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दीनानाथ की चक्‍की

dinanath ki chak‍ki

अशोक मिश्र

अशोक मिश्र

दीनानाथ की चक्‍की

अशोक मिश्र

और अधिकअशोक मिश्र

    दीनानाथ आज अन्‍य दिनों की तुलना में काफ़ी उत्‍साहित दिख रहा था। उसका कारण भी साफ़ था, सवेरे-सवेरे अख़बार में उसे एक ख़बर पढ़ने को मिली थी कि सरकार हाईस्‍कूल, इंटर तक पढ़े शिक्षित बेरोज़गारों को एक लाख़ रुपए तक का क़र्ज़ देगी, जिसमें पच्‍चीस प्रतिशत की धनराशि चुकता भी नहीं करनी होगी। इस ख़बर को जिस-जिस बेरोज़गार ने पढ़ा, उसी का रक्‍त-संचार बढ़ गया। फिर दीनानाथ तो पिछले काफ़ी दिन से शहर जाने की तैयार कर रहा था। यह ख़बर पढ़कर उसे लगा कि वह गाँव में ही रोज़गार पा जाएगा। फिर उसकी ग़रीबी कुछ हद तक दूर हो सकेगी।

    यूँ दुनियादारी के मामले में दीनानाथ काफ़ी समझदार और परिपक्‍व था। कुछ तो घर की ग़रीबी और उसकी जाति ने उसे दुनियादार बना दिया था। आख़िर बापू की इस ग़रीबी और जाति ने उसे क़दम-क़दम पर ख़ून के आँसू, अपमान, हिक़ारत की दुनिया में जीना है, यही सब कुछ सिखाया था। उसे यह भी अच्‍छी तरह पता था कि सरकार द्वारा निर्मित हर एक जनहित योजना काग़ज़ से चलकर काग़ज़ पर ही ख़त्‍म हो जाती हैं। आख़िर ये कैसी योजनाएँ और विकास के कार्यक्रम होते हैं और किसकी ग़रीबी दूर करते हैं! उसे कई बार बड़े-बूढ़ों का यह कहना काफ़ी ठीक लगता था कि सरकार की हर योजना कुआँ होती है, जिसमें क्‍या–क्‍या समा जाए, कुछ पता ही नहीं?

    फिर भी उसे लगा कि अख़बार में छपी इस सरकारी योजना के संबंध में कुछ विस्‍तार से जानकारी प्राप्‍त करनी चाहिए। जेठ की तपती चिल-चिलाती दोपहरी, जिसमें दूर-दूर तक रास्‍ता भी सुनसान रहता है, कोई पशु-पक्षी तक नहीं दिखता और ही कोई आदमी, ऐसी दोपहरी में वह पसीने से लथ-पथ ग्राम विकास अधिकारी के पास पहुँचता है और उन्‍हें रामजुहार करता है। ग्राम विकास अधिकारी थोड़ा भन्‍नाए-से अंदाज़ में उससे पूछता है कि क्‍या बात है कैसे आए हो? दीनानाथ एकदम चापलूसी वाले अंदाज़ से पूछता है, ‘साहब कौनव शिक्षित बेरोजगारन के ताईं योजना आई है?’

    ‘देखो, भाई, योजना वग़ैरह के संबंध में परसों आकर पता करना। अभी तो मैं तुरंत ही डी.एम. साहब की मीटिंग में जा रहा हूँ।’ इतना कहते हुए ग्राम विकास अधिकारी जीप में बैठे और चले गए।

    मीरपुर में है दीनानाथ का घर। ब्‍लॉक से पाँच किलोमीटर दूर, सरयू नदी के किनारे। वह दलित जाति का ऐसा अभागा युवक है, जिसके जन्‍मते ही उसकी माँ लोक-लाज के डर से गाँव के छोर पर स्थित पोखर किनारे फेंक आई थी। फिर वह एक नि:संतान महतो काका की औलाद के रूप में पला। वैसे गाँव के कई बुज़ुर्गों का कहना था कि दीनानाथ गाँव के बाबू साहब उर्फ़ लंबरदार विक्रम सिंह की नाजायज़ संतान है। बुज़ुर्गों को पता था कि गाँव की सभी युवा बहू-बेटियों को विक्रम सिंह ने ख़राब किया था। कभी कभी, किसी किसी बहू- बेटी को ठाकुर के लठैतों द्वारा अगवा कर लिया जाता और फिर विक्रम सिंह की हवस पूरी करने के बाद, लूटी-पिटी हालत में ग़रीब घरों की बहू-बेटियाँ वापस लौट आतीं। अपनी देह पर अपमान और कोख में अनचाहा बीज लेकर। इसी अवैध संपर्क के प्रभाव से अकसर पैदा होती नाजायज़ संतानें, जिन्‍हें लोक-लाज के भय से कई बार अनब्‍याही माँएँ अपने ही रक्‍त-माँस से सिंचित नवजात शिशुओं को फेंक आतीं पोखर के किनारे। कभी ऐसा भी होता था कि कोई बहू-बेटी यह अपमान बर्दाश्‍त कर पाने की स्थिति में कुएँ, तालाब या नहर में डूबकर ख़ुदकुशी कर लेती थीं।

