसकर रह गया। डेस्‍क पर कुल जमा तीन लोग थे। एक सी.पी.एन. सिंह दूसरे नरोत्तम शर्मा और तीसरा प्राणी बुद्धिराम ख़ुद। रिंदजी कुर्सी डालकर बस बैठे रहते थे। डेस्‍क पर तार, कोरियर या फैक्‍स से ख़बर आने पर जिसे वे खाली देखते उसे पकड़ा देते। ख़ुद सारे समय पत्रिकाएँ—अख़बार पढ़ते या कोई मोटी किताब यही उनकी शैली थी। पेज जब बनकर आता तो एक सरसरी नज़र शीर्षकों और फ़ोटो कैप्‍शनों पर डालकर ओ.के. कर देते। एक दिन साथी नरोत्‍तम शर्मा के साथ चाय पी रहा था तो वह बोला बुद्धिरामजी मीडिया में ग़रीबों-शोषितों की बात करने वाला कोई नहीं है। मीडिया पर सत्‍ता के साथ-साथ बिल्‍डरों, ठेकेदारों और नवधनाढ़यों का कब्‍जा हो चुका है। पिछले दस बरसों में मीडिया को करिअर के रूप में देखा जाने लगा है। इसमें परिवारवाद, करिअर के अलावा रसूख और ग्‍लैमर का भी प्रवेश हो चुका है। पत्रकारिता की शिक्षा अब अमेरिकन और यूरोप के सिद्धांतों पर दी जा रही है।

    निष्‍पक्ष और सरोकार वाली पत्रकारिता के दिन लद चुके हैं। इसके ज़िम्‍मेदार उपभोक्‍तावाद और बाजारवाद हैं। आज तो बस फील गुड़ वाली पत्रकारिता की जा रही है।

    अब बुद्धिराम को राष्‍ट्रीय समाचार में काम करते हुए लगभग छह महीने से चुके थे। उसके सामने पत्रकारिता की बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक बातें करने वाले साथियों के दोहरे आचरण और दोमुंहेपन, चुगलहेपन, उखाड़-पछाड़, ईर्ष्‍या–द्वेष, जातिवाद की दिलों में बैठी खाईयां सीधी-सीधी नज़र रही थीं। उसे साफ़-साफ़ दिख रहा था कि डेस्‍क इंचार्ज, न्‍यूज एडीटर, फ़ीचर संपादक, मैग्‍जीन हेड, ब्‍यूरो चीफ़, चीफ़ रिपोर्टर जैसे किसी भी निर्णायक पद पर एक भी दलित या पिछड़ी जाति का व्‍यक्ति नहीं था। साठ व्‍यक्तियों के संपादकीय में एकाध लोगों को छोड़कर कोई भी दलित या अल्‍पसंख्‍यक नहीं था। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो पूरा का पूरा मीडिया वाभन, ठाकुर, लालाओं के हाथ में था। यही लोग अख़बार के नियंता थे। इत्तफ़ाक़ से अगर उस जैसे एकाध लोग काम कर भी रहे थे तो वे किसी ख़बर को रोकने/छापने या प्रकारांतर से नीतियों को प्रभावित कर पाने की स्थिति में नहीं थे। इस अख़बार को एक फाइनेंस कंपनी का मालिक चला रहा था जिसका उद्देश्‍य अपने मीडिया घराने के माध्‍यम से सत्‍ता के गलियारे में अपनी स्थिति और पहुँच को मज़बूत बनाना था। यही वजह थी कि अख़बार को ख़ुशामदी स्‍वर वाला माना जाता था।

    जाहर वीर गोगाजी टाइम्‍स :

