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क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?

kya tumne kabhi koi sardar bhikhari dekha?

स्वयं प्रकाश

स्वयं प्रकाश

क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?

स्वयं प्रकाश

और अधिकस्वयं प्रकाश

    एक तारीख़ की शाम अजमेर से रवाना होकर हम दो की सुबह साढ़े पाँच बजे दिल्ली पहुँचे। हमें निजामुद्दीन से पौने सात बजे दूसरी गाड़ी पकड़नी थी और कुलियों ने बताया कि आज रिक्शा-टैक्सी कुछ नहीं चल रहे हैं, इसलिए हम छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से नई दिल्ली तक आए। वहाँ ड्राइवर ने बताया कि यहाँ वह डीजल भरेगा और पौने सात बजे तक निज़ामुद्दीन नहीं पहुँच पाएगा। मैंने लपककर सारा सामान कुली से बाहर निकलवाया। बाहर बहुत कम टैक्सियाँ थीं, जो थीं उनके भी ड्राइवरों का कहीं पता नहीं था, जो ड्राइवर थे भी, वे इतनी सुबह निज़ामुद्दीन जाने के लिए तैयार नहीं थे। बड़ी मुश्किल से एक ऑटोरिक्शा पचास रुपए में तैयार हुआ, हम बैठे और दर्रर्र…।

    सुबह की धुंध-भरी खुनकी में नई दिल्ली उतनी ही ख़ूबसूरत लग रही थी जितनी हमेशा। टुनिया की सबसे ख़ूबसूरत राजधानियों में से एक। कनॉट प्लेस से गुज़रते हुए मुझे पल-भर के लिए वही अनुभूति हुई जैसे किशोर को किसी लड़की का उरियाँ जिस्म पहली बार देखकर होती है। दिल्ली के जिस्म पर उस सुबह कोई खरोंच, ज़ख़्म या फफोला मुझे नज़र नहीं आया।

    पहुँचे और हॉर्न हुआ। बच्ची को गोदी में टाँग बीवी पुल पर भागी। पीछे-पीछे कुली और मैं। भागते-दौड़ते गाड़ी पकड़ी। जो डिब्बा सामने गया उसी में घुस गए। यह पुरी कोच था। हमारा रिज़र्वेशन राउरकेला कोच में था। सोचा, मथुरा में बदल लेंगे।

    डिब्बा—जो हमेशा ख़ासा भरा रहता था—आज लगभग ख़ाली था। हमने सुविधानुसार बीच के कूपे की दो बर्थे ले लीं—जिन्हें बख़्शने में कंडक्टर को कोई ख़ास तकलीफ़ नहीं हुई।

    हमारे सामने की सीट पर एक सरदारजी थे। बूढ़े और फटेहाल। कोई सत्तर साल की उम्र और बीमार। एक निहायत पुराने होल्डॉल को खोलकर उस पर चुपचाप चित लेटे थे। पगड़ी बदहाल और एक बेहद घिसी हुई मलेशिया की सूची हुई पतलून से निकलते दो मरियल काले पाँव। उन्होंने हमारी तरफ़ देखा तक नहीं। हमारी बच्ची किलकारियाँ मारीं, हाथ-पाँव उछाले, अंडे की तरह गोल मुँह बनाकर 'बाबा! बाबा!' कहा—उन्होंने बच्ची की तरफ़ भी देखा तक नहीं।

    दाईं तरफ़ वाले कूपे में पाँच-छह आदमी चार-पाँच अख़बार बाँट-बाँटकर बदल-बदलकर पढ़ रहे थे। काले हाशिए वाला अख़बार। तस्वीरों, श्रद्धांजलियों और सदमें की सनसनी से भरा। दाईं तरफ़ वाले कूपे में एक भारी आवाज़ वाला संभ्रांत व्यक्ति अपनी बेटी के साथ सफ़र कर रहा था और इस समय उससे विदेशों में बसे कुछ रिश्तेदारों के बारे में अँग्रेज़ी में बातें कर रहा था। हालाँकि इसमें ताज्जुब की क्या बात थी, पर मुझे ताज्जुब हुआ कि ये लोग वही बात क्यों और कैसे नहीं कर रहे जो इस समय सब लोग कर रहे हैं?

