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बाल भगवान

baal bhagvan

स्वदेश दीपक

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बाल भगवान

स्वदेश दीपक

और अधिकस्वदेश दीपक

    लड़का पेड़ के नीचे बैठा है कि धूप से बच जाए। लेकिन पेड़ की टहनियाँ बिल्कुल नंगी, पत्ते, और ही कोंपलें। हालाँकि मौसम बरसात का था और बरसात इस साल भी नहीं हुई, जैसे पिछले साल भी नहीं हुई थी। लंबी टहनियों के साये भी थोड़ी दूर तक पड़ रहे थे, मोटी-मोटी लकीरों की शक्ल में। लेकिन लड़का तो पेड़ के तने के साथ पीठ लगाकर बैठा है। गर्म पेड़ उसकी नंगी पीठ को सेंक रहा है, जला देने की हद तक। ज़मीन गर्म, पेड़ गर्म। लड़का खिसककर तने की दूसरी ओर हो जाता है। धूप की जंगली बिल्ली पैंतरा बदलती है और छलाँग लगाकर उसके चेहरे पर जा चढ़ती है। तेज़, तीखे और चमकीले पंजे उसके कंधों पर गड़ जाते हैं। लड़का समझ गया कि फिर से दूसरी तरफ़ खिसकना बेकार है, धूप से बचा जा सकता है, जीता जा सकता है, लड़का आँखें उठाता है। यह पेड़ के तनों से काली लकीर क्या निकल रही है? काली स्याही है? उसने गाँव के दूसरे बच्चों के हाथों में काली स्याही की दवातें देखी हैं, क्या हुआ अगर वह स्कूल नहीं जाता। उसके ज़िद करने पर दूसरे बच्चे कई बार स्याही की दवातें खोलकर उसे दिखाते हैं। वह सवालिया निगाहों से देखता है तो बच्चे उसे बताते हैं—स्याही! लिखते हैं! बच्चों को भी पता है कि लड़का दो-तीन शब्दों के वाक्य समझ लेता है। लंबे फिकरे उसके दिमाग़ को उलझा देते हैं।

    लड़के का सिर जितना बड़ा है दिमाग़ उतना ही छोटा है। वह जन्म से ही ऐसा है। आयु बढ़ी, शरीर बढ़ा, लेकिन दिमाग़ एक छोटे-से ताले की तरह हमेशा से बंद है। वह पागल नहीं, सीधा भी नहीं, इधर की भाषा में सिद्धड़ है। सयाने दिमाग़ और पागल दिमाग़ के बीच के दिमाग़ वाला! लोग उसे बुलाते भी सिद्धड़ नाम से ही हैं। वह आँखों को हाथों से मलता है, क्योंकि धूप की बिल्ली के अंदर की तरफ़ मुड़े तीखे नाख़ून अब उसकी आँखों में चुभ रहे हैं। पेड़ के तने से काली लकीर अब भी बाहर बह रही है, ज़मीन तक पहुँच गई है। स्याही नहीं। लड़का बुदबुदाता है। ज़मीन पर देखता है। काली लकीर छोटे-छोटे काले टुकड़ों में बँट गई है। लंबी पतली काली टाँगें और मोटा सिर। लड़के का बंद दिमाग़ ज़ोर-ज़ोर से शब्द-संकेत दे रहा है। वह सिर हिला-हिलाकर शब्द को होंठों में पकड़ने की कोशिश कर रहा है। वह बुदबुदाता है—मकौड़े...और हँस पड़ता है। दिमाग़ अपना काम पूरा करने के बाद हिलना बंद हो जाता है। उसका सिर भी थम जाता है।