    दो साल बीतते-बीतते बुद्धिराम एक नए अख़बार जेवीजी टाइम्‍स (जाहर वीर गोगाजी) में पहुँच गए। इस बार उन्‍हें एडीट पेज पर काम दे दिया गया था। एडीट पेज के इंचार्ज सहायक संपादक आर.के. मिश्र नाम के एक चोटीधारी पंडितजी थे। पंडितजी पूरे कर्मकाँडी वेदपाठी ब्राह्मण थे। वे प्रतिदिन सुबह चंदन का टीका लगाकर और धोती कुर्ता पहनकर दफ़्तर आते। ये सहायक संपादक महोदय अख़बार में आरएसएस के एजेंट के रूप में रखे गए थे। इन महोदय का एकमात्र काम और उद्देश्‍य भाजपाई विचारधारा के विद्वानों के लेख छापना तथा मार्क्‍सवादियों को गाली देना था। यहाँ भी सभी प्रमुख पदों पर वही स्‍वर्ण भस्‍मासुर बैठे हुए थे। एक दिन पंडितजी की अनुपस्थिति में बुद्धिराम ने अंबेडकर की विचारधारा को आगे ले जाने वाला एक दलित विद्वान का लेख छाप दिया। लेख छपने से पहले संपादक उनियालजी को दिखा दिया था। दूसरे दिन पंडितजी ने दफ़्तर आते ही इतना हंगामा किया कि पूछो मत। माफ़ी मांग लेने के बावजूद उन्‍होंने बुद्धिराम वहाँ से हटवाकर हरियाणा डेस्‍क पर फिकवा दिया था।

    हरियाणा डेस्‍क का इंजार्च एक मुस्लिम शख़्स था जो कि काफ़ी मिलनसार और अपने काम से काम रखता था। एक माह बाद ही वह किसी और अख़बार में बड़े पद पर चला गया था जिसके बाद वरिष्‍ठता के नाते बुद्धिराम को प्रभारी बना दिया गया। इसके साथ ही यह निर्देश भी जारी किया गया कि ख़बरों के विषय में न्‍यूज एडीटर दुबेजी से निर्देश प्राप्‍त करें।

    दुबेजी ने मिलते ही कहा—‘देख भाई तू दलित है सो तो ठीक है पर अख़बार को चौपट मत करियो। मायावती, लालू, मुलायम की अंट-संट क़िस्‍म की ख़बरें दिखाकर भेजियो नहीं तो मेरी ज़िम्‍मेदारी ना है।’ वह स्‍वीकृति में सिर हिलाकर गया।

    बुद्धिराम को लगता कि उसके गांव के प्रधान लंबरदार और यहाँ के पढ़े-लिखे बड़े पत्रकारों की सोच में कोई बहुत अंतर नहीं है। अब ढकोसला है। सारा परिवेश सैद्धांतिक वाग्‍जाल-भ्रमजाल और छद्म से भरा है। दो साल पूरा होने से पहले ही यह अख़बार अपनी मूल फाइनेंस कंपनी के संकट में आने के चलते भरभराकर गिर गया था। अचानक ही अख़बार बंद होने से बुद्धिराम और कई दूसरे साथियों के सामने अस्तित्‍व का संकट पैदा हो गया था कि कहाँ जाएँ और क्‍या करें।