    मथुरा बहुत देर से आया। वहाँ कुछ नहीं था। चाय, नाश्ता, सिगरेट, अख़बार, कुली, मुसाफ़िर। जैसे स्टेशन पर कर्फ़्यू लगा हुआ हो। हमें बच्ची के दूध के लिए थर्मस में पानी भरवाना था। गर्म। वह उसे दो दिन और एक रात के सफ़र में कहीं भी नहीं मिलना था।

    घूमघाम मैं वापस डिब्बे में आकर पत्नी को बताने लगा कि अच्छा हुआ राउरकेला कोच के रिज़र्वेशन की फ़िक्र नहीं की। फिर उतरकर टहलने लगा। अचानक पचास-साठ लड़कों की भीड़ नारे लगाती हुई स्टेशन में घुसी। कुछेक के हाथ में डंडे भी थे। उन्होंने हर डिब्बे की खिड़की में ताका-झाँकी की और आख़िर रेलवे पुलिस के समझाने पर शोर मचाते हुए चले गए। लेकिन जाने से पहले एक लड़का हमारे कूपे के सामने आया और खिड़की से मुँह सटाकर सरदारजी को उसने गालियाँ दीं। उन्हें गद्दार और ख़ूनी कहा और कहा कि वह उनकी टाँगें चीर देगा। फिर चला गया। 'ये छोकरे' मैंने सोचा। और फिर डिब्बे में आकर बैठ गया। बच्ची खिड़की में खड़ी खेल रही थी और नारे लगाने वालों की नक़ल में होऽहोऽ कर रही थी। हम पति-पत्नी उसकी बालसुलभ शरारतों का मज़ा लेने लगे।

    मैं लेट्रीन में बंद हो जाता हूँ। अचानक सरदारजी ने कहा। मुझसे वह भयभीत और परेशान लग रहे थे। मैंने उनके काले-झुर्रीदार चेहरे, धँसी आँखों और मैली दाढ़ी को देखा, उन्होंने जो कहा था, मेरे दिमाग़ में फिर बजा और मुझे ताव गया। मैंने ज़ोर देकर कहा कि कुछ नहीं होगा सरदारजी, तुम मज़े से बैठो। हमारे होते आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये तो छोरे-छपाटे हैं। क्या फिकर करते हो। कुछ नहीं होगा।

    वह अपनी मैली चादर ओढ़कर आँख मूँदकर चित लेट गए।

    बस, यही एकमात्र वाक्य था, जो उस पूरे दिन में उन्होंने बोला था।

    उन्हें आश्वस्त कर चुकने के बाद मेरे दिमाग़ में थोड़ा तनाव पैदा हो गया। क्यों किसी निर्दोष को लेट्रीन में ख़ुद को बंद कर लेना पड़ेगा? क्यों?

    लेकिन जैसे-जैसे ट्रेन आगे बढ़ी, तनाव भी बढ़ता गया। आगरा में स्टेशन एकदम ख़ाली था। ग्वालियर में कर्फ़्यू लगा हुआ था। बच्ची दूध के लिए रो रही थी। हमने सुबह से चाय नहीं पी थी। मेरी सिगरेटें ख़त्म हो रही थीं। और खाना? हमने सोचा, दिल्ली जैसे-जैसे दूर होती जाएगी सब कुछ शांत सहज होता जाएगा। लेकिन झाँसी पर मैंने दूर से ही कई जगह धुआँ उठते देखा और आउटर सिग्नल पर एक भीड़ देखी और हवा में सनसनी। मैंने सरदारजी से कहा—आप ऊपर की बर्थ पर जाकर ओढ़कर सो जाइए। और एक को छोड़कर सभी खिड़कियाँ बंद कर लीं।

    लेकिन स्टेशन पर कोई तनाव नहीं था। वहाँ चाय भी मिल गई। मैंने प्लेटफ़ॉर्म पर ही खड़े-खड़े सरदारजी से कहा—नीचे जाइए। कोई डर की बात नहीं है।