    वह ज़मीन पर गिरी सूखी टहनी का टुकड़ा उठाता है और एक मकौड़े की पतली कमर को इसके सिरे से दबा देता है। उसके टहनी परे करते ही मकौड़ा उल्टा हो जाता हैं और उसके महीन धागे जैसे हाथ-पैर हवा में छटपटाने लगते हैं। लड़का ख़ून निकलने-देखने का इंतज़ार कर रहा है। उसने कई बार आस-पड़ोस में मुर्ग़े कटते देखे हैं। सिर छटकने के बाद ख़ून के छींटे उछला करते हैं। वह बुदबुदाता है, मुर्ग़ा नहीं, मकौड़ा, ख़ून नहीं। पीछे रहे मकौड़े अपने घायल साथी के पास थमते हैं। धागे जैसे नाक के बाल से उसे सूँघते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। उल्टे-गिरे मकौड़े की महीन टाँगें या हाथ अब भी हवा में हिल रहे हैं, लेकिन इनके हिलने की गति पहले से कम है। लड़का फिर से टहनी का टुकड़ा उठाता है। पतली कमर पर दबाता है और मकौड़ा दो टुकड़ों में कट-बँट जाता है, दोनों कटे-बँटे हिस्से काँपते हैं, फिर हिलना बंद हो जाते हैं। ज़मीन पर एक तिल-भर छोटा काला धब्बा दिखता है। लड़के के बंद दिमाग़ का दरवाज़ा थोड़ा-सा खुलता है और दो शब्द बाहर धकेलता है—काला ख़ून!

    अब लड़के की सीमित कल्पना से एक छिपकली बाहर निकली है; चाकू की तरह पतली नुकीली, तेज़ और ललचाई जीभ! जीभ के चाकू का लपकना, दीवार पर चलते कीड़े पर इस चाकू को घोंपना और फिर इस जीभ-चाकू से कीड़ा निगल जाना! लड़के की कल्पना एक और दृश्य उसे दिखाती है। पहली छिपकली का गला मोटा होता है, फिर वह कीड़े को पेट की तरफ़ धकेलती है। चाकू लपकते रहते हैं और धीरे-धीरे पेट मोटा होता जाता है, जैसे हर साल उसकी माँ का पेट मोटा हो जाता है। वह फिर से सिर हिलाना शुरू कर देता है। छिपकली के मोटे पेट और माँ के मोटे पेट के दृश्यों की बात उसको समझ नहीं रही। इतनी बात तो उसका ताला बंद दिमाग़ समझता है कि छिपकली और माँ दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं।

    वह अपने पेट पर हाथ फेर रहा है। रोटी! नहीं खाई! कब से? दिमाग़ बताता नहीं। उसके हिस्से की एक रोटी माँ दूसरे बच्चों को दे दिया करती है। वह माँ की ओर देखता रहता है। माँ हमेशा एक ही वाक्य कहा करती है—मर! रोटी नहीं है। हे भगवान! इस सिद्धड़ को सम्हाल ले! कभी-कभी वह उसे एक रोटी देती ज़रूर है। उसके भाई-बहन किसी छिपकली की तरह दाँव लगाकर उसकी रोटी को देखते रहते हैं। माँ की आँखें पल-भर कहीं मुड़ी नहीं, कि छिपकली की तरह तेज़ अचानक मला और उसकी रोटी ग़ायब!

    अब लड़के के दिलो-दिमाग़ पर छिपकली का क़ब्ज़ा हो गया है। चाकू-जीभ लगातार उसके दिमाग़ में कौंध रही है। वह पेट पर हाथ फेरता है। रोटी! कब से नहीं! अंदर बैठी छिपकली उसे बताती है कि उल्टे लेट जाओ! वह ज़मीन पर पेट के बल लेटा है। बिना हिले-डुले, शरीर समेटे, छिपकली की तरह दाँव लगाए। उसकी जीभ बाहर लपकती है। नोक से दो हिस्सों में कटे-बँटे कीड़े को उठाती हैं और मुँह के अंदर कर लेती है। वह मुँह बंद कर लेता है। कीड़े के टुकड़े जीभ पर हैं। अचानक भूखा पेट हाथ फैलाता है और जीभ पर रखे मकौड़े के टुकड़े अंदर खींच लेता है। बंद दिमाग़ हल्ला किए जा रहा है—और, और! भूखा पेट लगातार जीभ की तरफ़ हाथ फैला रहा है—और, और! लड़के का हाथ एक मशीनी हरकत से टहनी का लटुकड़ा पकड़ लेता है। वह मकौड़ों की सरकती कतार के पास खिसक गया है। वह फटाफट सूखी टहनी का वार कर रहा है। मकौड़े चोट लगते ही उल्टे होकर हाथ-पैर पटक रहे हैं। उसकी जीभ लपलपा रही है और भूखे पेट से निकले हाथ झटपट जीभ पर रखे मकौड़ों को अंदर खींचे जा रहे हैं।