    महतो परिवार की ग़रीबी में किसी तरह दीनानाथ का बचपन बीता। तमाम अभावों के बीच वह पढ़ा ज़रूर, मगर दसवीं कक्षा पास नहीं कर पाया। उसे कई बार लगता था कि पढ़ने से ज़्यादा ज़रूरी है पेट की आग बुझाने का इंतज़ाम करना। कई रातों में जब भुने आलू खाकर और पानी पीकर उसे लगभग भूखे पेट सोना पड़ा तो लगा कि यह आग तो चूल्‍हे की आग से भी ज़्यादा धधकती है। चूल्‍हे की आग तो पानी डालने पर शांत हो जाती है किंतु पेट की आग तो बिना भरपेट खाए बुझती ही नहीं। दीनानाथ सोचता है कि मीरापुर की आधी आबादी तो उसी के जीवन-स्‍तर जैसी है। मुश्किल से आठ-दस घर ठाकुरों के, पाँच घर पंडितों के और बाकी में कुर्मी, अहीर, जुलाहा होंगे। मगर ऊपर वाले का अन्‍यायी विधान कि गाँव पर हावी है—ठाकुर और पंडित। ठाकुर और पंडित का काटा पानी भी नहीं माँगता, इतने विषधर हैं ये।

    ग्राम विकास अधिकारी के जीप पर बैठकर चले जाने के बाद दीनानाथ फिर उसी दोपहरी में उल्‍टे पाँव गाँव की तरफ़ लौट पड़ा। दीनानाथ सुबह चना-चबेना करके चला था, जबकि इस वक्‍त दोपहर के दो बजे थे। उसे अब पेट में भूख के दर्द की कचोट महसूस हो रही थी। उसे इन सरकारी अफ़सरों पर बड़ा क्रोध आया—जो हैं तो जनता की सेवा के लिए, पर सेवा क्‍या, ये तो उल्‍टे जनता से सेवा करा रहे हैं। इसके अलावा ये सरकारी अफ़सर ठाकुरों और पंडितों का साथ देकर, उस जैसे दलित लोगों का ख़ून चूस रहे हैं। उन्‍हें जोंक या खटमल कहा जाए तो बुरा नहीं। वह मन ही मन सोचता है। इस वीरान रास्‍ते पर दूर तक कोई साया तक नहीं है। रास्‍ते में एक नल देखकर, जो एक प्राथमिक पाठशाला में लगा था, रुककर दीनानाथ अपनी प्‍यास बुझाता है और थकान एवं निराशा- भरे क़दमों से फिर गाँव की ओर चल पड़ता है।

    घर पहुँचता है तो देखता है कि घरवाली पार्वती बरामदे में बैठी उसका इंतज़ार कर रही है। वह सहसा उससे पूछती है, ‘आज तो बड़ी देर लाग गय?’

    ‘का करी! वे कमज़ात सरकारी अफ़सर अब दूसरे दिन बुलाइन हैं। उन्‍हें का मालूम कि यही लू और दुपहरिया मा फिरि दस कोस गोड़ तुड़ावै का पड़ै!’

