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इमाम साहब

imaam sahab

नासिरा शर्मा

नासिरा शर्मा

इमाम साहब

नासिरा शर्मा

और अधिकनासिरा शर्मा

    अज़ान का वक़्त तंग हो रहा था। आँतें कुल हो अल्लाह पढ़ रही थीं मगर खाने का दूर-दूर पता नहीं था। शकीलउद्दीन बेचैनी से टहल रहे थे। लगता है, आज फिर भूखा रहना क़िस्मत में लिखा है, कहते हुए वह बाहर निकले।

    इमाम साहब! ज़रा ठहरो, खाना तुम्हारे लिए ही ला रही हूँ, बड़े ठस्से से अधेड़ बुलाक़न ने कहा और खाने की सेनी कंधे से उतारी।

    बर्तन बाद में ले जाना, कहते हुए शकीलउद्दीन ने झटपट खाना मय सेनी के टीन के बक्स में रखा और बड़ी बी के जवाब का इंतज़ार किए बिना चप्पल चटखाते चल दिए। घर का दरवाज़ा यूँ पाटो-पाट खुला देख बुलाक़न ने कुंडी लगाई और मुँही-ही-मुँह में बड़बड़ाती गली पार करने लगी। तभी अज़ान की लरजती आवाज़ कानों में पहुँची। सर ढककर वह लंबे-लंबे डग भरती पंचूरिया की दुकान पर जा बैठी और ख़िलाल निकाल दाँत कुरेदने लगी।

    कहो बुलाक़न, क्या चाहिए? रसूल पंचूरिया नमाज़ पढ़कर उठा और टोपी खूँटी पर टाँगते हुए बोला।

    यह लो, फ़ेहरिस्त पकड़ाई है छोटी दुल्हन ने, बुलाक़न ने कुर्ते की जेब से काग़ज़ निकाला।

    इस अज़ान के चलते डंडी मारने वालों को भी ख़ुदा याद आने लगा है। हाजी मियाँ डगमगाते क़दमों से जाते बोले।

    क़ब्र में पैर लटकाए हैं मगर ज़बान पर ज़हर बाक़ी है? दही बिलोते हुए शकूर ने धीरे से कहा।

    अज़ान के बाद शकीलउद्दीन भूख से बिलबिलाते हुए जब मस्जिद से बाहर निकले तो उन्हें आम का पारा लिए दो-तीन लड़के खड़े नज़र आए। उनको वहीं अहाते में बिठा वह बड़े-बड़े डग भरते घर पहुँचे। बक्स खोला सेनी बाहर निकालीं। जिस बात का डर था, वही हुआ। अरहर की पीली दाल में लाल चींटियाँ जीरे की जगह तैर रही थीं।

    इन चींटियों को क्या हो गया है, मीठे की जगह... शकीलउद्दीन हसरत से दाल देखते हुए बोले। उनकी आँखों में आँसू भर आए। सब्ज़ी में तो कुछ पता नहीं चलता। एक दिन भूख से तड़पकर बड़े-बड़े निवाले खाए थे। कई दिन तक जलन के इलाज में पैसे फूँकने पड़े थे। उन्होंने आलू-टमाटर की सब्ज़ी को भूखी नज़रों से घूरते हुए सोचा, फिर रोटी को झाड़ने लगे।

    खाना सामने कुत्ते को डालकर इमाम साहब आप सूखी रोटी क्यों खा रहे हैं? मिलाद का हिस्सा लेकर आया लड़का हैरत से दरवाज़े पर ठिठककर बोला।

    चींटी भर गई हैं...रोज़ का यही क़िस्सा है, पेट में खाना पहुँचता नहीं। सूखी रोटी से फँसी आवाज़ शकीलउद्दीन के सीने में घुट गई तो भी दिल-ही-दिल ख़ुदा का शुक्र अदा किया कि यह तीन मोतीचूर के लड्डू उनका मुँह का मज़ा बदलने में इस वक़्त बड़े मददगार साबित होंगे। पूरा गिलास पानी का पी उनके मुँह से निकला, तू बड़ा रहीम और करीम है।

    यह मोहल्ला भी अजीब-व-ग़रीब है। सामने कीकर के जंगल साफ़ करने से एक पुरानी मस्जिद निकल आई। कई साल तक वह यूँ ही पड़ी रही। किसी ने चिराग़ जलाने की भी ज़रूरत महसूस नहीं की। मगर जब शम्मू फ़क़ीर मरा तो उसकी लाश उठाने और कफ़न-दफ़न से कोई आँख चुरा सका। पंद्रह कोस की दूरी पर लाश के साथ नमाज़-ए-जनाज़ा में जाना भी पड़ा, जो दुकानदारों को खल गया, मगर एकाएक शम्मू फ़क़ीर से नाता तोड़ नहीं सकते थे। रात-भर पहरेदारी उनकी दुकानों की वही करता था। इधर-उधर की ख़बरें भी वही पहुँचाता था। अब मरा तो सबके दिल को तकलीफ़ पहुँची। कफ़न-दफ़न से निबटकर नहा-धोकर जब दुकान खोली तो शब्बन टोपी वाले ने एकाएक कहा—

    बग़ल में लड़का और शहर में ढिंढोरा...

