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कितनी ज़मीन?

kitni zamin?

लियो टॉल्स्टॉय

लियो टॉल्स्टॉय

कितनी ज़मीन?

लियो टॉल्स्टॉय

और अधिकलियो टॉल्स्टॉय

    एक

    दो बहनें थीं। बड़ी का क़स्बे में एक सौदागर से विवाह हुआ था। छोटी देहात में किसान के घर ब्याही थी।

    बड़ी का अपनी छोटी बहन के यहाँ आना हुआ। निबटकर दोनों जनी बैठीं तो बातों का सूत चल पड़ा। बड़ी अपने शहर के जीवन की तारीफ़ करने लगी, “देखो, कैसे आराम से हम रहते हैं। फैंसी कपड़े और ठाठ के सामान! स्वाद-स्वाद की खाने-पीने की चीज़ें, और फिर तमाशे-थिएटर, बाग़-बग़ीचे!”

    छोटी बहन को बात लग गई। अपनी बारी पर उसने सौदागर की ज़िंदगी को हेच बताया और किसान का पक्ष लिया। कहा, “मैं तो अपनी ज़िंदगी का तुम्हारे साथ अदला-बदला कभी करूँ। हम सीधे-सादे और रूखे-से रहते हैं तो क्या, चिंता-फिकर से तो छूटे हैं। तुम लोग सजी-धजी रहती हो, तुम्हारे यहाँ आमदनी बहुत है। लेकिन एक रोज़ वह सब हवा भी हो सकता है, जीजी। कहावत है ही—हानि-लाभ दोई जुड़वाँ भाई। अक्सर होता है कि आज जो अमीर है कल वही टुकड़े को मोहताज़ है। पर हमारे गाँव के जीवन में यह जोखिम नहीं है। किसानी ज़िंदगी फूली और चिकनी नहीं दिखती तो क्या, उमर लंबी होती है और मेहनत से तंदुरुस्ती भी बनी रहती है। हम मालदार कहलाएँगे; लेकिन हमारे पास खाने की कमी भी कभी होगी।”

    बड़ी बहन ने ताने से कहा, “बस-बस, पेट तो बैल और कुत्ते का भी भरता है। पर वह भी कोई ज़िंदगी है? तुम्हें जीवन के आराम, अदब और आनंद का क्या पता है? तुम्हारा मर्द जितनी चाहे मेहनत करे, जिस हालात में तुम जीते हो, उसी हालात में मरोगे, वही चारों तरफ़ गोबर, भुस, मिट्टी! और यही तुम्हारे बच्चों की क़िस्मत में बंधा है।”

    छोटी ने कहा, “तो इसमें क्या हुआ! हाँ, हमारा काम चिकना-चुपड़ा नहीं है; लेकिन हमें किसी के आगे झुकने की भी ज़रूरत नहीं है। शहर में तुम हज़ार लालच से घिरी रहती हो। आज नहीं तो कल की क्या ख़बर है। कल तुम्हारे आदमी को पाप का लोभ—जुआ, शराब और दूसरी बुराइयाँ फँसा सकते हैं, तब घड़ी भर में सब बरबाद हो जाएगा। क्या ऐसी बातें अक्सर होती नहीं हैं?”

    घर का मालिक दीना ओसारे में पड़ा औरतों की यह बात सुन रहा था। उसने सोचा कि बात तो खरी है। बचपन से माँ-धरती की सेवा में हम इतने लगे रहते हैं। कि कोई व्यर्थ की बात हमारे मन में घर नहीं कर पाती है। बस, है तो मुश्किल एक है। वह यह कि हमारे पास ज़मीन काफ़ी नहीं है। ज़मीन ख़ूब हो तो मुझे किसी की परवाह रहे, चाहे शैतान ही क्यों हो।

    औरतों में फिर इधर की, उधर की, घर की और परिवार की सब बातचीत हुई। आख़िर अलग होकर वे आराम करने लगीं।

    लेकिन वहीं कोने में शैतान दुबका बैठा था। उसने सब कुछ सुना। वह ख़ुश था कि किसान की बीवी ने गाँव की बड़ाई करके अपने आदमी को डींग पर चढ़ा दिया। देखो न, कहता था कि ज़मीन ख़ूब हो तो फिर शैतान भी जाए तो परवाह नहीं।

    शैतान ने मन में कहा कि अच्छा हज़रत, यही फैसला सही। मैं तुमको काफ़ी ज़मीन दूँगा और देखना है कि उसी से तुम मेरे चंगुल में होते हो कि नहीं।

    दो

    गाँव के पास ही ज़मींदारी की मालकिन की कोठी थी। कोई तीन सौ एकड़ उनकी ज़मीन थी। उनके अपने आसामियों के साथ बड़े अच्छे संबंध रहते आए थे; लेकिन उन्होंने एक कारिंदा रखा, जो पहले फ़ौज में रहा था। उसने आकर लोगों पर ज़ुर्माने ठोकने शुरू कर दिए।

    दीना का यह हाल था कि वह बहुतेरा करता, पर कभी तो उनका बैल ज़मींदारी की चरी में पहुँच जाता, कभी गाय बगिया में चरती पाई जाती। और नहीं तो उसकी रखाई हुई घास में बछिया-बछड़ा ही जा मुँह मारते। हर बार दीना को ज़ुर्माना उठाना पड़ता। ज़ुर्माना तो वह देता, पर बेमन। वह कुनमुनाता और चिढ़ा हुआ-सा घर पहुँचता और अपनी सारी चिढ़ घर में उतारता। पूरे मौसम कारिंदे की वजह से उसे ऐसा त्रास भुगतना पड़ा। जाड़ों का पतझड़ आने पर वह ख़ुश होता कि चलो, अब जानवरों को अंदर बंद रखना पड़ेगा। ढोर तब बाहर चर सकते नहीं थे और उन्हें घर में रखकर खिलाना पड़ता था। पर चलो, दीना को जुर्माने की चिंता से तो मुक्ति मिल जाती थी।

    अगले जाड़ों में गाँव में ख़बर हुई कि मालकिन अपनी ज़मीन बेच रही है। और मुंशी इकरामअली से सौदे की बातचीत चल रही है। किसान सुनकर चौकन्ने हुए। उन्होंने सोचा कि मुंशीजी की ज़मीन होगी तो वह ज़मींदार के कारिंदे से भी ज़्यादा सख़्ती करेंगे और ज़ुर्माने चढ़ाएँगे और हमारी तो गुज़र-बसर इसी ज़मीन पर है।