    दीनानाथ जब तक हाथ-पैर धोता है तब तक पार्वती सूखी रोटियाँ, आलू का भरता, एक टुकड़ा प्‍याज और हरी मिर्च रख देती है। रोटी का कौर रह-रहकर उसके गले में अटक जाता है। दीनानाथ किसी तरह उसे निगलता है और अपनी ग़रीबी को सोचकर भीतर ही भीतर रोता भी जाता है।

    दूसरे दिन दीनानाथ फिर ग्राम विकास अधिकारी के पास जाने के लिए निकला, मगर वे उसे विक्रम सिंह की दालान में ही मिल जाते हैं। वह उनसे दंडवत् प्रणाम करता है।

    ‘सरकार, चक्‍की लगावय की ख़ातिर सोचित हन।’ कहते हुए दीनानाथ मानो और झुक गया है।

    ग्राम विकास अधिकारी ने अपने बैग से फ़ार्म निकाला और उसे दीनानाथ की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, ‘यह रहा फ़ार्म, इसे भरने के बाद ग्राम प्रधान से प्रमाणित कराकर, राशन कार्ड की प्रमाणित फ़ोटो कॉपी और दसवाँ दर्जा पास करने का प्रमाणपत्र, चरित्र-प्रमाणपत्र, जन्‍मतिथि प्रमाण-पत्र के साथ मुझे मिलना। इस फ़ार्म की फ़ीस निकालो, पचास रुपया!’

    दीनानाथ की जेब में जतन से संभाला गया एक सौ का बंधा हुआ नोट था, जिसे बाहर निकालते ही अधिकारी महोदय ने झटक लिया।

    अगले दिन दीनानाथ किसी तरह कॉलेज पहुँचा और अपनी जन्‍मतिथि तथा दसवीं पास होने का प्रमाण-पत्र उसने हासिल कर लिया। सुबह से इंतज़ार करते-करते शाम चार बजे उसका नंबर आया। मगर अभी भी चरित्र प्रमाण-पत्र बाकी था। ख़ैर, कॉलेज के बाबुओं को चाय-पानी कराकर उसने वह प्रमाणपत्र भी हासिल कर ही लिया। घर आते समय वह सोच रहा था कि सरकार भी कितनी अजीब है। आख़िर ऐसे चरित्र प्रमाण-पत्र से क्‍या फ़ायदा जिसे अपराधी भी आसानी से प्राप्‍त कर लेते हैं। घर पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो चला था, मगर फिर भी आज उसके चेहरे पर काफ़ी हद तक काम निपट जाने का संतोष झलक रहा था।

    दूसरे दिन दीनानाथ सवेरे ही चना-चबेना कर सारे काग़ज़-पत्‍तर लेकर अधिकारी महोदय से मिलने ब्‍लॉक के पीछे बने उसके क्‍वार्टर में जा पहुँचता है। दीनानाथ को घर पर आते देख ग्राम विकास अधिकारी की भाव-भांगिमा बदल जाती है। वह बड़ी हिक़ारत की दृष्टि से उसे घूरता है और कहता है—‘महात्‍मा गांधी और दूसरे नेताओं ने तुम दलितों का दिमाग़ सातवें आसमान पर चढ़ा रखा है। मेहनत-मज़दूरी करोगे नहीं और चले हो चक्‍की लगाने अरे भई, सरकारी काम करने का समय होता है। तुम सबने मेरे घर को क्‍या खालाजी का घर समझ रखा है? जब देखो तब बिना टाइम का ध्यान रखे जाते हैं तंग करने। ख़ैर, गए हो तो ज़रा पास के हैंडपंप से तीन-चार बाल्‍टी पानी खींच लाओ।’

    उसे अपनी परिस्थिति पर बड़ा अफ़सोस हुआ। फिर वह सोचने लगा कि यदि किसी तरह क़र्ज़ा मिल गया तो चक्‍की लगाने से कम से कम उसकी ग़रीबी-भुखमरी तो दूर हो जाएगी।

    काफ़ी देर तक बाट जोहने के पश्‍चात् अधिकारी महोदय आए और उन्‍होंने उसके काग़ज़ प्रमाण-पत्र आदि देखे। फिर बोले, ‘तुम बारह बजे तक ग्रामीण बैंक पहुँचो, मैं वहीं रहा हूँ।’

    बैंक पहुँचने के कुछ ही देर पश्‍चात् अधिकारी महोदय भी वहाँ पहुँच गए। जल्‍दी ही वे उसे लेकर ग्रामीण बैंक प्रबंधक के कमरे में खड़े थे।

    ‘तुम्‍हारा ही नाम दीनानाथ है?’ बैंक मैनेजर नू पूछा।

    ‘जी हाँ, साहब!’