    अंतत: बुद्धिराम फिर हिमांशुजी के सामने दयनीय, कातर और निरीह व्‍यक्ति की भांति बैठा हुआ था। हिमांशुजी ने फ़ोन मिलाकर जाने किससे बात की और उससे मुख़ातिब हो बोले तुम कल नरसिंह नारायण से मिल लेना। यह कहते हुए उन्‍होंने एक स्लिप पकड़ा दी जिस पर उन सज्‍जन का पता लिखा हुआ था। अगले ही दिन वह नारायणजी से मिलने पहुँच गया। वे एक छोटा साप्‍ताहि‍क ‘जनवाणी’ निकालते थे जो उत्‍तराखंड में ख़ासा लोकप्रिय था। उन्‍होंने तुरंत ही कुछ प्रारंभिक जानकारियाँ लीं जिसे हर नए मिलने वाले व्‍यक्ति को देना ही पड़ता था। अगले दिन से वो नारायणजी के दफ़्तर पहुँच गया। वह उसी दफ़्तर में रहकर काम करता और शाम को एक छोटे से कमरे में जाकर सो जाता। नरसिंह नारायण बहुत ही शालीन व्‍यक्ति थे। वह सामाजिक मुद्दों और सरोकारों वाली पत्रकारिता करते थे। वे हर स्‍टोरी को देखकर उसे नए ऐंगिल से लिखवाते। यहाँ उसे बहुत कुछ सीखने को मिल रहा था। उनका व्‍यवहार भी पिता जैसा था। इसके बावजूद बुद्धिराम को लगा कि यहां कम वेतन में कब तक काम सीखता रहेगा इसलिए वह इधर-उधर बैठे साथियों से फ़ोन पर बात भी करता कि किस अख़बार में जगह खाली है। अचानक एक दिन वह एक विज्ञापन पढ़ता है कि उत्‍तर भारत के एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जन जागरण को उप संपादकों की आवश्‍यकता है। बुद्धिराम ने भी एप्‍लाई कर दिया।

    अर्से बाद लिखित परीक्षा के साथ-साथ साक्षात्‍कार हुआ। लगभग माह भर के भीतर ही उसका बुलावा गया। वह फिर से एक नए अख़बार के दफ़्तर में था। जन जागरण में न्‍यूज एडीटर अजय ठाकुर थे, उन्‍होंने बुद्धिराम को डाक डेस्‍क पर भेज दिया। उसे पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश संस्‍करण से संबद्ध किया गया, जहाँ हापुड़ एडीशन के पेजेज निकालने का जिम्‍मा दिया गया। यहाँ कुछ हद तक प्रोफेशनल क़िस्‍म का वातावरण था।

    अचानक एक दिन उसके साथ काम कर रहे प्रशांत वर्मा ने कहा कि यहाँ सब कुछ ठीक है ऐसा मानना बेवक़ूफ़ी होगी। यहां का जीएम बिहार का है सो चुन-चुनकर बिहारियों को ही प्रमोशन और अच्‍छा इंक्रीमेंट दिया जाता है। बाकी योग्‍यता गई तेल लेने। उसी ने कहा कि अपनी पंद्रह साला पत्रकारिता में आज भी उप संपादक से आगे नहीं बढ़ पाया हूँ। सच्‍चाई तो यह है कि नौकरी में कौन कितनी ऊँचाई पर जाएगा यह जातिवादी समीकरणों, उसके तेलीपन, चंपुअई पर निर्भर करता है।

    वर्मा बोला पिछले दस बरसों के दौरान हर अख़बार में लड़कियों की संख्‍या काफ़ी बढ़ गई है। न्‍यूज चैनलों में तो लड़कियों का ख़ासा बोलबाला है। आख़िर न्‍यूज चैनलों की टीआरपी तो ख़ूबसूरत एंकरों से ही बढ़ती है। लड़कियों के मामले में हर इंचार्ज काफ़ी उदार हो जाता है। मौक़ा पड़ने पर ये लड़कियाँ सारे छिछोरेपन करने को तैयार रहती हैं। उसने देखा कि इसी दफ़्तर में समाचार संपादक के पास एक महिला उप संपादक प्रतिदिन कभी गाजर का हलवा, कभी दही बड़ा कुछ कुछ पकवान लेकर पहुँचती। दिन भर में एक-दो बार सायास वह अपना दुपट्टा अपने वक्ष से ज़रूर हटाती। न्‍यूज एडीटर जो दूसरे लड़ाकों का ख़ून पी जाता था वह इन लड़कियों के आगे हें...हें...हें...करता रहता। ज्‍यादातर लड़कियों को फ़ीचर डेस्‍क पर शाम सात बजे तक ही रखा जाता। चाय सत्र के दौरान एक दिन बुद्धिराम को प्रशांत ने बताया कि कई बार यहाँ टायलेट में कंडोम निकल चुके हैं। इतने में खेल डेस्‍क वाला शुक्‍ला बोला—तीस साल तक माँ-बाप लड़कियों की शादी नहीं करेंगे तो क्‍या होगा? आख़िर उनका भी तो मन है, जीती जागती दुनिया की इंसान तो वे भी हैं। उनके भीतर भी आनंद की इच्‍छा कुलांचे भरती है। प्रशांत ने कहा यार बुद्धि यहाँ एक से एक केंचुआ, घोंघा, भिड़, बर्रे, कीड़ा, बीछी टाइप के लोग हैं, जो आदमी के हर मूवमेंट को सूंघते रहते हैं। ये सिर्फ़ अपना फ़ायदा देखते हैं। मौक़ा पड़ने पर काट खाते हैं। कौन मोबाइल पर कितनी देर बतियाता है, कौन कित्‍ती बार चाय पीने बाहर जाता है, लोगों के हगने, मूतने का हिसाब रखने वाले मैनेजमेंट के इनफ़ार्मर भी यहाँ हैं। यहाँ जितना काम ज़रूरी है उतना ही डेस्‍क इंचार्ज को मक्‍खन लगाना भी।