    यह सोचकर किसान मालकिन के पास गए। कहा कि मुंशीजी को ज़मीन दीजिए। हम उससे बढ़ती क़ीमत पर लेने को तैयार हैं। मालकिन राज़ी हो गई। तब किसानों ने कोशिश की कि मिलकर गाँव-पंचायत की तरफ़ से वह सब ज़मीन ली जा सके ताकि वह सभी की बनी रहे। दो बार इस पर विचार करने को पंचायत जुड़ी, पर फ़ैसला हुआ। असल में शैतान की सब करतूत थी। उसने उनके बीच फूट डाल दी थी। बस, तब वे मिलकर किसी एक मत पर ही नहीं सके। तय हुआ कि अलग-अलग करके ही वह ज़मीन ले ली जाए। हर कोई अपने बित्ते के हिसाब से ले। मालकिन पहले की तरह इस बात पर भी राज़ी हो गई।

    इतने में दीना को मालूम हुआ कि एक पड़ोसी इकट्ठे पचास एकड़ ज़मीन ले रहा है और ज़मींदारिन राज़ी हो गई है कि आधा रुपया अभी नक़द ले लें बाक़ी साल भर बाद चुकता हो जाएगा।

    दीना ने अपनी स्त्री से कहा कि और जने ख़रीद रहे हैं। हमें भी बीस या इतने एकड़ ज़मीन लेनी चाहिए। जीना वैसे भार हो रहा है और वह कारिंदा ज़ुर्माने-पर-ज़ुर्माने करके हमें बरबाद ही कर देगा।

    उन दोनों ने मिलकर विचार किया कि किस तरकीब से ज़मीन ख़रीदी जाए। सौ कलदार तो उनके पास बचे हुए रखे थे। एक उन्होंने उमर पर आया अपना बछड़ा बेच डाला। कुछ माल बँधक रखा। अपने बड़े बेटे को मज़दूरी पर चढ़ाकर उसकी नौकरी के मद्दे कुछ रुपया पेशगी ले लिया। बाक़ी बचा अपनी स्त्री के भाई से उधार ले लिया। इस तरह कोई आधी रक़म उन्होंने इकट्ठी कर ली।

    इतना करके दीना ने एक चालीस एकड़ का ज़मीन का टुकड़ा पसंद किया जिसमें कुछ हिस्से में दरख़्त भी खड़े थे। मालकिन के पास उसका सौदा करने पहुँचा। सौदा पट गया और वहीं-के-वहीं नक़द उसने साई दे दी। फिर क़स्बे में जाकर लिखा-पढ़ी पक्की कर ली।

    अब दीना के पास अपनी निजी ज़मीन थी। उसने बीज ख़रीदा और इसे अपनी ज़मीन पर बोया। इस तरह वह अब ख़ुद ज़मींदार हो गया। अपनी ज़मीन जोतता और बोता। अपनी ज़मीन पर चारा उगाता, फल के पेड़ लगाता। ईंधन भी वहीं हो जाता था और उसके ढोरों को चराई के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता था। अब वह अपने खेतों की तरफ़ जाता, या लहराती फ़सल को निहारता, या हरी घास की चरागाहों पर नज़र फैलाता तो उसका मन हर्ष से भर जाता था। यह बिछी घास, उगते पौधे और फलते फूल ऐसे मालूम होते थे कि और सबसे बढ़कर। पहले जब वह वहाँ से गुज़रता तो यह ज़मीन बिल्कुल ऐसी मालूम होती थी जैसी और ज़मीन। लेकिन अब बात ही दूसरी हो गई थी।

    तीन

    इस तरह दीना काफ़ी ख़ुशहाल था। उसके संतोष में कोई कमी रहती, अगर बस पड़ोसियों की तरफ़ से उसे पूरा चैन मिल सकता। कभी-कभी उसके खेतों पर पड़ोसियों के मवेशी चरते। दीना ने बहुत विनय के साथ समझाया, लेकिन कुछ फर्क़ नहीं हुआ। उसके बाद, और-तो-और, घोसी-छोकरे गाँव की गायों को दिन-दहाड़े उसकी ज़मीन में छोड़ देने लगे। रात को बैल खेतों का नुकसान करते। दीना ने उनको बार-बार निकलवाया और बार-बार उसने उनके मालिकों को माफ़ किया। एक अर्से तक वह धीरज रखे रहा और किसी के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की। लेकिन कब तक? आख़िर उसका धीरज टूट गया और उसने अदालत में दरख़्वास्त दी। मन में जानता तो था कि मुसीबत की वजह असली यह है कि और लोगों के पास ज़मीन की कमी है, जान-बूझकर दीना को सताने की मंशा किसी की नहीं है। लेकिन उसने सोचा कि इस तरह मैं नरमी दिखाता जाऊँगा तो वे लोग शह पाते जाएँगे और मेरे पास जितना है सब बरबाद कर देंगे। नहीं, उनको एक सबक सिखाना चाहिए।

    सो उसने ठान ली। एक सबक दिया, दूसरा दिया। नतीजा कि दो-तीन किसानों पर अदालत से ज़ुर्माना हो गया। इस पर तो पास-पड़ोस के लोग दीना से कीना रखने लगे। अब कभी-कभी जान-बूझकर भी तंग करने के लिए अपने मवेशी उसके खेतों में छोड़ देते। एक आदमी गया और उसे ज़रूरत अगर घर में ईंधन की थी तो उसने रात में जाकर सात पूरे शीशम के दरख़्त काट गिराए। दीना ने सवेरे घूमते हुए देखा कि पेड़ कटे हुए पड़े हैं। वे धरती से सटे हैं और उनकी जगह खड़े ठूँठ मानो दीना को चिढ़ा रहे हैं। देखकर उसको तैश गया।

    उसने सोचा कि अगर दुष्ट ने एक यहाँ का तो दूसरा दूर का पेड़ काटा होता तो भी ग़नीमत थी। लेकिन कमबख़्त ने आस-पास के सब पेड़ काटकर बग़िया को वीरान कर दिया। पता लगे तो ख़बर लिए बिना छोड़ूँ। उसने जानने के लिए सिर खुजलाया कि यह करतूत किसकी हो सकती है। आख़िर तय किया कि हो-न-हो यह धुन्नू होगा। और कोई ऐसा नहीं कर सकता। यह सोच धुन्नू की तरफ़ गया कि शायद कुछ सूत पकड़ाई मिले, लेकिन वहाँ कुछ चोरी का सबूत मिला नहीं और आपस में कहा-सुनी और तेज़ा-तेज़ी के सिवा कुछ नतीजा निकला। तो भी उसके मन में पक्का हो गया कि धुन्नू ने ही यह किया है और जाकर रपट लिखा दी। धुन्नू की पेशी हुई, मामला चला। एक अदालत से दूसरी अदालत हुई। आख़िर में धुन्नू बरी हो गया, क्योंकि कोई सबूत और गवाह ही नहीं थे। दीना इस बात पर और भी झल्ला उठा और अपना ग़ुस्सा मजिस्ट्रेट पर उतारने लगा।