    ‘किस काम के लिए क़र्ज़ लेना चाहते हो?’ बैंक मैनेजर ने उससे अगला सवाल किया।

    ‘साहब, चक्‍की लगावय की ख़ातिर, साथ मा तेल पेरय कय मशीन।’

    सामने की दुकान से फ़ोटो खिंचवाकर पासपोर्ट साइज की तीन कॉपी और उस दुकान, जहाँ से मशीन ख़रीदनी हो, कोटेशन बनवाकर लाने के लिए कहा गया दीनानाथ को। इसके अलावा ब्‍लॉक के दूसरे बैंकों से नो डयूज (कोई क़र्ज़ बाकी नहीं) का प्रमाण-पत्र भी।

    दीनानाथ सोचता है कि सरकार भी कितने विचित्र, किंतु सत्‍य नियम बनाए हैं। बैंक के भीतर पहली बार प्रवेश करने वाला व्‍यक्ति इलाक़े के हर बैंक से लिखाकर लाए कि उस पर कोई क़र्ज़ बाकी तो नहीं है! बैंक वाले ऐसे में हिक़ारत से कहेंगे ही कि आज नहीं, कल आना। उसे लगा कि सरकार ख़ूब अपमानित करके ही लोगों को क़र्ज़ देती है। ऊपर से क़र्ज़ लेते वक्‍त दो, लोगों को ‘गिरांटर’ बनाओ। वे मानें तो उनकी अलग से सेवा करो। वाह रे सरकारी नियम!

    किसी तरह जब उसने ‘नो ड्यूज’ प्रमाण-पत्र ब्‍लॉक के सभी बैंकों से प्राप्‍त कर लिया, तो प्रश्‍न आया उसकी पहचान यानी आइडेंटीफिकेशन का कि यही दीनानाथ वह दीनानाथ है जो क़र्ज़ ले रहा है। ख़ैर, प्रमाणीकरण का यह काम ग्राम विकास अधिकारी ने किया। साथ ही क़र्ज़ के लिए जानकारी वाला फ़ार्म भी उसने भरा, जिसमें नाम, जाति, पता, कुल रकबा, वार्षिक आय, परिवार की सदस्‍य संख्‍या, परिवार नियोजन अपनाया या नहीं, दो ‘गिरांटर’ का नाम और अंत में शपथ-पत्र कि ‘मैं बैंक का यह क़र्ज़ा समय पर सूद सहित लौटाऊँगा, इसका दुरूपयोग नहीं करूँगा, अगर दुरूपयोग करता पाया जाऊँ तो बैंक को अधिकार है कि वह कार्यवाही के जरिए मेरी ज़मीन और चक्‍की आदि कुर्क कर ले।’ यह फ़ार्म ग्राम विकास अधिकारी स्‍वयं भर रहे थे। फिर उन्‍होंने इशारा किया कि भाई, बैंक वालों के लिए चाय-समोसा, पान-सिगरेट का तो कुछ इंतज़ाम करो, साहब लोग तुम्‍हारा ही काम कर रहे हैं।

    दीनानाथ बाहर की दुकान पर बैंक कर्मचारियों और ग्राम विकास अधिकारी की संख्‍या गिनकर चाय-समोसे का आर्डर दे आया। वह मन ही मन सोच रहा था कि अभी क़र्ज़ मिला नहीं और लूट कितनी पहले ही शुरू हो गई। कुछ देर बाद जब ‘गिरांटर’ के रूप में उसे दो ग्रामवासी गए तो बैंक मैनेजर ने उनके दस्‍तख़त करा लिए। फिर दीनानाथ को बुलाकर कहा, ‘देखो, तुम्‍हारी बैंक की जो भी कार्यवाहियाँ हैं, वे सब निपट गई हैं, अब तुम फ़ार्म पर अंगूठा लगाओ।’

    अरे नहीं, साहेब, हम दस्‍तख़त कय लेईत है।’ और उसने मैनेजर के कहे अनुसार काग़ज़ों पर कम से कम बारह स्‍थानों पर दस्‍तख़त कर दिए।

    ‘बैंक के बाहर पाँडेयजी की जो पान की दुकान है, वहाँ पर मशीनरी स्‍टोर वाले जायसवालजी बैठे होंगे, यहाँ बुला लाओ। तुम्‍हारा कोटेशन अभी बन जाएगा। जायसवालजी की मशीनरी की एजेंसी है। तुम्‍हें शहर में कहीं धक्‍के नहीं खाने पड़ेंगे इस काम के लिए।’

    मामूस दीनानाथ मैनेजर की चालाकी और धूर्तता से दूर उनके रचे चक्रव्यूह में शामिल हो गया।

    दीनानाथ ने बाहर आकर जायसवालजी का पता किया और उन्‍होंने कुछ ही मिनटों में कोटेशन तैयार कर दीनानाथ के हाथों में पकड़ा दिया जिसे उसने ले जाकर बैंक प्रबंधक को सौंप दिया। प्रबंधक ने दीनानाथ को सोमवार के दिन आने को कहा।