    एक दिन सीनियर संपादक दादा बुद्धिराम से कहने लगे कि अब जमाना बदल गया है—‘पहले मालिक संपादक के केबिन में पूछकर जाता था पर अब तो वह सीधे दिन में दस बार इंटरकाम पर बुलाता रहता है।’ पीढि़यों के बदलाव के साथ ही अब संपादकों ने अपनी नई भूमिका के तहत अख़बार मालिकों के हितों के लिए काम करना शुरू कर दिया है। मालिकों को सस्‍ते दरों पर न्‍यूजप्रिंट दिलाने से लेकर, सस्‍ती भूमि, निजी सुविधाएँ दिलाने, विज्ञापन जुटाने, हवाई यात्राएँ प्रायोजित करने के काम मुख्‍य हो गए हैं। सुविधाएँ जुटाने पर लात मारकर निकाले जाने वाले संपादक अब ढूँढने से नहीं मिलेंगे और तो और अपने स्‍टाफ़ को ठीक-ठीक वेतन और सुविधाएँ, वातावरण दिलाने के लिए लड़ने वाले संपादक अब समाप्‍त हो चले हैं। अब कोई संपादक इस्‍तीफ़ा नहीं देता बल्कि सारे दंद-फंद कर येन-केन प्रकारेण अपनी कुर्सी बचाए रखते हैं। संपादक का बस नाम रह गया है उसकी भूमिका बदलकर अब सिर्फ़ सीईओ या मैनेजर की हो गई है। संपादक की भूमिका बदली जरूर है मगर आज भी कुछ ऐसे संपादक हैं जो पद की गरिमा को काफ़ी हद तक बचाए हुए हैं।

    इसी अख़बार में काम करते हुए एक दिन बुद्धिराम को मौखिक निर्देश दिया गया कि ख़बरों के शीर्षक सही ढंग से लगाएं और मायावती की ख़बर को ज़रूरत से ज्‍यादा तवज्‍जो देने की जरूरत नहीं है। एक दिन सीजीएम का नोटिस जाता है कि सभी संपादकीय सह कर्मियों को सूरजकुंड में प्रतिदिन दस बजे से दो बजे तक चलने वाली तीन दिवसीय विशेष कार्यशाला में अनिवार्य रूप से हिस्‍सा लेना है। कार्यशाला के लिए प्रतिदिन जाने की व्‍यवस्‍था नोएडा स्थि‍त कार्यालय परिसर से प्रात: नौ बजे की जाएगी।