    इस तरह दीना का अपने पड़ोसियों और अफ़सरों से मनमुटाव होने लगा, यहाँ तक कि उसके घर में भी आग लगाने की बातें सुनी जाने लगीं। अगर्चे दीना के पास अब ज़मीन ज़्यादा थी और ज़मींदारों में गिनती थी, पर गाँव में और पंचों में पहला-सा उसका मान रह गया था।

    इसी बीच अफ़वाह उड़ी कि कुछ लोग गाँव छोड़-छोड़कर कहीं जा रहे हैं।

    दीना ने सोचा कि मुझे तो अपनी ज़मीन छोड़ने की ज़रूरत है ही नहीं। लेकिन और कुछ लोग अगर गाँव छोड़ेंगे तो चलो, गाँव में भीड़ ही कम होगी। मैं उनकी ज़मीन ख़ुद ले लूँगा। तब ज़्यादा ठीक रहेगा। अब तो कुछ तंगी मालूम होती है।

    एक दिन दीना घर के ओसारे में बैठा हुआ था कि एक परदेशी-सा किसान उधर से गुज़रता हुआ उसके घर उतरा। वह वहाँ रातभर ठहरा और खाना भी वहीं खाया। दीना ने उससे बातचीत की कि भाई कहाँ से रहे हो? उसने कहा कि दरिया सतलज के पार से रहा हूँ। वहाँ बहुत काम है। फिर एक में से दूसरी बात निकली और आदमी ने बताया कि उस तरफ़ नई बस्ती बस रही है। उसके अपने गाँव के कई और लोग वहाँ पहुँचे हैं। वे सोसायटी में शामिल हो गए हैं और हरेक को बीस एकड़ ज़मीन मुफ़्त मिली है। ज़मीन ऐसी उम्दा है कि उस पर गेहूँ की पहली फ़सल जो हुई तो आदमी से ऊँची उसकी बालें गईं और इतनी घनी कि दराँत के एक काट में एक पूला बन जाए। एक आदमी के पास खाने को दाने थे। ख़ाली हाथ वहाँ पहुँचा। अब उसके पास दो गायें, छह बैल और भरा खलियान अलग।

    दीना के मन में अभिलाषा पैदा हुई। उसने सोचा कि मैं यहाँ तंग सँकरी-सी जगह में पड़ा क्या कर रहा हूँ, जबकि दूसरी जगह मौक़ा खुला पड़ा है। यहाँ की ज़मीन, घर-बार बेच-बाच कर नक़दी बना वहीं क्यों पहुँचूँ और नए सिरे से शुरू करके देखें। यहाँ लोगों की गिचपिच हुई जाती है। उससे दिक़्क़त होती है और तरक़्क़ी रुकती है, लेकिन पहले ख़ुद जाकर मालूम कर आना चाहिए कि क्या बात है। सो बरसात के बाद तैयारी करके वह चल दिया। पहले रेल में गया, फिर सैकड़ों मील बैलगाड़ी पर या पैदल सफ़र करता हुआ सतलज के पारवाली जगह पर पहुँचा। वहाँ देखा कि जो उस आदमी ने कहा था, सब सच है। सबके पास ख़ूब ज़मीन है। हरेक को सरकार की तरफ़ से बीस-बीस एकड़ ज़मीन मिली हुई है, या जो चाहे ख़रीद सकता है। और ख़ूबी यह कि कौड़ियों के मोल जितनी चाहे ज़मीन और भी ले लो।

    सब ज़रूरी बातें मालूम करके दीना जाड़ों से पहले-पहल घर गया। आकर देश छोड़ने की बातें सोचने लगा। नफ़े के साथ उसने सब ज़मीन बेच डाली। घर-मकान, मवेशी-डंगर सबकी नक़दी बना ली और पंचायत से इस्तीफ़ा दे दिया और सब कुनबे को साथ ले सतलज-पार लिए रवाना हो गया।

    चार

    दीना परिवार के साथ उस जगह पहुँच गया। जाते ही एक बड़े गाँव की पंचायत में शामिल होने की अर्जी दी। पंचों की उसने ख़ूब ख़ातिर की और दावतें दीं। ज़मीन का पट्टा उसे सहज मिल गया। मिली-जुली ज़मीन में से उसके और उसके बालबच्चों के इस्तेमाल के लिए पाँच हिस्से यानी सौ एकड़ ज़मीन उसको दे दी गई। वह सब इकट्ठी नहीं थी, टुकड़े कई जगह थे। अलावा इसके पंचायती चरागाह भी उसके लिए खुला कर दिया गया। दीना ने ज़रूरी इमारतें अपने लिए खड़ी कीं और मवेशी ख़रीद लिए। शामलात ज़मीन में से ही अब उसको इतना मिल गया था कि पहले से तिगुनी, और ज़मीन उपजाऊ थी। वह पहले से कई गुना ख़ुशहाल हो गया। उसके पास चराई के लिए खुला मैदान-का-मैदान पड़ा था और जितने चाहे वह ढोर रख सकता था।

    पहले तो वहाँ ज़मने और मकान-वकान बनवाने का उसे रस रहा। वह अपने से ख़ुश था और उसे गर्व मालूम होता था। पर जब वह इस ख़ुशहाली का आदी हो गया तो उसे लगने लगा कि यहाँ भी ज़मीन काफ़ी नहीं है; और होती तो अच्छा था। पहले साल उसने गेहूँ बुवाया और ज़मीन ने अच्छी फ़सल दी। वह फिर गेहूँ ही बोते जाना चाहता था, पर उसके लिए और पड़ती ज़मीन काफ़ी थी। जो एक बार चुकती थी, वह उस तरफ़ एक साथ दुबारा गेहूँ नहीं देती थी। एक या दो साल उससे गेहूँ ले सकते थे, फिर ज़रूरी होता था कि धरती को आराम दिया जाए। बहुत लोग ऐसी ज़मीन चाहने वाले थे, लेकिन सबके लिए आती कहाँ से? इससे बदाबदी और खींचातानी होती थी। जो संपन्न थे, वे गेहूँ उगाने के लिए ज़मीन चाहते थे। जो ग़रीब थे वे अपनी ज़मीन से जैसे-तैसे पैसा वसूल करना चाहते थे, ताकि टैक्स वग़ैरा अदा कर सकें। दीना और गेहँ बोना चाहता था। इसलिए एक साल के लिए किराए पर उसने और ज़मीन ले ली। ख़ूब गेहूँ बोया और फ़सल भी ख़ूब हुई। लेकिन ज़मीन गाँव से दूर पड़ती थी और गल्ला मीलों दूर से गाड़ी में भर-भरकर लाना होता था। कुछ दिनों बाद दीना ने देखा कि कुछ बड़े-बड़े लोग अलग फार्म डाल कर रहते है और वे ख़ूब पैसा कमा रहे हैं। उसने सोचा कि अगर मैं इकट्ठी कायमी ज़मीन ले लूँ और वहीं घर बसाकर रहूँ तो बात ही दूसरी हो जाए।