    उनका सारा बदन सिर से पाँव तक चादर में ढँका हुआ था, सिर्फ़ आँखें खुली थीं जिनमें दहशत भरी हुई थी। जैसे किसी सुरंग में से झाँकती किसी भीत पशु की दो आँखें वह हिले-डुले तक नहीं। नीचे तो नहीं ही आए। और अच्छा ही किया कि नहीं आए, क्योंकि थोड़ी ही देर बाद एक बड़ी भीड़ नारे लगाती हुई, शोर मचाती हुई और गालियाँ बकती हुई प्लेटफ़ॉर्म पर दाख़िल हुई। भीड़ में अधेड़ लोग भी थे, नौजवान भी और दस-बारह साल के छोकरे भी। उनमें से कइयों के हाथों में लाठियाँ थीं, कुछ के हाथों में कुल्हाड़ियाँ और एक-दो के हाथों में घासलेट-पेट्रोल के जेरीकेन।

    सरऽदाऽर!! निकल बाहर, तेरी माँ को चोदूँ।...

    कोई डिब्बे की दीवारों को लाठी से पीटता हुआ चीख़ रहा था। देखते-ही-देखते भीड़ दोनों तरफ़ से हमारे डिब्बे में घुस गई और हर सीट पर, सीट के नीचे और इधर-उधर झाँकते हुए हरेक से पूछने लगी—कोई सरदार तो नहीं है? उन्होंने डिब्बे में घुसते ही पहला काम यह किया था कि सारे टॉयलेट चैक किए थे और सबकी भीतर की चिटखनियाँ तोड़ दी थीं। अब वे हमारे कूपे की तरफ़ रहे थे। ऐन मुमकिन था कि वे हमारे कूपे में ऊपर की बर्थ पर सिर से पाँव तक चादर ओढ़कर सोए सरदारजी को देख लेते और पकड़ लेते, कि तभी रेलवे पुलिस गई और उसने सबको गाड़ी से और प्लेटफ़ॉर्म से बाहर खदेड़ दिया।

    प्लेटफ़ॉर्म से एकदम बाहर रेलवे वालों के क्वार्टर थे। बग़ीचे से घिरे लकड़ी की जाफ़री वाले एक क्वार्टर पर भीड ने हल्ला बोल दिया। कुछ दरवाज़ा तोड़कर भीतर घुस गए, कुछ पीछे की तरफ़ लपके, कुछ खपरैलों पर पत्थर मारने लगे और कुछ में जाफ़री पर तेल छिड़ककर मकान में हमारे सामने आग लगा दी।

    मुसाफ़िर तमाशा देख रहे थे और मन-ही-मन दुआ भी कर रहे थे कि जल्दी-से-जल्दी गाड़ी चल दे। और तभी गाड़ी चल दी।

    सरदारजी अब भी वहीं वैसे ही पड़े हुए थे। कुछ देर बाद कोई किसी से कह रह था—बेचारे का हार्टफ़ेल ही हो जाए।

    लेकिन अगले स्टेशन पर फिर वही नज़ारा था। आउटर सिग्नल पर गाड़ी लगभग रुक गई। सामने एक खपरैल के मकान से ख़ूब गाढ़ा काला धुआँ उठ रहा था। सामने से गाड़ी रेंगी तो सामान का ढेर जलता नज़र आया। सोफ़ासेट, पलंग, कुर्सियाँ, बैडमिंटन का रैकेट, गद्दे-बिस्तरे, हॉकी स्टिक, स्कूटर का टायर...और दूर खड़े तमाशा देखते अनेक आदमी-औरत-बच्चे।

    सारा दिन इसी वहशियत में गुज़रा। सारा दिन सरदारजी चुपचाप पड़े रहे, सारा दिन उन्होंने कुछ दवा की गोलियों के सिवा कुछ नहीं खाया, सारा दिन आतंक, उदासी और मनहूसियत का आलम डिब्बे पर तारी रहा।