    कार्यशाला के पहले दिन ही समूह संपादक अजय गुप्‍ता डायस पर आते ही बोले— ‘जैसा कि आप सभी को मालूम है कि हमारा अख़बार दिन प्रतिदिन सफलता की ओर अग्रसर है और हम कानपुर देश के आख़िरी छोर जम्‍मू और दसरे छोर कोलकाता तक अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चुके हैं। इस सबके पीछे मार्केटिंग टीम, कुशल संपादकीय टीम का बहुत बड़ा योगदान है।’ तभी पीछे से धीमे स्‍वर में किसी ने कमेंट किया कि—‘तभी तो संपादकीय को साल में दस परसेंट और मार्केटिंग को दो बार बीस परसेंट का इंक्रीमेंट मिलता है।’

    अजय गुप्‍ता ने संपादकीय टीम के लिए कुछ नए दिशा-निर्देश जारी किए—

    1. ख़बरों के साथ आकर्षक फ़ोटो का प्रयोग करें।

    2. सेलीब्रेटीज के समाचार बढ़ाएँ उन्‍हें बेहतर ढंग से डिस्‍प्‍ले दें।

    3. पीआर विज्ञप्तियों को समाचार में बदलें।

    4. किसानों की आत्‍महत्‍याओं और जन संघर्षों की ख़बरें कम लगाएँ।

    5. रेवेन्‍यू रिलेटेड न्‍यूज को सभी पेजों पर पूरी प्राथमिकता दें।

    6. फ़ीचर सप्‍लीमेंट में कलर पेजेज पर नेताओं और फ़िल्‍म वाली पार्टियों के फ़ोटो और समाचार अधिक लगाएँ।

    7. युवा वर्ग को लुभाने के लिए फीचर पेजेज पर हीरोइनों की सेक्‍सी फ़ोटो ज़रूर प्रयोग करें।

    8. विदेशी खबरों में ग्‍लैमर से जुड़े समाचार बढ़ाएँ।

    9. हिंदी शब्‍दों के साथ अँग्रेज़ी के शब्‍दों का प्रयोग कर समाचारों को स्‍मार्ट बनाएँ।

    10. सभी संपादकीय सहयोगी दाढ़ी बनाकर स्‍मार्ट तरीक़े से रहें।

    कार्यशाला में तीन दिनों तक कई समाचार संपादकों/विद्वानों ने जमकर ज्ञान का अमृत उड़ेला। भाषण इतना बोरिंग था कि जिससे बुद्धिराम समेत कई संपादकीय साथी इस बीच सीट पर बैठे ऊँघते ही रहे। दसवाँ निर्देश पढ़कर तो कई सहयोगी भन्‍ना गए कि यह अख़बार का दफ़्तर है या किसी मल्‍टीनेशनल कंपनी का। बुद्धिराम को लगा कि पत्रकारिता अब मिशन के बजाए सिर्फ़ प्रोफ़ेशन बनकर रह गई है। ऐसी पत्रकारिता का क्‍या फ़ायदा कि—‘जल्‍द बच्‍चे को जन्‍म देंगी ऐश्‍वर्या’ जैसी ख़बरें छापी जाएँ। एक साथी शमीम बुद्धिराम से बोला—मालिकों को तो ऐसा लगता है कि अख़बार सिर्फ़ मार्केटिंग के बल पर चल रहा है। यही वजह है कि उनको कमाऊ पूत और हम सबको ख़र्चाऊ पूत समझा जाता है। दफ़्तर में कार्यशाला के निर्देशों की कई दिनों तक व्‍याख्‍या होती रही।