    इस तरह इकट्ठी और कायमी ज़मीन ख़रीदने का सवाल बार-बार उसके मन में उठने लगा।

    तीन साल इस तरह निकले। ज़मीन किराए पर लेता और गेहूँ बोता। मौसम ठीक गए, काश्त अच्छी हुई और दीना के पास माल जमा होने लगा। वह इसी तरह संतोष से बढ़ता जा सकता था, लेकिन हर साल और लोगों से ज़मीन किराए पर लेने और उसके लिए कोशिश और सिरदर्दी करने के काम से वह थक गया था। जहाँ ज़मीन अच्छी होती, वहीं लेनेवाले दौड़ पड़ते। इससे बहुत चौकस-चौकन्ना और होशियार रहा जाता तो ज़मीन मिलना असंभव था। यह एक परेशानी की बात थी। तिसपर तीसरे साल ऐसा हुआ कि दीना ने एक महाजन के साझे में कुछ काश्तकारों से एक ज़मीन किराए ली। ज़मीन गोड़ कर तैयार हो चुकी थी कि कुछ आपस में तनातनी हो गई और किसान लोग झगड़ा लेकर अदालत पहुँचे। अदालत से मामला बिगड़ गया और की-कराई मेहनत बेकार गई।

    दीना ने सोचा कि अगर कहीं ज़मीन मेरी कायमी मिल्कियत की होती तो मैं आज़ाद होता और काहे को यह पचड़ा बनता और बखेड़ा बढ़ता। उस दिन से वह ज़मीन के लिए निगाह रखने लगा। आख़िर एक किसान मिला, जिसने एक हज़ार एकड ज़मीन ख़रीदी थी, लेकिन पीछे उसकी हालत, संभली रही। अब मुसीबत में पड़कर वह उसे सस्ती देने को तैयार था। दीना ने बात उससे चलाई और सौदा करना शुरू किया। आदमी मुसीबत में था, इससे दीना भाव-दर में कसा-कसी भी कर सका। आख़िर क़ीमत एक हज़ार रुपए तय पाई। कुछ नक़द दे दिया जाए, बाक़ी फिर। सौदा पक्का हो ही गया था कि एक सौदागर अपने घोड़े के दाने-पानी के लिए उसके घर के आगे ठहरा। उससे दीना की बातचीत जो हुई तो सौदागर ने कहा कि मैं नर्मदा नदी के उस पार से चला रहा हूँ। वहाँ 1500 एकड़ उम्दा ज़मीन कुल पाँच सौ रुपए में मैंने ख़रीदी थी। सुनकर दीना ने उससे और सवाल पूछे। सौदागर ने कहा—

    “बात यह है कि अफ़सर-चौधरी से मेल-मुलाक़ात करने का हुनर चाहिए। सौ से बढ़ती रुपए तो मैंने रेशमी कपड़े और ग़लीचे देने में ख़र्च किए होंगे। फिर शराब, फल-मेवों की डालियाँ, चाय-सेट वग़ैरा के उपहार अलग। नतीजा यह कि फी एकड़ मुझे ज़मीन आनों के भाव पड़ गई।” कहकर सौदागर ने अपने दस्तावेज़ सब दीना के सामने कर दिए।

    फिर कहा, “ज़मीन ऐन नदी के किनारे है और सारे का सारा किता इकट्ठा है। उपजाऊ इतना कि क्या पूछो।”

    दीना ने इस पर उत्सुकतापूर्वक सौदागर से सवाल पर सवाल किए। उसने बताया—

    “वहाँ इतनी ज़मीन है, इतनी, कि तुम महीनों चलो तो पूरी हो। वहाँ के लोग ऐसे सीधे हैं जैसे भेड़। और ज़मीन समझो मुफ़्त के भाव ले सकते हो।”

    दीना ने सोचा, यह ठीक रहेगा। भला मैं अब हज़ार एकड़ के लिए हज़ार रुपए क्यों फसाऊँ? अगर वहाँ जाकर इतना रुपया ज़मीन में लगाऊँ तो यहाँ से कई गुनी ज़्यादा ज़मीन मुझे पड़ जाएगी।

    पाँच

    दीना ने पूछताछ की कि उस जगह कैसे जाया जाए। सौदागर ने सब बतला दिया। वह चला गया तो दीना ने भी अपनी तैयारी शुरू की। बीवी को कहा कि घर देखना-भालना और ख़ुद एक आदमी साथ ले यात्रा को निकल पड़ा। रास्ते में एक शहर में ठहरकर, वहाँ से चाय के डब्बे और शराब और इसी तरह और उपहार की चीज़ें जो सौदागर ने बताई थीं, ले लीं। फिर दोनों बढ़ते गए, बढ़ते गए। चलते-चलते आख़िर सातवें रोज़ वहाँ पहुँचे जहाँ से कोल लोगों की बस्ती शुरू होती थी। देखा तो यहाँ सौदागर ने बताई वही बात थी। दरिया के पास ज़मीन-ही-ज़मीन थी। सब ख़ाली। ये लोग उससे काम लेते थे। कपड़े या सिरकी के तंबू में रहते, शिकार करते, मवेशी पालते और ऐसे ही मौज़ करते थे। रोटी बनाना जानते थे, अनाज उगाना सीखे थे। दूध का छाछ-मठा बनाते, पनीर बनाते, और उसकी एक तरह की शराब भी तैयार कर लेते थे। ये सब काम औरतें करतीं। मर्द खाने-पीने और फ़ुर्सत के वक़्त चैन की बंसी बजाने में रहते। वे लोग मज़बूत और स्वस्थ थे और काम-धाम के नाम बिना कुछ किए मगन रहते थे। अपने से बाहर उन्हें कुछ पता था। पढ़ना-लिखना सीखे नहीं थे और हिंदी तक नहीं जानते थे। पर थे भले-सीधे स्वभाव के। दीना को देखते ही वे अपने तंबुओं से निकल आए और उसके चारों तरफ़ जमघट लगाकर खड़े हो गए। उनमें के एक दुभाषिए की मार्फ़त दीना ने बतलाया कि मैं ज़मीन की ख़ातिर आया हूँ। वे लोग बड़े ख़ुश मालूम हुए। बड़ी आवभगत के साथ वे उसे अपने अच्छे-से-अच्छे डेरे में ले गए। वहाँ कालीन पर बिछे गद्दे पर बिठाया और ख़ुद नीचे चारों ओर घिरकर बैठ गए। उसे पीने को चाय दी और दारू भी। उसकी मेहमानी में बढ़-चढ़कर दावत हुई। दीना ने भी गाड़ी में से अपने पास से भेंट की चीज़ें निकालीं और सबको थोड़ी-थोड़ी चाय बाँटी। कोल लोग बड़े ख़ुश थे। उन्होंने आपस में इस अजनबी की बाबत ख़ूब चर्चा की। फिर दुभाषिए से कहा कि मेहमान को सब समझा दो।