    लेकिन रात होते-होते हालत और ख़राब हो गई। अब किन्हीं भी दो स्टेशनों के बीच गाड़ी रोक ली जाती। भीड़ का बेक़ाबू रेला डिब्बों में घुस आता, गालियाँ दी जातीं, डंडे बजाए जाते भाई साब, कोई सरदार तो नहीं है?' पूछा जाता और पत्थर फेंके जाते।

    मैंने कहा, हमें चारों दरवाज़े एकदम बंद कर लेने चाहिए।

    दरवाज़े के नज़दीक दो सिंधी लड़के बैठे थे। तमाशा देखने और मज़ा लेने की मुद्रा में। जबकि डिब्बे के शेष लोग उदास और परेशान थे। शायद शर्मिंदा भी। सिंधियों ने कहा—दरवाज़ा नहीं खोलोगे तो उन्हें और डाउट होगा और वे पत्थर मारेंगे।'' मैंने कहा—मारने दो, पत्थर मारने से डिब्बा नहीं टूटेगा। खिड़कियाँ बंद रखो। उनमें से एक ने कहा—वे डिब्बे में आग भी लगा सकते हैं। मैं चुप हो गया। हालाँकि आग कोई लगाता भी तो डिब्बा जल नहीं जाता, लेकिन जो भगदड़ आग के नाम से मचती...अपनी सोच की निरर्थकता पर मैं सिर धुनने लगा। लेकिन अगर सब मिलकर क्या सब मिलकर? कैसे सब मिलकर?

    बाईं तरफ़ वाले कूपे में लोग एकदम गुमसुम थे। और शायद ख़ैर मना रहे थे कि वे सरदार नहीं हैं। या शायद अब भी आशावान थे कि कुछ नहीं होगा, गाड़ी चलती रहेगी और वे सकुशल अपने गंतव्य तक पहुँच जाएँगे। या पछता रहे थे कि वे घर से चले ही क्यों या रेल वालों को कोस रहे थे कि ये जगह-बेजगह गाड़ी रोकते ही क्यों हैं? या डर रहे थे कि कुछ भी हो सकता है। उन्माद के विषैले धुएँ में वे ख़ुद भी सुरक्षित नहीं हैं। गाड़ी रोकी जा सकती है, सरदारों को लूटने वाले उनका सामान उठाकर भी भाग सकते हैं, उन्हें भी पीट सकते हैं और डिब्बे से उतारकर आग में भी झोंक सकते हैं।

    दाहिनी तरफ़ वाले कूपे में भारी आवाज़ वाला संभ्रांत आदमी यूरोप की बातें अपनी लड़की और एक नौजवान संभ्रांत सहयात्री को बता रहा था। कुछ देर में उन्होंने ठाठ से बोतल निकाली और शराब पीनी शुरू कर दी। लड़की ने अँग्रेज़ी में कहा, गिलास एक ही है। तब उनका नौकर, जो हमारे कूपे में था, हमसे गिलास माँगकर ले गया। हमें पता होता कि किसके लिए ले रहा है और क्या पीने के लिए तो हम नहीं देते। ख़ैर। अब लड़की ने अँग्रेज़ी में कहा—इससे भूख खुल जाती है।

    न? और बाप ने बेटी से कहा—तुम भी लो मन हो तो। और बेटी ने कहा कि ड्रिंक्स का तो नहीं, स्मोक करने का मन है, पर हाँ डिब्बे में सबके सामने नहीं पियूँगी। अब नौजवान सहयात्री उसे मनाने लगा कि खाने-पीने में क्या शर्म! और सबकी इतनी परवाह क्यों करती है और पेश करने लगा और कुछ देर की नख़रेबाज़ी के बाद लड़की ने सिगरेट ले ली, बाप ने मज़ाक़ में नौजवान से कहा कि ख़ूबसूरत लड़कियाँ बहुत 'फसी' होती है और यूरोप के क़िस्से फिर चालू हो गए।