    यानी? गन्ने का रस निकालते-निकालते सिब्ते बोला।

    दो क़दम पर मस्जिद है उसी को आबाद करते हैं यार! रोज़-रोज़ कौन जाएगा इतनी दूर? टोपी को सलीक़े से पटरी पर सजाते हुए शब्बन हँसा।

    बात तो लाख टके की है, मगर अज़ान के बिना मस्जिद कैसी? रसूल पंचूरिया तहमद कसता हुआ बोला।

    पहले इसकी सफ़ाई-पुताई के लिए चंदा जमा करो, फिर इमाम भी ढूँढ़ लेंगे। रहीम नानबाई ने गर्म रोटी निकालते हुए हँसकर कहा।

    “तुमने कहा तुम्हीं निकालो पहले। शब्बन बोल उठा।

    दे दस रुपइया सामने। गर्म रोटी काग़ज़ में लपेटते हुए रहीम ने लड़के को इशारा किया जो उसकी तरफ़ नोट बढ़ाए खड़ा था।

    लो भाई! चट मँगनी पट ब्याह। यह हमारी तरफ़ से रखो। पाँच की रेज़गारी मित्र सत्तू वाले सत्तार ने कहा।

    देखते-देखते दही का कुल्हड़ नोट, रेज़गारी से भर गया। यह देखकर शेरू ने कूँची को हथौड़ी से पीटते हुए कहा— चंदे की जगह आधी मज़दूरी रख लो, पैसा तो पास नहीं है।

    कल से काम शुरू...मरम्मत वग़ैरह बाद में होती रहेगी, अभी चूनाकारी के बाद रोज़ चिराग़ जलाने का बंदोबस्त हो गया समझो, बिस्मिल्लाह हो गई। शब्बन ने रुपए गिनते हुए कहा।

    इस तरह बातों-बातों में खँडहर मस्जिद टूटे दाँत के साथ पुताई के बाद हँस पड़ी। लाइन से बधने वजू के लिए गए। कुछ अगरबत्तियाँ और शमा के पैकेट रख दिए गए। सड़क के तार से बिजली का तार खींच एक बल्ब भी लटक गया, जिसका बिल किसी के मत्थे नहीं पड़ना था। कभी-कभी कुछ दुकानदार चटाई लेकर दुपहर के खाने के बाद एक झपकी भी लेने पहुँच जाते थे। उनके घर आसपास ही थे, मगर बाज़ार से लगे इस कटे जंगल से उग आई मस्जिद ज़्यादा क़रीब थी।

    सुनो भाई! एक इमाम मिल गया है, अज़ान देने के लिए राज़ी है। सिब्ते गाँव से लौटा तो ख़बर लाया।

    नेकी और पूछ-पूछ...साथ ले आते। रसूल पुड़िया तेज़ी से बाँधते हुए बोला।

    रहेगा कहाँ...खाएगा क्या? रहीम ने तंदूर की राख बाहर निकालते हुए कहा।

    यह तो सोचा ही था बड़के भाई! शब्बन ने टोपी ठीक करते हुए कहा।

    हाजी साहब के पास चलते हैं, वही कुछ सुझाएँगे। रहीम ने कहा।

    शाम को दुकान बढ़ाकर सब हाजी साहब के यहाँ पहुँचे जो फुलवारी में पानी दे रहे थे। सबको बैठने को कहकर ख़ुद किसी गहरी सोच में डूब गए, फिर सिर उठाकर बोले, पिछवाड़े वाला मेरा कमरा ख़ाली पड़ा है। खपरैल बिल्लियों ने लड़-लड़कर तोड़ डाली है। चाहो तो इमाम के रहने के लिए दे सकता हूँ, और रहा तनख़्वाह का, वह तुम लोग सोचो उसका पूरा कुनबा होगा।

    “पूरा कुनबा यानी पाँच-छह अदद ज़्यादा भी हो सकते हैं लोग ख़ानदान में। यूसुफ़ कपड़े वाला घबराकर बोल पड़ा।

    बिना दाम दिए सवाब लूटना चाहते हो तुम लोग! हाजी साहब बड़बड़ाए।

    तनख़्वाह भी कितनी देनी पड़ेगी। शकूर ने बीड़ी सुलगाई।

    बाल-बच्चों वाले हो, ख़र्चे-पानी का अंदाज़ा नहीं है क्या? रहीम हँसा।

    मेरी मानो तो अकेली जान रखो। एक-एक वक़्त का खाना सब मिलकर बाँध लो। ऊपर से पाँच सौ रुपया... हाजी धीरे से बोले।

    यह ठीक रहेगा...बात जम गई। कहते हुए सब उठ गए।

    जमेगी क्यों नहीं, चमड़ी जाए मगर दमड़ी जाए, वो तुम लोगों का पेशा है। हाजी साहब खँखारते हुए उठे।