    दुभाषिए ने कहा कि ये लोग कहना चाहते हैं कि हम आपके आने से ख़ुश हैं। हमारे यहाँ का क़ायदा है कि मेहमान की ख़ातिर जो हमसे बन सके, करें। आपकी कृपा के हम कृतज्ञ हैं। बतलाइए कि हमारे पास कौन-सी चीज़ है जो आपको सबसे पसंद है, ताकि हम उसी से आपकी ख़ातिर कर सकें।

    दीना ने जवाब दिया कि जिस चीज़ को देखकर मैं बहुत ख़ुश हूँ, वह आपकी ज़मीन है। हमारे यहाँ ज़मीन की कमी है और वह उपजाऊ भी इतनी नहीं होती लेकिन यहाँ उसका कोई पार नहीं है और वह ज़मीन उपजाऊ भी ख़ूब है। मैंने तो अपनी आँखों से यहाँ जैसी धरती दूसरी देखी नहीं।

    दुभाषिए ने दीना की बात अपने लोगों को समझा दी। कुछ देर वे आपस में सलाह करते रहे। दीना समझ नहीं सका कि वे क्या कह रहे हैं। लेकिन उसने देखा कि वे बहुत ख़ुश मालूम होते हैं, बड़े हँस रहे हैं और ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे हैं। अनंतर वे चुप हुए और दीना की तरफ़ देखने लगे।

    फिर आपस में बात करने लगे। मालूम पड़ा कि जैसे उनमें कुछ दुविधा है। दीना ने पूछा कि उन लोगों में अब किस बात की अटक है। दुभाषिए ने बताया कि उनमें कुछ की राय है कि सरदार से ज़मीन देने के बारे में और पूछ लेना चाहिए, ग़ैर-हाज़िरी में कुछ कर डालना ठीक नहीं है। दूसरों का ख़याल है कि इस बात में सरदार के लौटने की राह देखने की ज़रूरत नहीं है, ज़रा-सी तो बात है।

    छः

    यह विवाद चल रहा था कि एक आदमी बड़ी-सी बालदार टोपी पहने वहाँ पहुँचा। सब चुप होकर उसके सम्मान में खड़े हो गए। दुभाषिए ने कहा कि यही हमारे सरदार हैं।

    दीना ने फ़ौरन अपने सामान में से एक बढ़िया लबादा निकाला और चाय का एक बड़ा डिब्बा; और ये चीज़ें सरदार को भेंट कीं। सरदार ने भेंट स्वीकार की और अपने आसन पर बैठा। बैठते ही कोल लोगों ने उससे कुछ कहना शुरू किया। सरदार कुछ देर सुनता रहा। फिर उसने उन्हें चुप रहने का इशारा किया। उसके बाद दीना की तरफ़ मुख़ातिब होकर हिंदुस्तानी में कहा—

    “इन भाइयों ने जो कहा, ठीक है। जो ज़मीन चाहे चुन लो। हमारे यहाँ उसका घाटा नहीं है।”

    दीना ने सोचा कि मैं मनचाहे जितनी ज़मीन कैसे ले सकता हूँ। पक्का करने के लिए दस्तावेज़ वग़ैरा भी तो चाहिए, नहीं तो जैसे आज इन्होंने कह किया कि यह तुम्हारी है, पीछे वैसे ही उसे ले भी सकते हैं।

    प्रकट में उसने कहा, “आपकी दया के लिए मैं कृतज्ञ हूँ। आपके पास बहुत धरती है और मुझे थोड़ी-सी चाहिए। लेकिन मुझे भरोसा होना चाहिए कि मेरा अपना छोटा टुकड़ा कौन-सा है और यह कि वह मेरा ही है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ज़मीन को नाप लिया जाए और उतना टुकड़ा फिर मेरे हवाले कर दिया जाए? मरना-जीना ईश्वर के हाथ है और संसार में यही चक्कर चलता है। आप दयावान लोग तो मुझे ये देते हैं, पर हो सकता है कि पीछे आपकी औलाद उसी को वापस ले लेना चाहे तब—?”

    सरदार ने कहा, “तुम्हारी बात ठीक है। ज़मीन तुम्हारे हवाले ही कर दी जाएगी।”

    दीना ने कहा, “सुना है, यहाँ एक सौदागर आया था। उसको भी आपने ज़मीन दी थी और उस बाबत काग़ज़ पक्का कर दिया था। वैसे ही मैं चाहता हूँ कि काग़ज़ पक्का हो जाए

    सरदार समझ गया।

    बोला, “हाँ, ज़रूर। यह तो आसानी से हो सकता है। हमारे यहाँ एक मुंशी है, क़स्बे में चलकर लिखा-पढ़ी पक्की कर ली जाएगी और रजिस्ट्री हो जाएगी।”

    दीना ने पूछा, “क़ीमत की दर क्या होगी?”

    “हमारी दर तो एक ही है। एक दिन के एक हज़ार रुपए।”

    दीना समझा नहीं। बोला, “दिन! दिन का हिसाब यह कैसा है? यह बताइए कितने एकड़?”