    फिर किसी एक जगह जंगल में, अँधेरे में गाड़ी रुक गई और दोनों तरफ़ से भाड़-भाड़ पत्थर फेंके जाने लगे। मैंने दौड़-दौड़कर खिड़कियाँ बंद कीं। सिरहाने की खिड़की जाम थी और बंद नहीं हो रही थी। पत्नी ने घबराकर बच्ची को लिपटा लिया और डर के मारे दोनों सीटों के बीच फ़र्श पर बैठ गई। मैंने कहा, कुछ नहीं होगा, फ़िक्र मत करो और अटैची खिड़की में अड़ाई और उससे पीठ सटाकर बैठ गया। पत्नी ने मुझे ऐसे देखा जैसे किसी गाय को क़साई ले जा रहा हो और वह अपने रक्षक की तरफ़ देखे। मैंने उसे डाँटा—क्या पढ़ी-लिखी होकर घबराती हो। कुछ नहीं होगा। ऊपर बैठो। मैं डाँट रहा था लेकिन मेरे मुँह से आवाज़ ऐसे निकल रही थी जैसे मैं घिघिया रहा होऊँ या आजिज़ी से पेश रहा होऊँ।

    सिंधियों ने दरवाज़ा खोल दिया।

    लाठियों-बल्लमों-कुल्हाड़ियों और बेंतों से लैस भीड़ डिब्बे में घुस आई। आगे-आगे एक नौजवान लड़का था। पतलून-बनियान पहने। काला-तगड़ा और ख़ूँख़ार। पिए हुए। वह जैसे हिस्टीरिया में चीख़ रहा था—माँ को मार डाला। सरदाऽऽर। निकल बाहर, इसकी माच्चोड्डालूँ। और सीटों के नीचे से सामान हटा हटाकर डंडा फटकारता जा रहा था।

    मुसाफ़िर कह रहे थे, नहीं है। नहीं है। इस डिब्बे में कोई नहीं है।

    एक तूफ़ान की तरह पागलों की तरह वह भीड़ एक तरफ़ से घुसकर दूसरी तरफ़ निकल गई।

    गाड़ी फिर भी नहीं चली।

    फिर एक रेला भीड़ का आया। फिर ताका झाँकी। डंडे फटकारना और 'नहीं' है, नहीं है' सुनकर निकल जाना।

    गाड़ी फिर भी नहीं चली।

    मुझे बाद में पता चला कि एक बेवक़ूफ़ औरत ने ख़ुद खिड़की से सिर निकालकर किसी को बता दिया था कि है। एक सरदार है इस डिब्बे में।

    अब दुगनी भीड़ डिब्बे में थी और वे सारे सोए-लेटे-बैठे मुसाफ़िरों के कपड़े हटा हटाकर देख रहे थे।

    और तभी एक गुंडे ने हमारे सरदारजी को देख लिया।

    कौन है? ये कौन है? ये कौन है? वह चिल्लाया।

    सारे वहीं टूट पड़े। उसकी चादर खींची और नीचे गिरा दी। बिस्तरा खींचा और चीख़ते हुए गालियाँ बकते हुए उसे नीचे गिराने की गरज से उसकी टाँगें मरोड़ने और खींचने लगे। एक मेरी सीट पर ही खड़ा हो गया और उसकी दाढ़ी खींचने लगा। पत्नी ने बच्ची को भींच रखा था और मेरी बाँह कसकर पकड़ रखी थी। मैं छूटने के लिए छटपटाया तो वह गिड़गिड़ाई, मेरा क्या होगा? इस बच्ची का क्या होगा? आप कहीं मत जाओ। यहाँ तक कि भीड़ में से एक पत्नी से बोला—घबराओ मत भैंजी, आपको कुछ नहीं करेंगे।

