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मनहूस और महा मनहूस

manhus aur maha manhus

तेनालीराम

तेनालीराम

मनहूस और महा मनहूस

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    सुखदेव नामक एक व्यक्ति को लेकर पूरे विजय नगर में यह बात प्रसिद्ध थी कि सुबह-सुबह जो भी उसकी सूरत देख लेता है, उसे पूरे दिन अन्न नसीब नहीं होता। उड़ती-उड़ती यह बात महाराज कृष्णदेव राय के कानों तक भी पहुँची।

    तब महाराज ने सोचा कि इस बात की जाँच करनी चाहिए। ऐसा मनहूस व्यक्ति तो राज्य में रहने के योग्य ही नहीं है। यही सोचकर उन्होंने सुखदेव को बुलवाया और रात में ख़ूब ख़ातिरदारी करके अपने कक्ष में ही उसका बिस्तर लगवा दिया।

    महाराज सुबह-सुबह उठे और सबसे पहले उसे उठाकर हाल-चाल पूछा, फिर अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गए। किसी कार्य में वह इस प्रकार उलझ गए कि खाने की बात क्या कहें, समय पर नाश्ता भी मिला। ख़ैर, दुपहर हो गई और महाराज के सामने खाना परोस दिया गया।

    मगर तभी अंतरूपुर (रनिवास) में कोई ऐसी घटना घटी कि महाराज को उठकर जाना पड़ गया। गर्ज ये कि शाम तक इसी प्रकार की घटनाएँ घटती रहीं और महाराज को खाना नसीब नहीं हुआ। अब वे इस निर्णय पर पहुँचे कि यह व्यक्ति सचमुच मनहूस है और इसका ज़िंदा रहना ठीक नहीं।

    अतः उसी समय उन्होंने सिपाहियों को बुलाया और हुक्म जारी कर दिया कि कल शाम इस व्यक्ति को सरेआम फाँसी दे दी जाए। सिपाहियों ने फ़ौरन सुखदेव को गिरफ़्तार करके कारागार में डाल दिया। सुबह होते-होते यह ख़बर चारों ओर फैल गई कि आज शाम को मनहूस सुखदेव को महाराज के हुक्म से फाँसी पर लटकाया जाएगा।

    यह बात तेनालीराम के कानों में भी पड़ी और पलक झपकते ही वह सारा माजरा समझ गए। वे फ़ौरन निर्दोष सुखदेव के पास पहुँचे। सुखदेव ने रो-रोकर उन्हें सारा क़िस्सा सुनाया कि किस प्रकार महाराज ने उसे एक रात का अतिथि बनाकर फाँसी का हुक्म सुना दिया है।

    “तेनालीराम जी! अब आप ही बताएँ कि मेरा क्या कसूर है। मनहूस या भाग्यवान तो ईश्वर बनाता है, इसमें कोई प्राणी कर ही क्या सकता है? कृपा करके आप मेरी मदद करें अन्यथा मेरे बच्चे अनाथ हो जाएँगे।” “चिंता मत करो सुखदेव और जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करना।” तेनालीराम ने कहा, फिर धीरे-धीरे उसे कुछ समझाने लगे।

    समझ गए? जी हाँ—जैसा आप कहते हैं, वैसा ही करूँगा। तेनालीराम वहाँ से चले गए। शाम को सैनिक आए और उस से पूछा—“सुखदेव! महाराज का आदेश है कि यदि तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो कहो।” “दरोगा जी! निर्भीक होकर सुखदेव बोला—“मैं सारी प्रजा के सामने यह बात कहना चाहता हूँ कि जो सुबह-सुबह मेरी शक्ल देख लेता है उसे भोजन नसीब नहीं होता, मगर महाराज मुझसे भी बड़े मनहूस हैं जो मैंने उनकी शक्ल देखी थी और शाम को मुझे फाँसी पर चढ़ना पड़ रहा है।

    “क्या बकता है?” दरोग़ा आँखें निकालकर गुर्राया—जानता है क्या कह रहा है तू—महाराज ने सुन लिया तो।—” “तो क्या फाँसी से भी बड़ी कोई सज़ा है जो वे मुझे दे सकते हैं? सुखदेव व्यंग्य से मुस्कुराया—“जाओ दरोगा जी, जाकर महाराज को बता दो कि यही मेरी अंतिम इच्छा है।

    सिपाही दौड़े-दौड़े महाराज कृष्णदेव राय के पास पहुँचे और उन्हें सुखदेव की अंतिम इच्छा बताई। चुनते ही महाराज सन्नाटे में गए और बोले—“हम उसकी फाँसी की सज़ा रद्द करते हैं, उसे फ़ौरन हमारे पास लाओ।” सिपाही उसे लेकर आए तो महाराज ने उसे सम्मान सहित अपने पास बैठाया, फिर बड़े ही प्यार से पूछा—“सच-सच बताना सुखदेव।

    यह बात तुम्हें कैसे सूझी।” “मुझ मूर्ख को ऐसी बातें कहाँ सूझ सकती हैं महाराज! मृत्युदंड पाकर तो मैं वैसे ही अपनी सूझ-बूझ खो बैठा था। यह तो भला हो तेनालीराम जी का जिन्होंने मुझे ये युक्ति सुझाई।” “ओह!” महाराज को झटका सा लगा, फिर वे बोले—“तेनालीराम धन्य है जिसने एक निर्दोष को फाँसी से बचा लिया।” फिर महाराज ने सुखदेव को बहुत सा इनाम दिया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 79)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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