    कुछ दिनों बाद शकीलउद्दीन फूलपुर से अपना टीन का बक्सा उठाए चले आए। पाँच सौ रुपए में पूरे ख़ानदान ने जाने कौन-कौन-सा सपना बुनकर उन्हें शहर रवाना किया था। जुलैखा तो इस बात से ख़ुश थी कि घरों से बढ़िया खाना खा-खाकर मियाँ की सेहत सँभल जाएँगी और पाँच सौ रुपए से उन लोगों का भी फ़ाक़ा टूटेगा। यहाँ इमामी में कौन-सा धन लुटता था। चादर ऐसी छोटी कि सर ढको तो पैर खुला, पैर ढको तो सर खुला। ऊपर से इस गाँव में अब ख़र्चा चलना वैसे भी मुश्किल हो गया है, जब से प्लास्टिक की फ़ैक्टरी खुली है और उसके अफ़सरों ने बाज़ार आना शुरू किया है, हर चीज़ महँगी हो गई है।

    शकीलउद्दीन अपनी विपदा कैसे कहें? दो माह बाद उनकी गिरी सेहत देखकर जुलैखा को ताज्जुब हुआ। तीनों वक़्त खाना खाकर भी यह धान-पान ही लग रहे हैं। कहीं शहर में किसी को रख तो नहीं लिया जो निगोड़ी सारी ताक़त चूस रही है? इस बार इनके साथ किसी बच्चे को करना पड़ेगा। रात को खाने पर बच्चों ने शकीलउद्दीन को घेर लिया।

    अब्बा! वहाँ तो गेहूँ की नरम-नरम रोटी मिलती होगी न? सुहेला हसरत से पूछती।

    अब्बा, वहाँ गोश्त भी खाने को मिलता होगा? और नई-नई सब्ज़ियाँ भी।

    आपको हमारी याद आती होगी न? बड़ा लड़का बड़े यक़ीन से पूछता।

    मीठा भी भेजते होंगे इस बार हमें ले चलिए अपने साथ। सुहेला अपने प्यारे अब्बा पर वारी जाती।

    हाँ, अब्बा! इस बार आपके साथ हम चलेंगे! दोनों लड़के मचल उठते।

    नहीं नहीं, कोई नहीं जाएगा मेरे साथ। सुनते-सुनते शकीलउद्दीन ने बच्चों को झिड़क दिया।

    ज़रूर कुछ चक्कर है। जुलैखा ने बाजरे की रोटी सेंकते हुए सोचा और कनखियों से मियाँ के चेहरे की परेशानी ताड़ी।

    बच्चों को सही, मुझे तो ले चलिए! जुलैखा की बात सुनकर शकीलउद्दीन के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। मन-ही-मन बोले, 'काश! ऐसा हो सकता। कम-से-कम चटनी-रोटी तो पेट भरकर मिलती।'

    सामान बाँधूँ? मियाँ की ख़ामोशी देख जुलैखा ने कुरेदा।

    वहाँ परेशानी के सिवा कुछ नहीं है...उनके भेजे खाने में दो का पेट तो भर जाएगा, मगर हम पूरे सात हैं। पाँच सो तो... शकीलउद्दीन ने ठंडी साँस भरी और जेब से निकालकर रुपए बीवी के सामने रखे।

    यह तो सिर्फ़ तीन सौ हैं?

    भूख जब बेक़ाबू हो जाती है तो बाहर खाना पड़ता है।

    यानी?

    खाना वक़्त पर कहाँ आता है! बाहर रखो तो चूहे-बिल्ली से नहीं बचता और अंदर रखो तो चींटी...अज़ान से दस मिनट पहले खाना भेजना याद आता है। कभी-कभी वह भी नहीं...दूसरे दिन दो जगहों से इकट्ठा जाता है।

    कुछ कहते नहीं? जुलैखा की आवाज़ काँपी।

    कहो तो...जवाब मिलता है, बच्चों का घर हैं, टाइम का पता नहीं चलता। हज़ार काम हैं। अपनी बारी खाना भेजने की याद नहीं रहती, वग़ैरह-वग़ैरह।

    हाय अल्लाह! जुलैखा की आँखें भर आईं। उसको अपने बेमतलब शक पर पछतावा हो रहा था, माटी मिली मैं क्या ख़ुराफ़ात सोच बैठी थी।