    समय बीतता जाता है। बुद्धिराम उत्‍तर भारत में दलित समाज की स्थिति पर लेख लिखता है जिसे वह बाद में प्रकाशन के लिए सहायक संपादक और संपादकीय पेज के प्रभारी सदानंदजी के पास लेकर जाता है—‘वे लेख देखते ही भड़क गए कि देखो भाई इस तरह का लेख किसी दलित पत्रिका को भेज दो। ये लेख अख़बार की नीति से मेल नहीं खाता। हमारे अख़बार के रीडर दलित नहीं हैं। वैसे भी इन भूखे नंगे दलितों के पास अख़बार ख़रीदने के लिए पैसा ही नहीं है फिर इन्‍हें पढ़वाकर क्‍या करना।’ बुद्धिराम मन मसोसकर रह गया। लेख को उसने एक वैचारिक पत्रिका को भेज दिया जो अगले अंक में छपा और उसके मोबाइल में एसएमएस और चिट्ठियों के रूप में काफ़ी सारी प्रतिक्रियाएँ आईं। इन प्रतिक्रियाओं ने उसके भीतर एक नया जोश और जज्‍बा भर दिया। उसे लेखन की सार्थकता और ताक़त का नया एहसास हुआ।

    बुद्धिराम को पत्रकारिता में देखते-देखते बारह साल बीत गए। तो प्रमोशन मिला, बुद्धिराम उप संपादक से आगे बढ़ पाया। उसे कई बार लगा कि वो किसी ढोर या डांगर की मानिंद है जो सिर्फ़ अपना पेट भरने के लिए मज़दूरों की भांति खट रहा है। नौकरी में उसे कभी भी डेस्‍क इंचार्ज नहीं बनाया गया। पेज फर्स्‍ट पर भी नहीं रखा गया, संपादकीय पर भी नहीं। हर अख़बार नौकरी तो उसको देता मगर बस डाक, सिटी अथवा फीचर जैसी अनुपयोगी डेस्‍कों पर। इन डेस्‍कों पर कुछ भी रचनात्‍मक या सार्थक पत्रकारिता कर पाना वैचारिक रूप से लिख पढ़ पाना संभव नहीं था। कंप्यूटर स्‍क्रीन पर आँख गड़ाकर बस बिंदी-कामा ठीक करो या अनुवाद करो।

    घर पर एक वीकली ऑफ़ के दिन बुद्धिराम एक साहित्यिक पत्रिका पलट रहा था कि एक सर्वे पर निगाह पड़ती है। सर्वे अख़बारी संस्‍थानों में दलितों की स्थिति पर था। सर्वे का सार था कि लगभग सभी संस्‍थानों में प्रमुख पदों पर सवर्णों का कब्‍जा था। दलित, स्‍त्री और अल्‍पसंख्‍यक हैं भी तो बस दिखावे के लिए या फिर उन्‍हें दोयम दर्जे के कामों पर रखा गया है। यहाँ बैठकर कभी भी वे नीतियों और प्रकाशित होने वाले समाचारों/फ़ीचर को किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं कर सकते। ऐसे में उसकी पत्रकारिता बस नौकरी बनकर रह गई थी। वह जिन उद्देश्‍यों और सपनों को लेकर आया था वे कहीं से भी पूरे होते दिख रहे थे। अख़बार की अस्थिर नौकरी के चलते ही बुद्धिराम ने शादी भी नहीं की थी।

    एक दिन बुद्धिराम समय पर दफ़्तर नहीं पहुँच पाता, तो अगले दिन उससे जवाब माँगा जाता है कि आप संस्‍थान में टाइम टेबल का पालन नहीं कर रहे हैं। जब वह समाचार संपादक के पास पहुँचता है तो वे भन्‍नाकर कहते हैं कि—‘मैं क्‍या करूँ आपकी आरती उतारूँ या सीजीएम का नोटिस देखूँ। ‘उसे याद आया कि यही न्‍यूज एडीटर ठाकुर मैन पावर कम होने पर उसके पास रिरियाते हुए आता और चाय भिजवाकर काम करवाता। काम ख़त्‍म होते ही फिर भूल जाता था। इनके बारे में कहा जाता था कि ये किसी को भी कंडोम की तरह इस्‍तेमाल कर फिर हाशिए पर डाल देते। पिछले तीस सालों से टाप मैनेजमेंट के नाक का बाल बने हुए थे। कितने जीएम और एजीएम आए और चले गए फिर भी न्‍यूज एडीटर ठाकुर अखाड़े के लतमरुआ पहलवान की तरह डटे ही रहे। यही वजह थी कि वे ग्रुप में अजेय थे।