    सरदार ने कहा, “यह सब गिनना-गिनाना हमसे नहीं होता। हम तो दिन के हिसाब से बेचते हैं। जितनी ज़मीन एक दिन में पैदल चलकर तुम नाप डालो, वही तुम्हारी। और क़ीमत है ही दिनभर की एक हज़ार।”

    दीना अचरज में पड़ गया। कहा, “एक दिन में तो बहुत-सी ज़मीन को घेरा जा सकता है।”

    सरदार हँसा। बोला, “हाँ, क्यों नहीं। बस, वह सब तुम्हारी।” लेकिन एक शर्त है। अगर तुम उसी दिन उसी जगह गए, जहाँ से चले थे, तो क़ीमत ज़ब्त समझी जाएगी।”

    “लेकिन मुझे पता कैसे चलेगा कि मैं इस जगह से चला था।”

    “क्यों, हम सब साथ चलेंगे और जहाँ तुम ठहरने को कहोगे ठहरे रहेंगे। उस जगह से शुरू करना और वहीं लौट आना। साथ फावड़ा ले लेना। जहाँ ज़रूरी समझा, निशान लगा दिया। हर मोड़ पर एक गड्ढा किया और उस पर घास को ज़रा ऊँचा चिन दिया। पीछे फिर हम लोग चलेंगे और हल से इस निशान से उस निशान तक हदबंदी खींच देंगे। अब दिनभर में जितना चाहो बड़े-से बड़ा चक्कर तुम लगा सकते हो। पर सूरज छिपने से पहले जहाँ से चले थे वहाँ पहुँचना। जितनी ज़मीन तुम इस तरह नाप लोगे वह तुम्हारी हो जाएगी।”

    दीना ख़ुश हुआ। तय हुआ कि अगले सवेरे ही चलना शुरू कर दिया जाएगा। फिर कुछ गपशप हुई, खाना-पीना हुआ। ऐसे ही करते-कराते रात हो गई। दीना के लिए उन्होंने ख़ूब आराम का परों का बिस्तर लगा दिया और वे लोग रातभर के लिए विदा हो गए। कह गए कि पौ फटने से पहले ही वे जाएँगे ताकि सूरज निकलने से पहले-पहले मुक़ाम पर पहुँच जाया जाए।

    सात

    दीना अपने परों के बिस्तरे पर लेटा तो रहा, पर उसे नींद आई। रह-रहकर वह ज़मीन के बारे में सोचने लगता था—“चलकर मैं कितनी ज़मीन नाप डालूँगा, कुछ ठिकाना है! एक दिन में पैंतीस मील तो आसानी से कर ही लूँगा। दिन आजकल लंबे होते हैं और पैंतीस मील!— कितनी ज़मीन उसमें जाएगी! उसमें से घटियावाली तो बेच दूँगा या किराए पर उठा दूँगा। लेकिन जो चुनी हुई उम्दा होगी वहाँ अपना फ़ार्म बनाऊँगा। दो दर्जन तो बैल फ़िलहाल काफ़ी होंगे। दो आदमी भी रखने होंगे। कोई डेढ़ सौ एकड़ में तो काश्त करूँगा। बाक़ी चराई के लिए।”

    दीना रातभर पड़ा ज़मीन-आसमान के कुलाबे मिलाता रहा। देर रात कहीं थोड़ी नींद आई। आँख झपी होगी कि एक सपना दिखाई दिया।...वह उसी डेरे में है...कि किसी के बाहर से खिलखिलाकर हँसने की आवाज़ उसके कानों में आई। अचरज हुआ कि यह कौन हो सकता है? उठकर बाहर आकर देखा कि कोल लोगों का वह सरदार ही बाहर बैठा ठट्ठा दे-देकर हँस रहा है। हँसी के मारे अपना पेट पकड़ लेता है। पास जाकर दीना ने पूछा, “आप ऐसा हँस क्यों रहे हैं?” लेकिन अभी पूछ पाया नहीं था कि देखता क्या है कि वहाँ सरदार तो है नहीं, बल्कि वह सौदागर बैठा है जो अभी कुछ दिन पहले उसे अपने देश में मिला था और जिसने इस ज़मीन की बात बताई थी। तब दीना उससे पूछने को हुआ कि यहाँ तुम कैसे हो और कब आए? लेकिन देखा तो वह सौदागर भी नहीं, बल्कि वह पुराना किसान है जिसने मुद्दत हुई तब सतलज-पार की ज़मीन का पता दिया था। लेकिन फिर जो देखता है तो वह किसान भी नहीं है, बल्कि ख़ुद शैतान है, जिसके खुर हैं और सींग हैं। वही वहाँ बैठा ठट्ठा मारकर हँस रहा है। सामने उसके एक आदमी पड़ा हुआ है—नंगे पैर, बदन पर बस एक कुर्त्ता-धोती। ज़मीन पर वह आदमी औंधे मुँह बेहाल पड़ा है। दीना ने सपने में ही ध्यान से देखा कि ऐसे पड़ा हुआ आदमी वह कौन है और कैसा है? देखता क्या है कि वह आदमी दूसरा कोई नहीं, ख़ुद दीना ही है और उसकी जान निकल चुकी है। यह देख मारे डर के वह घबरा गया। इतने में उसकी आँख खुल गई।

    उठकर सोचा कि सपने में आदमी जाने क्या-क्या वाहियात बातें देख जाता है। अंह! यह सोचकर मुँह मोड़ दरवाजे के बाहर झाँककर जो देखा तो सवेरा होनेवाला था। सोचा, समय हो गया। उन्हें अब जगा देना चाहिए। चलने में देर ठीक नहीं।

    वह खड़ा हो गया और गाड़ी में सोते हुए अपने आदमी को जगाया। कहा कि गाड़ी तैयार करो। ख़ुद कोल लोगों को बुलाने चल दिया।

    जाकर कहा, “सवेरा हो गया है। ज़मीन नापने चल पड़ना चाहिए।” कोल लोग सब उठे और इकट्ठे हुए। सरदार भी गए। चलने से पहले उन्होंने चाय की तैयारी की और दीना को चाय के लिए पूछा। लेकिन चाय में देर होने का ख़याल कर उसने कहा, “अगर जाना है तो हमको चल देना चाहिए। वक़्त बहुत हो गया।”

    आठ

    कोल तैयार हुए और सब चल पड़े। कुछ घोड़े पर, कुछ गाड़ी में। दीना नौकर के साथ अपनी छोटी बहली में सवार था। फावड़ा उसने साथ रख लिया था। खुले मैदान में जब पहुँचे, तड़का फूट ही रहा था। पास एक ऊँची टेकड़ी थी, पार खुला बिछा मैदान। टेकड़ी पर पहुँचकर गाड़ी-घोड़ों से सब उतर आए और एक जगह जमा हुए। सरदार ने फिर आगे जाने कितनी दूर तक फैले मैदान की तरफ़ हाथ उठाकर दीना से कहा कि देखते हो? यह सब, आँख जाती है वहाँ तक, हम लोगों की ज़मीन है। उसमें जो तुम चाहो ले लो।