    एक दिन शकीलउद्दीन ने दबी ज़बान से हाजी साहब से अपनी तकलीफ़ बता दी, जिसके जवाब में कुछ बच्चे क़ुरान पढ़ने आने लगे। उससे समय तो कट जाता था मगर आमदनी फिर भी नहीं होती थी। कभी अगले माह देने का वायदा पूरा होता और कभी बीस-पच्चीस रुपए हाथ आते भी तो वह ऊपर के ख़र्च में उड़न-छू हो जाते। शकीलउद्दीन कई दिनों से बेचैन थे। जब से उन्होंने मैदान वाली मस्जिद में बच्चों का मकतब देखा था। जहाँ दीनी तालीम के साथ हफ़्ते में दो-तीन बार घरों में खाने के लिए बुलाए जाते थे, वहाँ कभी इन बच्चों से क़ुरान पढ़वाया जाता, फिर खाना खिलाया जाता था। कभी सिर्फ़ मन्नत पूरी होने की ख़ुशी में दस्तरख़ान लगता था। शकील बेचारगी में अपने दोनों बेटों को मैदान वाली मस्जिद में भेजने की सोचने लगे। आख़िर उन्हें भी तो इसी ख़ानदानी पेशे में आना होगा। नौकरी मिली तो जाएँगे कहाँ? इस बहाने कुछ सीख लेंगे और हाफ़िज़-ए-क़ुरान कहलाएँगे!

    दोनों बेटे फूलपुर से शहर आते हुए बहुत ख़ुश थे। दुपहर में मोहल्ले से आया खाना तीनों ने बाँटकर खाया। खाना देखकर दोनों बेटों का चेहरा उतर गया था। पानी जैसी दाल, आलू मटर की सब्ज़ी और रोटियाँ। कुछ भी ख़ास नहीं था जैसा उन्होंने सोच रहा था।

    उनको आया देख लोगों ने बेगार लादना शुरू कर दिया। सारे दिन लड़के, ज़रा सुनना मियाँ, सारे दिन बैठे रहते हो, आकर खाना ले जाओ। दोनों घर-घर खाना लेने जाने लगे। एक दिन अंदर से आई आवाज़ ने बड़े की आँखों में पानी भर दिया, एक तो था ही रोज़ का झंझट ऊपर से दो मुस्टंडे और लेकर गया मुआ इमाम। इस ज़बान के कहाँ आदी थे लड़के! गाँव में हर कोई अदब से पेश आता था। भले ही पेट में चूहे कूदते हों मगर वहाँ शान थी, पहचान थी। दूसरे ही दिन दोनों वापस जाने की ज़िद करने लगे। यह देखकर शकीलउद्दीन कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि बच्चों को क्या हो गया है?

    म्यूनिसपैलिटी के नल पर बैठकर शकीलउद्दीन अपना कपड़ा धोते, फिर नील लगाकर उसे छप्पर से बँधी अलगनी पर फैला देते थे। चमड़े की चप्पल में पैवंद लगाते-लगाते कोसी मोची परेशान हो उठा था, मगर इमाम साहब से इंकार कैसे करता, सो हर हफ़्ते नए अंदाज़ में चमड़ा घिसकर नया पैवंद लगाने में जुट जाता था। एक दिन तंग आकर कह उठा, इमाम साहब, यदि आप कहें तो बढ़िया चप्पल बना दूँ। ज़्यादा नहीं सिर्फ़ चमड़े का पैसा लूँगा। पूरे पचास रुपए और गारंटी पूरे पचास साल की...सुनकर शकीलउद्दीन हँस पड़े और धीरे से बोले, सोचकर बताऊँगा।

    मस्जिद में पहले की तरह भीड़ जुमे की नमाज़ में नहीं होती थी। धीरे-धीरे दुकानदार अपनी दुकान पर नमाज़ अदा करने लगे थे। कुछ काहिली थी, कुछ ग्राहकों के लौट जाने का भय था। ज़्यादातर अब शकीलउद्दीन अज़ान देकर अकेले नमाज़ पढ़ते नज़र आते थे। कुछ दिनों से दुकानदार चंदा भी देने में आनाकानी कर जाते, जिससे शकीलउद्दीन की तनख़्वाह पाँच सौ से घटने लगी थी। मरे लोगों के लिए क़ुरान पढ़वाना, लड़कियों को नमाज़ सिखाना, यह सब कुछ लगातार चलता और शकीलउद्दीन को लगता कि घर से दूर रहकर उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हो पा रहा है। लड़के भी लौट गए। उनको मस्जिद में रहने की जगह गाँव का स्कूल अधिक अच्छा लगता सो वह दूसरे दिन ही मैदान मस्जिद से रोते हुए भाग आए थे। उनके रोने से घबराकर शकीलउद्दीन उन्हें फूलपुर छोड़ने आए थे।

    अब्बा, आप भी वापस जाइए। रात को बिस्तर लगाते हुए बारह साल की बेटी सुहेला बोली।

    क्यों? शकीलउद्दीन ने उसे ताज्जुब से देखा।

    ठीक तो कह रही है अप्पी। छोटा तनकर बैठ गया। बड़े का चेहरा धुआँ-धुआँ हो उठा।

    अब्बा...यहीं कुछ करते हैं, आपके जाने से घर सूना-सूना लगता है। सुहेला ने भोलेपन से कहा और सिरहाने स्टूल पर पानी का गिलास कटोरी से ढककर नापदान के पास फैले बर्तन धोने बैठ गई।