    सरदारजी ने बर्थ की रॉड कसकर पकड़ी हुई थी और इतने लोगों की इतनी खींचातानी के बावजूद उन्हें नीचे नहीं गिराया जा सका। वह जिबह किए जा रहे बकरे की तरह चीख़ रहे थे, उनकी आँखें ख़ौफ़ से निकली पड़ रही थीं और शरीर पसीने-पसीने हो गया था। वे बुरी तरह काँप भी रहे थे। अब तक उनका बिस्तरा, अटैची, चादर, जूते, पगड़ी सब पता नहीं कहाँ जा चुके थे। भीड़ में से तरह-तरह की आवाज़ें उठ रही थीं। 'नंगा कर दे साले को, ''मारो साले को, छोड़ना मत गद्दार को...’ की चीख़-पुकार मची हुई थी और इतने लोगों के सामूहिक हमले के सामने पड़ा वह अकेला निहत्था, बूढ़ा और बीमार आदमी फटी आवाज़ में 'आऽऽआ' चिल्ला रहा था। उसकी पतलून-क़मीज़ फाड़ डाली गई और उसे एकदम नंगा कर दिया गया। पलक झपकते यह सब हो गया। इस बीच दो गुंडे सामने की ऊपरी बर्थ पर चढ़ गए थे और उसे लकड़ियों से मार रहे थे। एक उसी की बर्थ पर चढ़ गया और उसे अपनी मोटी लाठी से गोदने लगा। उसके पास बचाव के लिए कोई जगह या तरीक़ा नहीं था। सिवा अपने दो हाथों के कोई ढाल नहीं थी। और दो हाथ उसे कितना बचाते! बहुत सारे वहशी उस निहत्थे पर एक साथ टूट पड़े थे। एक मुसाफ़िर ने बीच-बचाव करने की कोशिश की। गुंडों में से एक बोला, तू भी इसके साथ है क्या? वह चुप हो गया। आख़िर सब मुसाफ़िर गुंडों के आगे गिड़गिड़ाए, बस, बहुत हो गया। अब छोड़ दो। बुड्ढा आदमी है। मर जाएगा बिचारा। गुंडों में से भी कोई बोला, अरे, मर जाएगा, माल मार लो, माल। इसी समय बाहर से कई लोगों के भागने, दौड़ने और चिल्लाने की आवाज़ें आईं। कोई किसी से कह रहा था, उतार। दूसरे को भी उतार साले को। अबे, पकड़ो-पकड़ो, भाग रहा है कि एक-एक कर सारे उतर भागे।

    बाहर हमारे सरदारजी के सामान की होली जल रही थी और कई सारे आदमी एक नंगे सरदार को आग की तरफ़ धकेलने की कोशिश कर रहे थे। अँधेरे में सारे मुसाफ़िर खिड़कियों से चिपके बाहर देखने की कोशिश कर रहे थे और किसी को कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था।

    तभी गाड़ी ने रेंगना शुरू कर दिया।

    सरदारजी की दाढ़ी छितरी हुई थी और बाल बिखरे हुए थे। ऊपर की बर्थ के कोने में वह गर्दन लटकाए बैठे थे और हाँफ रहे थे। उनके सिर पर जो थोड़े-बहुत बाल थे वे गुच्छा-गुच्छा ख़ून में भीगे हुए थे। कपाल ख़ून से तर था। दाढ़ी-मूँछों से ख़ून इस तरह टपक रहा था जैसे अभी नहाकर आए हों। भौंहें ख़ून में सनी हुई थीं और नाक की नोक पर ख़ून की एक बूँद लटक रही थी। बाँहों पर, छाती पर, शरीर के किसी हिस्से पर, कोई जगह ऐसी थी जो लाल नहीं हो, जहाँ मार के निशान हों।

    और मैं—बेवक़ूफ़ मैं, सुबह कह रहा था—हमारे रहते आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आप मज़े में बैठिए। मज़े! इस मुल्क में मज़े!

    पत्नी ने मेरी लुंगी निकालकर सरदारजी को पकड़ाई और फफक-फफककर रोने लगी। कूपे के एक और आदमी ने क़मीज़ दी और पहनाई भी। अब डिब्बे के और मुसाफ़िर उन्हें देखने रहे थे। आख़िर क्यों आते? इतने आदमियों के बीच बीसियों आदमियों द्वारा पीटा गया एक अकेला बूढ़ा कमज़ोर आदमी क्या कम रोमांचक दृश्य होता है!