    दीना की आँखें चमक उठीं। धरती एकदम अछूती पड़ी थी। बस, हथेली की तरह हमवार और मुलायम। काली ऐसी कि बिनौला। और जहाँ कहीं जरा निचान था, वहाँ छाती-छाती जितनी तरह-तरह की हरियाली छाई थी।

    सरदार ने अपने सिर की रोएँदार टोपी उतारी और धरती पर रख दी। कहा, “यह निशान रहा। यहाँ से चलो और यहीं जाओ। जितनी ज़मीन चल लोगे वही तुम्हारी।”

    दीना ने भी रुपए निकाले और टोपी पर गिनकर रख दिए। फिर उसने पहना हुआ अपना कोट उतार डाला और धोती को कस लिया। अँगोछे में रोटी रखी, आस्तीनें चढ़ाईं, पानी का बंदोबस्त किया, आदमी से फावड़ा लिया और चलने को हो गया। कुछ क्षण सोचता रह गया कि किस तरफ़ को चलना बेहतर तैयार खड़ा होगा। सभी तरफ़ का लालच होता था।

    उसने तय किया कि आगे देखा जाएगा। पहले तो सामने सूरज की तरफ़ ही चला चलूँ। एक बार पूरब की ओर मुँह करके खड़ा हो गया, अँगड़ाई लेकर बदन की सुस्ती हटाई और धरती के किनारे सूरज के मुँह चमकाने का इंतज़ार करने लगा।

    सोचने लगा कि मुझे वक़्त नहीं खोना चाहिए और ठंड-ठंड में रास्ता अच्छा पार हो सकता है। सूरज की पहली किरन का उनकी ओर आना था कि दीना, कंधे पर फावड़ा संभाल, खुले मैदान में क़दम बढ़ाकर चल दिया।

    शुरू में वह धीमे चला, तेज़। हज़ार-एक गज चलने पर वह ठहरा। वहाँ एक गड्ढा किया और घास ऊँची चिन दी कि आसानी से दिख सके। फिर आगे बढ़ा। उसके बदन में फुर्ती गई। उसने चाल तेज़ कर दी। कुछ देर बाद दूसरा गड्ढा खोदा।

    अब पीछे मुड़कर देखा। सूरज की धूप में टेकड़ी साफ़ दिखती थी। उस पर आदमी खड़े थे और गाड़ी के पहियों के अरे तक चमकते दिखते थे। कोई अंदाज़ तीन मील तो वह गया होगा। धूप में ताप आता जाता था। बदन पर से वास्कट उतारकर उसने कंधे पर डाल ली और फिर चल पड़ा। अब ख़ासी गर्मी होने लगी।

    उसने सूरज की तरफ़ देखा। वक़्त हो गया था कि कुछ खाने-पीने की भी सोची जाती।

    “एक पहर तो बीत गया। लेकिन दिन में चार पहर होते हैं। अंह, अभी क्या लौटना! अभी जल्दी है। लेकिन जूते उतार डालूँ।” यह सोच उसने जूते उतारकर धोती में खोंस लिए और बढ़ चला। अब चलना आसान था।

    सोचा, “अभी तीन-एक मील तो और भी चला चलूँ। तब दूसरी दिशा लूँगा। कैसी उम्दा जगह है। इसे हाथ से जाने देना हिमाक़त है। लेकिन क्या अजब बात है कि जितना आगे बढ़ो उतनी ज़मीन एक-से-एक बढ़कर मिलती है।

    मुड़नेवाला था कि आगे बहुत उपजाऊ ज़मीन दिखाई दी कुछ देर वह सीधा बढ़ा चला। फिर पीछे मुड़कर देखा तो टेकड़ी मुश्किल से दिख पड़ती थी और उस पर के आदमी रेंगती चींटी-से मालूम होते थे और वहाँ धूप में जाने क्या कुछ चलता हुआ-सा दिख पड़ता था।

    दीना ने सोचा, “ओह, मैं इधर काफ़ी बढ़ आया हूँ। अब लौटना चाहिए।” पसीना बेहद रहा था और प्यास भी लग आई थी।

    यहाँ ठहरकर उसने गड्ढा किया, ऊपर घास का ढेर चिन दिया। उसके बाद पानी पीकर सीधी बाईं तरफ़ मुड़ गया। चला चलता गया, चला चलता गया। घास ऊँची थी और गर्मी बढ़ रही थी। वह थकने लगा। उसने सूरज की तरफ़ देखा। सिर पर दुपहरी हो आई थी।

    सोचा, अब ज़रा आराम ले लेना चाहिए। वह बैठ गया। रोटी निकालकर खाई और कुछ पानी पिया। लेटा नहीं कि कहीं नीद जाए। इस तरह कुछ देर बैठ फिर आगे बढ़ चला। पहले तो चलना आसान हुआ। खाने से उसमें दम गया था। लेकिन गर्मी तीखी हो चली और आँखों में उसके ऊँघ-सी आने लगी। तो भी वह चलता ही चला गया। सोचा कि तक़लीफ़ घड़ी-दो घड़ी की है, आराम ज़िंदगीभर का हो जाएगा।

    इस तरह भी उसने काफ़ी लंबी राह नापी। वह बाईं तरफ़ मुड़नेवाला ही था कि आगे ज़मीन उपजाऊ दिखाई दी। उसने सोचा कि टुकड़े को छोड़ना तो मूर्खता होगी। यहाँ सनी की बाड़ी ऐसी उगेगी कि क्या कहना! यह सोच उसने उस टुकड़े को भी नाप डाला और पार आकर गड्ढे का निशान बना दिया। फिर दूसरी तरफ़ मुड़ा। जो टेकड़ी की तरफ़ देखा तो ताप के मारे हवा काँपती-सी मालूम हुई। उस कँपकँपी के धुँधकारे में से वह टेकड़ी की जगह मुश्किल से चीह्न पड़ती थी।

    दीना ने सोचा कि क्षेत्र की ये दो भुजाएँ मैंने ज़्यादा नाप डाली हैं। अब इधर कुछ कम ही रहने दूँ। वह तेज़ कदमों से तीसरी तरफ़ बढ़ा। उसने सूरज को देखा। सूरज कोई दो-तिहाई अपना चक्कर काट चुका था और दीना अपने रक़बे की तीसरी दिशा में दो मील मुश्किल से तय कर पाया था। मुक़ाम से अभी वह दस मील दूर था। उसने सोचा कि छोड़ो जाने भी दो। मेरी ज़मीन की एक बाज़ू छोटी रह जाएगी तो छोटी सही। लेकिन अब सीधी लकीर में मुझे वापस चले चलना चाहिए। जो ऐसे कहीं दूर निकल गया तो बाज़ी गई। अरे, इतनी ही ज़मीन क्या थोड़ी है?