    आसमान साफ़ था। बेशुमार तारे छिटके थे। इंसानों की उम्मीद की तरह चमचमाते हुए। शकीलउद्दीन का दिल भी लौटने को नहीं चाह रहा था। तन्हाई, भूख, अपमान...उन्हें लौट आना चाहिए। हर घर का नमक इस तरह चखना ठीक नहीं है। मगर दीन-मज़हब के लिए गए हैं वहाँ। लौट आए तो मस्जिद सूनी हो जाएगी, अज़ान बंद हो जाएगी, वह मस्जिद फिर खँडहर बन जाएगी, मगर यहाँ...यहाँ भी तो बाबा की आवाज़ अज़ान नहीं खींच पाती फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है।

    'सुहेला ठीक कहती है, मुझे नहीं जाना चाहिए।' उन्होंने आँखें बंद कर लीं। सुहेला के नन्हे हाथ राख में सने बर्तन रगड़ रहे थे। उसकी आवाज़ के साथ उन्हें नींद गई।

    रात को आँख खुली तो देखा, सुहेला और जुलैखा चिराग़ की रोशनी में बैठी लिफ़ाफ़े बना रही हैं। सुहेला के नन्हे-नन्हे हाथ माँ से अधिक तेज़ी से चल रह थे। कल बुरक़े में छुपकर जुलैखा बनिया को दे आएँगी। उनकी आँखें नम हो गईं।

    'नहीं गया तो वहाँ कोई और जाएगा और सुहेला को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। एक आदमी का खाना बढ़ेगा और ऊपर से पाँच सौ रुपए की आमदनी एकाएक घट जाएगी। तकलीफ़ सहकर भी उन्हें जाना होगा, वहीं रहना होगा।'

    मस्जिद में झाड़ देकर अभी शकीलउद्दीन हाथ धो रहे थे कि ज़ोर से मतली आई। उनका शक यक़ीन में बदल गया। कल रात उन्हें सालन ख़राब लग रहा था, मगर भूख ने उसको रद्द कर दिया था। इधर हफ़्तों से वह देख रहे थे कि बासी बचा खाना कई घरों से रहा है, मगर टोकें किसे? हाजी साहब यह कहकर चुप हो गए थे कि इंसानों के दिल बदल चुके हैं, दूसरे को देकर ख़ुश होने वाले लोग अब कहाँ? शकीलउद्दीन भी समझ गए थे कि उनकी बात यहाँ कौन सुनता है, सो उनसे बार-बार शिकायत करना भी बेकार है।

    औरतों ने मिलकर आपस में यह बात तय की कि अगर इमाम साहब बारी-बारी से हर एक के घर खाना खा जाया करें तो उन्हें भी गर्म खाना मिलेगा और हमें भी वक़्त से उनकी ख़िदमत का मौक़ा मिल जाया करेगा। औरतें, जिनके हाथ में बावर्चीख़ाना है, वही जब फ़ैसला ले लें तो मर्द बेचारे क्या करें! फिर शकीलउद्दीन तो इस मामले में अल्लाह मियाँ की गाय थे। चुपचाप सर झुकाए हर थान पर बँधने के लिए राज़ी हो गए। जब वह किसी के घर रोटी खाने पहुँचते और उसी के साथ बच्चों की चिल्लपों और मारपीट के शोर के बीच जली दाल के संग ठंडी रोटी की सेनी परदे के पीछे से खिसका दी जाती या फिर किसी बच्चे के हाथ भेजी जाती तो तिरछी सेनी कर आधी दाल रास्ते में गिरा देता था। यह देख उनका बदन झनझना उठता। जब वह खाना ख़त्म कर रहे होते तो उस समय सालन या सब्ज़ी की कटोरी इस जुमले के साथ रखी जाती कि हाय अल्लाह, मैं तो भूल ही गई थी और वह बिना खाए उसे लौटा देते और हिचकियों के बीच वह पानी घर आकर पीते क्योंकि अक्सर वह पानी देना भूल जाती थीं।

    'इस ज़िल्लत की रोटी से कहीं बेहतर वह फ़ाक़ा था।' अंदर-अंदर तड़पते वह चुपचाप आकर वीरान घर में चारपाई पर लेट जाते थे। आँखें बंद करते तो सामने जुलैखा का चेहरा उभरता, जो उनके घुटे दिल की गिरह खोलने लगता।

    यहाँ उन पर जो भी गुज़रती हो मगर यह सच था कि इन पाँच-छह महीनों में घर कितना सँवर गया था, सबके सरों में तेल और साबुन से धुला चेहरा, भरे पेट की नाचती चमक आँखों में कौंधती हुई और बाज़ार जाती जुलैखा थैला उठाए बड़ी मसरूफ़ दिखती। बाबा की सेहत भी पहले से बेहतर हो चली थी। उनके दिल से अपमान का मलाल धुल जाता और वह मुस्कुराती आँखों से घर की विभिन्न छवियाँ देखते नींद में डूब जाते थे।

