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भगवान का संदेश

bhagvan ka sandesh

तेनालीराम

तेनालीराम

भगवान का संदेश

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    एक बार महाराज कृष्णदेव राय के मन में एक विशाल शिवालय बनवाने की इच्छा उपजी। उन्होंने मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि शिवालय के लिए कोई उपयुक्त स्थान खोजा जाए।

    इसके लिए मंत्री ने नगर के समीपवर्ती जंगल के एक भूखंड को चुना। तुरंत ही उस स्थान की सफ़ाई का कार्य प्रारंभ हो गया। जब उस स्थान की सफ़ाई की जाने लगी तो वहाँ किसी पुराने शिवालय के खंडहर मिले, जिनकी ख़ुदाई करने पर वहाँ से भगवान शंकर की सोने की एक आदमकद प्रतिमा मिली।

    सोने की उस ठोस मूर्ति को देखकर मंत्री के मन में लालच गया और उसने उसे उठवाकर चुपचाप अपने घर पहुँचवा दिया। वहाँ खुदाई करने वाले मज़दूरों में तेनालीराम के आदमी भी थे। उन्होंने इस बात की इत्तिला तुरंत ही तेनालीराम को दे दी। सुनकर तेनालीराम चुप रहा और मौक़े का इंतज़ार करने लगा।

    उधर भूमि पूजन के बाद शिवालय का निर्माण कार्य शुरू हो गया। एक दिन दरबार लगा हुआ था, तभी महाराज ने एकाएक दरबारियों से पूछा कि भगवान की कैसी मूर्ति बनवाई जाए? दरबारी अपनी-अपनी राय देने लगे। महाराज कुछ तय नहीं कर पाए और बात दूसरे दिन के लिए टल गई।

    दूसरे दिन जब दरबार लगा तो दरबार में एक जटाजूट धारी संन्यासी ने प्रवेश किया। महाराज ने सिंहासन से उठकर उनका स्वागत कर सम्मान सहित आसन दिया। राजन! सिंहासन पर बैठकर संन्यासी बोले : “मैं आपकी चिंता का निवारण करने भगवान शिव के आदेश पर यहाँ उपस्थित हुआ हूँ और आपके लिए उनका संदेश लाया हूँ।

    “भगवान शिव का संदेश।” महाराज रोमांचित से हो उठे—“यथाशीघ्र बताएँ ऋषिवर—कक्षा संदेश भेजा है भगवान शिव ने? “राजन! मंदिर के लिए भगवान शंकर ने स्वयं अपनी स्वर्ण निर्मित आदमकद प्रतिमा भेज दी है और इस समय वह मंत्री जी के घर पर रखी है। उसे वहाँ से उठवाकर मंदिर में प्रतिष्ठित कर दो।

    “बम-बम भोले। “कहकर साधु चला गया। महाराज ने मंत्री की ओर देखा, मंत्री तो पहले ही हकबकाया सा था कि उस साधु को प्रतिमा की बात कैसे पता चली? मगर अब चूँकि पोल खुल चुकी थी। अतः उसने स्वीकार किया कि प्रतिमा ख़ुदाई में प्राप्त हुई थी।

    तभी महाराज को कुछ ध्यान आया और उन्होंने दरबार में चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, तेनालीराम वहाँ कहीं नहीं था। थोड़ी देर ही गुज़री थी कि तेनालीराम वहाँ गया। उसे देखकर सभी हँस पड़े। एक सभासद बोले : “महाराज! शायद यही थे वे साधु बाबा। कपड़े ओर जटा तो उतार आए मगर कंठीमाला उतारनी भूल गए। एक बार फिर हँसी का ठहाका गूँजा। “अब मंदिर निर्माण का कार्य तेनालीराम की देख-रेख में होगा। महाराज ने घोषणा की।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 52)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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