    यह सोच दीना ने वहाँ तीसरे गड्ढे का निशान डाल दिया और टेकडी की तरफ़ मुँह कर ठीक उसी सीध में चल दिया।

    नौ

    नाक की सीध बाँधकर वह टेकड़ी की तरफ़ चला। लेकिन अब चलते मुश्किल होती थी। धूप उसका सत ले चुकी थी। नंगे पैर जगह-जगह कट और छिल गए थे और टाँगें जवाब दे रही थीं। जरा आराम करने का उसका जी हुआ, लेकिन यह कैसे हो सकता था? सूरज छिपने से पहले उसे पहुँच जाना था और सूरज किसी की बाट देखता बैठा नहीं रहता। वह पल-पल नीचे ढल रहा था।

    उसके मन में सोच होने लगा कि यह मुझ से बड़ी भूल हुई। मैंने इतने पैर पसारे क्यों? अगर कहीं वक़्त तक पहुँचा तो?

    उसने फिर टेकड़ी की तरफ़ देखा, फिर सूरज की तरफ़। मुक़ाम से अभी वह दूर था और सूरज धरती के पास झुक रहा था।

    दीना जी तोड़ चलने लगा। चलने में साँस फूलती और कठिनाई होती थी; लेकिन तेज़-पर-तेज़ क़दम वह रखता गया। बढ़ा चला, लेकिन जगह अब भी दूर बनी थी। यह देख उसने भागना शुरू किया। कंधे से वास्कट फेंक दी, जूते दूर हटाए, टोपी अलग की, बस साथ में टंकन के तौर पर वह हल्का फावड़ा रहने दिया।

    रह-रहकर सोच होता कि मैं क्या करूँ? मैंने बिसात से बाहर चीज़ हथियानी चाही। उसमें बना काम बिगड़ा जा रहा है। अब सूरज छिपने से पहले मैं वहाँ कैसे पहुँचूँगा?

    इस सोच और डर में वह और हाँफने लगा। वह पसीना-पसीना हो रहा था, धोती गीली होकर चिपकी जा रही थी और मुँह सूख गया था। लेकिन फिर भी वह भागता ही जाता था। छाती उसकी लुहार की धौंकनी की तरह चल उठी, दिल भीतर हथौड़े की चोट-सा धड़कने लगा। उधर टँगें बेबस हुई जा रही थीं। दीना को डर हुआ कि इस थकान के मारे कहीं गिरकर ढेर ही हो जाए।

    हाल यह था, पर रुक वह नहीं सका। इतना भाग कर भी अगर मैं अब रुकूँगा तो वे सब लोग मुझ पर हँसेंगे और बेवक़ूफ़ बनाएँगे, इसलिए उसने दौड़ना छोड़ा, दौड़े ही गया। आगे कोल लोगों की आवाज़ सुन पड़ती थी। वे उसको ज़ोर-ज़ोर से कहकर बुला रहे थे। इन आवाज़ों पर उसका दिल और सुलग उठा। अपनी आख़िरी ताक़त समेट वह दौड़ा।

    सूरज धरती से लगा जा रहा था। तिरछी रोशनी के कारण वह ख़ूब बड़ा और लहू-सा लाल दिख रहा था। वह अब डूबा, अब डूबा। सूरज बहुत नीचे पहुँच गया था। लेकिन दीना भी जगह के बिल्कुल किनारे लगा था। टेकड़ी पर हाथ हिला-हिलाकर बढ़ावा देते हुए कोल लोग उसे सामने दिखाई देते थे। अब तो ज़मीन पर रखी वह टोपी भी दिखने लगी, जिस पर उसकी रक़म भी रखी थी। वहीं बैठा सरदार भी दिखाई दिया—वह पेट पकड़े हँस रहा था।

    दीना को अपने सपने की याद हो आई।

    उसने सोचा कि हाय, ज़मीन तो काफ़ी नाप डाली है, लेकिन क्या ईश्वर मुझे उसको भोगने के लिए बचने देगा? मेरी जान तो गई दिखती है। मैं मुक़ाम तक अब नहीं पहुँच सकूँगा।

    दीना ने हसरत-भरी निगाह से सूरज की तरफ़ देखा। सूरज धरती को छू चुका था। कुछ हिस्सा डूब भी चुका था। वह बची-खुची अपनी शक्ति से आगे बढ़ा। कमर झुकाकर भागा, जैसे कि टाँगें साथ देती हों। टेकड़ी पर पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो आया था। उसने ऊपर देखा—सूरज छिप चुका था। उसके मुँह से एक चीख़-सी निकल गई। “ओह, मेरी सारी मेहनत व्यर्थ गई!” —यह सोचकर वह थमने को हुआ, लेकिन उसे सुन पड़ा कि कोल लोग अब भी उसे पुकार रहे हैं। उसे सहसा याद आया कि वे लोग ऊँचाई पर खड़े हैं और उन्हें सूरज अब भी दिख रहा होगा। सूरज छिपा नहीं है, अगर्चे मुझको नहीं दिखता। यह सोच कर उसने लंबी साँस खींची और टेकड़ी पर आँख मूँदकर दौड़ा। चोटी पर अभी धूप थी। पास पहुँचा और सामने टोपी देखी। बराबर सरदार बैठा वहीं पेट पकड़े हँस रहा था।

    दीना को फिर अपना सपना याद आया और उसके मुँह से चीख़ निकल पड़ी। टाँगों ने जवाब दे दिया। वह मुँह के बल आगे को गिरा और उसके हाथ टोपी तक जा पहुँचे।

    “ख़ूब! ख़ूब!” सरदार ने कहा, “देखो, उसने कितनी ज़मीन ले डाली!'

    दीना का नौकर दौड़ा आया और उसने मालिक को उठाना चाहा। लेकिन देखता क्या है कि मालिक के मुँह से ख़ून निकल रहा है।

    दीना मर चुका था। कोल लोग दया से और व्यंग्य से हँसने लगे।

    नौकर ने फावड़ा लिया और दीना के लिए क़ब्र खोदी और उसमें लिटा दिया।

    सिर से पाँव तक कुल छह फुट ज़मीन उसे काफ़ी हुई।

    स्रोत :
    • पुस्तक : लियो टॉल्सटॉय प्रतिनिधि रचनाएँ भाग-3 (पृष्ठ 102)
    • संपादक : कृष्णदत्त पालीवाल
    • रचनाकार : लियो टॉल्सटॉय
    • प्रकाशन : सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
    • संस्करण : 2019

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