    शकीलउद्दीन को सलीक़े से जिस दिन खाना नसीब हो जाता उस दिन वह अज़ान भी वक़्त से देने मस्जिद पहुँच जाते थे, मगर रोज़-रोज़ के रोटी के रिश्ते ने उनका अजीब हाल बना दिया। कभी उन्हें कोई बच्चा पकड़ा देता कि इमाम साहब, इस शैतान को पकड़िए तो रोटी डालूँ। जब तक रोटी डलती, उतरती, इमाम के कपड़े तर हो जाते। कभी कोई हरे धनिए की गड्डी लेने भेज देती ताकि चटनी पिस सके। गर्ज़ कि इमाम ऊपर के काम करने वाले छोरे की तरह इधर-उधर भागते थे। उनका यह अंदाज़ देखकर रोज़ के फेरी वाले मज़ाक़ में कभी छींटाकशी भी कर देते थे। शकीलउद्दीन भी कौन बूढ़े खूसट थे जो इन बातों का मज़ा लेते, औरत के मामले में तो क़ब्र का मुर्दा भी जी उठता है, सो वह भी हँसते-मुस्कुराते समय काट रहे थे।

    दो दिन पहले फूलपुर से इत्तला आई थी कि सुहेला बीमार है। जब सामान बाँधकर चलने को होते, मीर तक़ी की बीवी ख़ुशामदें करती कि जब तक मीर-तक़ी अमेठी से लौटें, वह अपना जाना टाल दें। अकेली औरत ऊपर से सास निवा की हालत में पड़ी है। हर पल लगता है अब मरी कि तब मरी। इसी दिन के लिए तो यह बूढ़ी मस्जिद फिर से आबाद हुई थी। पहली मौत होने वाली हो और नया इमाम मौक़ा-ए-वारदात से ग़ायब रहे, यह कैसे हो सकता है? शकीलउद्दीन वक़्त की नज़ाकत भाँपकर दिल मसोसकर रह गए। बेटी की बीमारी के ख़याल से लाख दिल तड़पता हो मगर बूढ़ी सास की जल्द मरने की दुआ वह माँग नहीं सकते थे।

    मीर-तक़ी अल्लाह-अल्लाह करके जो अमेठी से लौटे तो बीवी को शकीलउद्दीन की माला जपता देख ठनक गए। माँ भी हाथ-पैर निकालकर ज़िंदा बच गई थी। उनके इधर ठीक होते ही उधर फूलपुर से जुलैखा, सुहेला को लेकर शहर गई। उसका बुख़ार टूटता ही था। शकीलउद्दीन बेटी का कुम्हलाया चेहरा देख उदास हो उठे और ख़ैराती हस्पताल के चक्कर लगाने लगे। मोहल्ले का डॉक्टर था तो ठीक-ठाक मगर बीस रुपए फ़ीस कहाँ से लाते हर बार? पंद्रह दिन की दवा लेकर पाँच दिन बाद जुलैखा बेटी को लेकर फूलपुर लौट गई, पीछे खुला घर ख़ुदा के भरोसे छोड़कर निकली थी। मियाँ की हालत देख उसका दिल रो उठा, कोई इज़्ज़त कोई ठिकाना। उठाए चूल्हे की तरह इस ठौर से उस ठौर घूमना। आँख में आए आँसू पी गई और ऊपर से दिखाया जैसे कुछ देखा ही नहीं।

    शकीलउद्दीन धीरे-धीरे इस पुरानी बस्ती में रचने-बसने लगे। हर घर का दुख उनका अपना होता, हर औरत की परेशानी दूर करना उनका फ़र्ज़ होता। ख़ाली पड़ा मर्द सबके हाँके-पुकारे काम आता, सो सबके मुँह पर नाम चढ़ गया। माँएँ बच्चों से कहतीं, जाओ, शकील मामू से कहना गैस ख़त्म हो गई है, इस नंबर पर फ़ोन कर दें। लाख रिश्तेदार आड़ी-तिरछी आँखें मटकाएँ, शकील मामू कहीं छोटे चचा, कहीं बड़े भाई, कहीं बेटा बन सामान पहुँचाने लाने वाले डाकिया बन गए थे। उनकी इस मददगार तबीयत ने बिना किसी बुनियादी कारण के घर के मर्दों के दिलों में खटास डाल दी थी।

    इस इमाम को आए साल होने को आया मगर मौत हुई, इसकी ज़रूरत पड़ी। मीर-तक़ी ने एक दिन शोशा छोड़ दिया।

    ईद-बकरीद की नमाज़ तो पढ़वाता है। वरना पंद्रह कोस जाओ। सिब्ते बोल पड़ा।

    वह तो सब ठीक है मगर जो काम कैसिट और लाउडस्पीकर से हो सकता है, उसके लिए... मीर तक़ी भुस में चिंगी डाल सदा की तरह दौरे पर चल दिए।