    दीनानाथ को लग रहा था कि अब तो सरकारी क़र्ज़ मिला समझो। बस, बिजली का कनेक्‍शन मिलने का काम रह गया।

    अगले दिन वह पावर कनेक्‍शन के लिए ख़सरा-खतौनी, राशन कार्ड और सब अन्‍य काग़ज़ात लेकर विद्युत उपकेंद्र पहुँचा। जब उसका नंबर आया तो उसने लाइन इंस्‍पेक्‍टर ओझाजी से मुलाक़ात की। उन्‍होंने उसकी अर्ज़ी ले ली और एक लाइनमैन को बुलाकर पूछा कि इसके घर तक बिजली कनेक्‍शन के लिए कितने खंभे लगाने पड़ेंगे? लाइनमैन ने हिसाब जोड़कर बताया कि पाँच खंभे लगाने होंगे।

    लाइन इंस्‍पेक्‍टर ने तत्‍काल दीनानाथ से कहा कि बिजली कनेक्‍शन की निर्धारित रक़म सरकारी कोषागार में जमा कराओ और उसकी रसीद संलग्‍न करो तथा ऊपर से दो हज़ार रुपए ख़र्च करोगे, तब पावर कनेक्‍शन मिल सकेगा। पावर कनेक्‍शन दिए जाने पर फ़िलहाल रोक है।

    ‘ठीक है, साहेब!’ कहकर दीनानाथ बिजली दफ़्तर से लौट पड़ा। वह मन ही मन हिसाब लगा रहा था कि दो हज़ार घूस और एक हज़ार कनेक्‍शन शुल्‍क का प्रबंध कैसे किया जाए?

    अगले सोमवार को दीनानाथ बैंक जाता है तो मैनेजर साहब उसे बुलाकर क़र्ज़ के चैक की रसीद पर दस्‍तख़त कराकर चैक अपने पास रख लेते हैं, कहते हैं, ‘कल मंत्रीजी रहे हैं, वही बांटेगे।’

    अगले दिन आयोजित सरकारी ऋण मेले में दीनानाथ को क़र्ज़ का चैक मिलता है तो वह फूला नहीं समाता। सैकड़ों किसानों, बेरोज़गारों को ऋण देकर प्रदेश के मंत्री कार में बैठकर फुर्र से उड़ जाते हैं।

    अब कुछ पाठकों को जिज्ञासा होगी कि दीनानाथ को बिजली कनेक्‍शन मिला या नहीं, उसकी चक्‍की लगी या नहीं?

    तो पाठकों! दीनानाथ पाँच महा तक दौड़ता रहा। इसके बावजूद वह बिजली का कनेक्‍शन नहीं लगवा पाया। मशीनरी स्‍टोर वाले ने उसे आधा सामान देकर पूरे सामान के दाम पर दस्‍तख़त करा लिए और कहा कि बाकी सामान बाद में आकर ले जाना।

    क़र्ज़ लेने के बाद जब छठा महीना शुरू हो गया, तो नियमित रूप से क़िस्‍तें जमा कराने के लिए बैंक का नोटिस गया।

    दीनानाथ को काफ़ी बाद में यह पता चला कि ग्राम विकास अधिकारी, बैंक मैनेजर का रिश्‍तेदार था, उसने बेरोज़गारों को महंगा सामान दिलवाकर ख़ूब ठगा। सामान भी एकदम घटिया था। एक और बेरोज़गार, जो उससे थोड़ा ज़्यादा इंटर तक पढ़ा था, उसने उसे बताया कि बैंक मैनेजर का दस परसेंट, ग्राम विकास अधिकारी का पाँच परसेंट, मशीनरी वाले जायसवाल का दस परसेंट सब पहले से तय है...!

    पाठको, क़र्ज़ लेने के बाद जब दीनानाथ की चक्‍की यथार्थ में आटा पीस सकी तो निराश होकर वह घर छोड़कर भाग गया। अब क़र्ज़-वसूली के लिए बैंक दीनानाथ को तलाश रहा है। इसके कुछ दिनों के पश्‍चात् देश के प्रधानमंत्री का मुस्‍कराता हुआ चेहरा और वक्‍तव्‍य छपा था—‘देश के दस लाख शिक्षित बेरोज़गारों को स्वत: रोज़गार प्रदान किया गया है!’

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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