    एक दिन बैठे ठाले बुद्धिराम को सूझता है कि रोज़-रोज़ के मरने से बेहतर है कि क्‍यों वह अपनी पत्रिका निकाले। अख़बार के दफ़्तर में दिया गया उसका इस्‍तीफ़ा धमाका कर देता है। उसका इस्‍तीफ़ा तमाम संस्‍थानों में चर्चा का विषय बन जाता है। वह प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया की भूमिका पर कई तीखे सवाल उठाता है जिससे बौद्धिक जगत में काफ़ी हलचल होती है। देखते ही देखते बुद्धिराम अख़बारी दुनिया को नमस्‍कार कर विकल्‍प के रूप में अपनी पत्रिका शुरू कर देता है जिसका नाम होता है ‘दलित विमर्श।’

    बुद्धिराम तमाम हलचलों से दूर शांत भाव से किसी वीतरागी की तरह कमरे पर बैठकर डाक से आने वाले लेख और पत्र देखता है, फ़ोन पर बतियाता है। बुद्धिराम अब अपनी पत्रिका के जरिए पिछड़े, दलितों तथा हाशिए के लोगों को जागरूक बनाने में अपना पूरा श्रम समय लगा देता है। कुछ समय बाद देखते ही देखते पत्रिका चल निकलती है और बुद्धिराम पीर, बबर्ची, भिश्‍ती, खर की भांति संपादक से लेकर चपरासी तक की भूमिका का निर्वाह करता है। धीरे-धीरे उसकी गिनती दलित चिंतकों में होने लगती है। खुली हवा में सांस लेना और अपने दलित समाज के लिए कुछ कर पाने के अहसास से बुद्धिराम को काफ़ी शांति, सुख और संतुष्टि का अनुभव होता है।

    वह ख़्यालों में खोया ही रहता मगर अचानक डेस्‍क इंचार्ज शुक्‍लाजी की कर्कश आवाज उसके कान में पड़ती है—बुद्धिरामजी एक घँटे से आप ख़बर क्‍यों नहीं बनाकर दे रहे हैं? उसकी तंद्रा अचानक भंग हो जाती है और वो अतीत से निकलकर वर्तमान में जाता है। जवाब में ‘अभी देता हूँ’ कहकर झटके से बाहर निकल जाता है। धीरे-धीरे उसके क़दम चाय की दुकान की ओर बढ़ जाते हैं... बुद्धिराम फिर सीट पर बैठता है। उसके हाथ की बोर्ड पर चलते हैं मगर वह क्‍या टाइप करता है ख़ुद समझ नहीं आता। वह फिर सीट छोड़कर टाइलेट जाता है। लौटकर फिर सीट पर बैठता है मगर उसका मन काम में नहीं लगता। उसका आत्‍मविश्‍वास डगमगाने लगता है।

    वह वर्ल्‍डपैड में जाकर रिजाइन फ़ाइल बनाकर इस्‍तीफ़ा टाइप करता है। इसी बीच अम्‍मा, बापू के चेहरे, घर-परिवार की दिक्‍कतें उसके सामने सवाल बनकर खड़ी होती हैं। बापू की बीमारी और मुनिया की शादी की ज़िम्‍मेदारी भी उसके कंधों पर थी...

    अचानक वह फिर कंप्यूटर पर लौटता है और आरएनआई की साइट से नई पत्रिका के लिए फ़ार्म डाउनलोड करता है... इतने में शुक्‍लाजी फिर दहाड़े, बुद्धिरामजी आपका ‘अभी देता हूँ’ कब पूरा होगा?... बुद्धिराम स्वप्न की दुनिया से सीधे हड़बड़ाकर ख़बर पर वापस आता है और उसकी उंगलियाँ की बोर्ड पर दौड़ने लगती हैं...

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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