    'अब तो औरतें भी भिनभिनाती नहीं हैं। उल्टे पूरे मोहल्ले के बच्चे बड़े मामू कहकर इमाम शकीलउद्दीन को बुलाते हैं, फिर मीर साहब ने यह बात कही तो किस बिना पर?' रहीम नानबाई ने तंदूर सुलगाते हुए सोचा।

    अज़ान के अलावा हज़ार काम दौड़-दौड़कर करता है, फिर...? शब्बन दिन-भर टोपियाँ ऊपर-नीचे करता सोच में डूबा रहा।

    ज़रूर कोई गहरी बात है वरना मीर साहब जैसा पढ़ा-लिखा, घाट-घाट का पानी पीने वाला आदमी ऐसी हल्की बात नहीं करेगा। शब्बन पंचुरिया गुड़ की भेली से मक्खी उड़ाता हुआ बड़बड़ाया।

    शकीलउद्दीन के अब्बा जब मुर्ग़ियों और बतख़ों की शरारत से बचते-बचाते मस्जिद पहुँचते तो अल्लाह का शुक्र अदा करते थे। कई मिनट चबूतरे पर बैठ साँस दुरुस्त करते फिर वज़ू कर वह अज़ान के लिए खड़े होते। उनके पीछे खड़े गाँव के दस-पंद्रह लोग नमाज़ पढ़कर जाते हुए शकीलउद्दीन की ख़ैरियत पूछना भूलते। उस वक़्त शरीफ़उद्दीन पेश इमाम के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान उभरती, चेहरे की शिकनें जैसे कह रही हों कि शहर का इमाम गाँव जैसा थोड़ी है। देखना, कुछ दिनों बाद मिठाई, मेवे, कपड़े, शॉल, दुशाले, कंबल की खेप की खेप लग जाएगी मेरे घर में। जब बाँटूँगा तो पता चलेगा कि शहर की तैमूरी बड़ी मस्जिद के इमाम की ही पूछ नहीं है बल्कि मेरे बेटे की बड़ी इज़्ज़त है। अख़बार में उनके बेटे शकीलउद्दीन की तस्वीर भी सरकार से गुज़ारिश करते हुए छपेगी, मसलन मुसलमानों को नौकरी चाहिए, बूढ़े इमामों को पेंशन चाहिए, वग़ैरह। उनका ख़्वाब कोई बदज़ात मुर्ग़ी का बच्चा नाली के कीचड़ में नहा डैने फड़फड़ा तोड़ देता और वह मुर्ग़ियों की खुली आज़ादी पर कड़वे जुमले सुनाते हुए घर में दाख़िल होते, जहाँ सुहेला लोटे में पानी लिए खड़ी होती और मीठी आवाज़ में कहती—

    दादा जान, आप बैठिए, मैं इन शैतान मुर्ग़ियों और उनके चूज़ों को ज़रूर आनसबक सिखाऊँगी।

    अब्बा, इसे पीएँ; सीने में गर्मी तो पहुँचे, जुलैखा तुलसी की पत्ती का काढ़ा लेकर पहुँच जाती। उसे पता था कि ससुर की जान ग़नीमत है। वह जब तक रहेंगे, शकीलउद्दीन शहर में रह सकते हैं और पाँच सौ रुपए के पाँच नोट उसके हाथ खुले रख सकते हैं।

    बरसात का महीना, धुआँधार बारिश। शकीलउद्दीन ने छप्पर एक तरफ़ का ठीक किया था, मगर उसने भी टपक-टपककर उनका जीना मोहाल कर दिया था। सारी रात उकड़ूँ बैठकर गुज़ारी थी। पपोटे भारी थे। कल्लू चाय वाले की खाट पर जाकर पसर गए। भट्ठी का धुआँ वहाँ भी उनकी आँखों में मिर्च भरने लगा तो वह आँसू पोंछते हुए उठ बैठे। गर्म चाय सुड़कते हुए अख़बार की ख़बरें सुनने लगे, जो सलीम रोज़ की तरह पढ़कर सुना रहा था—ईरान से आने वाले मेवों के बोरे बड़ी मस्जिद के इमाम के घर आए हैं ताकि ग़रीबों को बाँटे जाएँ...ख़बर एक के बाद एक पढ़ी जाती रहीं और शकीलउद्दीन पहली ख़बर पर अटके रहे कि आख़िर वह भी इमाम हैं, उन्हें यह इज़्ज़त अपने सही, बाहर वाले भी नहीं देते हैं, आख़िर क्यों?