    अब दाहिनी तरफ़ का संभ्रांत व्यक्ति हरकत में आया, क्या हुआ? बहुत मार लगी? देखें। कोई ख़ास नहीं लगी। कोई गहरी चोट नहीं है। फ़िक़् ना करो। कोई इसकी पल्स देखो। ऐसी हालत में इन लोगों को घर से बाहर ही नहीं निकलना चाहिए। डिब्बे में कोई डॉक्टर है? कोई डॉक्टर? सेफ्रोमाइसिन है किसी के पास? वह अपनी भारी रौबदार आवाज़ में बोल रहा था। उसकी लड़की नौजवान सहयात्री के पास उधर ही बैठी रही। किसी के पास कोई माइसिन निकल आई। जैसे-जैसे दूसरों ने बताया, सरदारजी माइसिन लगाने लगे। लेकिन ज़ख़्म इतने ज़्यादा थे और मरहम इतना कम कि उसका लगना, नहीं लगना, बराबर ही था।

    मैं सोच रहा था कि आज फ़र्ज़ कर लो, इस सरदार की जगह में होता तो क्या करता? फूट-फूटकर रो पड़ता—या प्रार्थनाएँ करने लगता...या पता नहीं क्या करता। लेकिन सरदारजी की आँख में एक भी आँसू नहीं थान आँसू, बदहवासी, हताशा। मानो बस यह हुआ हो कि उँगली किसी भारी पत्थर के नीचे गई हो।

    सारा डिब्बा अब उन्हें सलाहें दे रहा था। कोई कह रहा था, तुम तो बाल खोल लो और माथे पर तिलक लगाकर बाबाजी बन जाओ। कोई पूछे तो कह देना बनारस जा रहे हो। राम-राम बोलना। और हिंदी में बात करना, पंजाबी में नहीं। कोई कहता, अगले स्टेशन पर उतर जाओ और पुलिस स्टेशन में बैठ जाओ। इस सुझाव का कई लोगों ने स्वागत किया, क्योंकि उनके डिब्बे में रहने से सबको ख़तरा था। सही बात तो यही थी कि वे उतर जाते तो सब चैन की नींद सोते। लेकिन हालत यह थी कि उनकी आँखों में मौत का आतंक इस क़दर नुमाया था कि लाख टीके-तिलक लगाने पर भी यह छुप नहीं पाते। और थाने में जाने से उन्होंने मना कर दिया क्योंकि इन्होंने कम-से-कम ज़िंदा तो छोड़ दिया। थाने वाले तो...

    उन्होंने सबकी सुनी और आख़िर में फ़र्श की तरफ़ देखकर बोले, मेरा टिकट था पैंट की जेब में! लोगों ने कहा, कोई बात नहीं, टिकट कौन पूछता है इस हालत में। कोई पूछेगा तो हम बता देंगे। उन्होंने कहा, पैंट में मेरे पैसे थे। पौने तीन सौ। लोगों ने कहा, कोई बात नहीं। पैसों का क्या है। हाथ का मैल है। शुकर करो जान बच गई। उन्होंने ज़मीन की तरफ़ देखते हुए अपनी करारी आवाज़ में बड़ी मुश्किल से कहा, “अब जैसे पहुँचेंगे पहुँच जाएँगे। बिलासपुर ही तो जाना है। सुबह तो ही जाएगा। आप तो मुझे बस चा-चू के पैसे दे दो। बिलासपुर में वापस कर दूँगा। फिर जो होगा देखेंगे।

    यह आदमी अब भी इस हाल में भी सिर्फ़ चाय के पैसे माँग रहा है! मेरी रीढ़ तक एक सर्द झुरझुरी दौड़ गई। उसका सत्तर साल का तज़ुर्बा हम हकीसें से सिर्फ़ चाय के पैसे माँग रहा था!

    मुझे घबराहट होने लगी और रुलाई-सी छूटने लगी और जी मितलाने लगा। मैं उठकर मुँह पर पानी के छींटे मारने टॉयलेट की तरफ़ चला गया।

    लौटते में देखा कि तीनों संभ्रांत सिगरेटें पी रहे हैं और ठाठ से ताश खेल रहे हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 373)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : स्वयं प्रकाश
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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