    शकीलउद्दीन टूटे दिल और ज़ख़्मी दिमाग़ लेकर जब मस्जिद पहुँचे तो वह समझ ही नहीं पाए कि सही जगह आए हैं या नहीं। दो रोज़ की मूसलाधार बारिश में खुले में अज़ान क्या देते, सो घर से यह काम अंज़ाम दे रहे थे। आज जो बदली छँटी तो वह मस्जिद की तरफ़ निकले थे। इकलौती दीवार ढह गई थी। उस पर टिका गुंबद का कहीं पता था। टूटे पेड़ और टहनियों के बीच से चढ़ाई का पानी बहकर जमा हो रहा था, जहाँ एक तालाब-सा बन गया था। मस्जिद शहीद हो गई थी।

    भारी दिल से शकीलउद्दीन ने टीन के बक्स में अपना सारा सामान रख लिया। दो बजे वाली बस पकड़ने का इरादा था। सुबह हाजी साहब से मिल आए थे। मस्जिद की ख़बर घंटा भर में सारी बस्ती में फैल गई थी। शम्मू फ़क़ीर की मौत को सब भूल गए थे। शकीलउद्दीन की ज़रूरत भी मस्जिद के ज़मीनदोज़ होने से ख़त्म हो गई थी। औरतों को इमाम का जाना खला था, मगर रोकें उन्हें किस बहाने से? वह सामूहिक नौकर तो बन नहीं सकते थे। साइकिल के पीछे टीन का बक्स रख रहीम नानबाई का लड़का आगे चल रहा था। शकीलउद्दीन सबसे सलाम-दुआ करते आगे बढ़ रहे थे। औरतें घर के दरवाज़े और खिड़की की ओट से उन्हें जाता देख आँचल से आँखें पोंछने लगीं। उनके अंदर भी रुलाई का सोता फूटा, मगर जबड़े दबाकर वह पी गए। बस पर छोड़ने आए लड़के की बड़े मामू आदाब, ख़ुदा हाफ़िज की आवाज़ ने सारे गिले-शिकवे धो दिए।

    टीन का वही पुराना बक्स उठाए शकीलउद्दीन को घर की चौखट पर खड़ा देख शरीफ़उद्दीन का शीशमहल चकनाचूर हो गया। तीन बच्चों की ख़ुशी-भरी किलकारियों के बीच जुलैखा का उदास चेहरा एक सवाल बन गया। बक्स रखते हुए शकीलउद्दीन धीरे से बोले, बरसात की वजह से मस्जिद शहीद हो गई। वहाँ ठहरकर क्या करता?

    बावर्चीख़ाने में सनसी, दसपना की उठा-पटक से शकीलउद्दीन समझ नहीं पाए कि जुलैखा का ग़ुस्सा उन पर है या शहीद हुई मस्जिद पर, फिर भी थके-से उठे और हाथ-मुँह धोकर चाय पीने बैठे। पहले घूँट के साथ अपना मोहल्ला याद आया। चाय के मुख़तलिफ़ स्वाद के साथ सारे घरों के आँगन में मचता कोलाहल जैसे ज़िंदा हो आँखों के सामने आन खड़ा हुआ। हलक़ में कुछ अटकने लगा। रात के खाने पर भी यही हालत हुई। उनके उठते निवाले देखकर सुहेला धीरे से माँ के कान में बोली—

    अम्मी! अब्बा को शायद हमारा पकाया खाना पसंद नहीं आया।

    अपने में उलझे शकीलउद्दीन कई दिन तक अपने को अजनबी और माहौल को बेगाना समझते रहे। किसी खोई चीज़ की तलाश में भटकते हुए बाज़ार की तरफ़ निकल पड़ते। सब्ज़ी, फल, कपड़े, खिलौने, रज़ाई, मशीनों से दुकानें भरी होतीं, जिन्हें देखकर उन्हें याद आता कि रोज़ जाने कितने रुपयों की ख़रीदारी कर वह सामान घरों में पहुँचाते थे। यहाँ अपने घर के लिए वह कोई सामान नहीं ख़रीद सकते हैं। ठन-ठन-गोपाल बने ख़ाली हाथ के साथ उन्हें अपना लौटना बुरा लगता।

    शाम को मस्जिद की छत पर खड़े होकर अक्सर शकीलउद्दीन शहर से आने वाली बस को इस उम्मीद से ताकते कि शायद शहर में कोई जंगल कटा हो, किसी मस्जिद का पता चला हो और उसको बुलाने कोई आया हो। उन्हें क्या पता कि मीर साहब की माँ को जैसे मस्जिद के गिरने और शकीलउद्दीन के जाने का इंतज़ार था, जो साँस रोक, आँख हमेशा के लिए बंद कर रात के आख़िरी पहर सिधार गई। मीर तक़ी भी अमेठी गए थे। पंद्रह कोस पर क़ब्रिस्तान, सो भगदड़ मच गई। रहीम, शब्बन, सिब्ते, सत्तार सभी पड़ोसी ग़मी में पहुँचे। ग़ुस्साल को बुलाने, कफ़न ख़रीदने और नमाज़-ए-जनाज़ा में शिरकत करने की तवालत से बचने के लिए जो सारा खेल रचा गया था, उसका ड्रॉप सीन हो गया, मगर खेल कहाँ बंद होना था। जब मीर-तक़ी की माँ दफ़नाई जा रही थी उस वक़्त शकीलउद्दीन फूलपुर की मस्जिद में अज़ान की तैयारी में लगे थे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 168)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : नासिरा शर्मा
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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