    गड़गड़ की आवाज़ उसके कान तो सुनते हैं, लेकिन छिपकली में बदल गया उसका मन-मस्तिष्क इसे ग्रहण नहीं करता। आवाज़ उसके बिल्कुल क़रीब पहुँचती है और हल्की-सी ठक-ठक के साथ बंद हो जाती है। वह आँखें ऊपर उठाता है। बंद दिमाग़ शब्द बाहर फेंकता है—ट्रैक्टर! वह फिर अपनी जीभ ज़मीन के पास ले आता है और छिपकली में बदल जाता है। ट्रैक्टर पर बैठा आदमी नीचे कूदता है। उसकी गर्दन को पंजे से जकड़कर उसे एक ही झटके में खड़ा कर देता है—फिट्टे मुँह! बाम्ण का बेटा और मकौड़े खा रहा है। दुर फिट्टे मुँह! उस आदमी का थप्पड़ मारने के लिए उठा हाथ हवा में ही थम गया है। ब्राह्मण पर हाथ उठाना इधर के इलाक़े में अब भी पाप समझा जाता है। फिर अभी-अभी यह आदमी अपनी घरवाली को पाँचवीं बार हस्पताल पहुँचाकर आया है। पिछली चार बारियों में चार बेटियाँ हुई हैं। उसकी माँ का पक्का ख़याल है कि इस बार भी लड़की ही होगी। बहू के लच्छन यही बताते हैं! सारा दिन लेटी रहती है। सुस्त और भरी हुई। लड़का होना हो तो औरतें भागती फिरती हैं।

    वह आदमी छोटी-सी पोटली खोलता है, एक पराँठा उठाता है और लड़के की ओर बढ़ा देता है। रोटी साथ हस्पताल ले गया था। शायद रात रहना पड़े। लेकिन डॉक्टर कहती है, बच्चा कल होगा। लड़का उस आदमी का हवा में उठा हाथ देख रहा है, गर्दन पर पड़ी उसकी उँगलियों का तीखा सेंक अब भी महसूस कर रहा है। सिर दाएँ-बाएँ हिलाता है, नहीं खाऊँगा की मुद्रा में।

    ओये कंजर दे फल! रोटी नहीं खाँणी तो और क्या लड्डू खाएगा?

    लड़का गाँव के हलवाई की दुकान के आगे से दिन में कई बार गुज़रता है। गोल-गोल मिठाई के भरे हुए थाल रोज़ देखता है। लोगों को कहते सुन चुका है—लाला, लड्डू दे एक किलो! बच्चों को चार आने आगे बढ़ाकर कहते सुन चुका है—लाला, एक लड्डू! उसके दिमाग़ में लड्डू एक छोटा-सा घर बना चुके हैं क्योंकि उसने आज तक लड्डू नहीं खाए। सिर ऊपर-नीचे हिलाता है, हाँ की मुद्रा में। उस आदमी को फिर ग़ुस्सा चढ़ जाता है।

    ओये हराम के बीज, मेरे लड़का हुआ है जो लड्डू माँग रहा है? दूँ एक लप्पड़?

    लड़के के दिमाग़ से लड्डू खिसककर अब तक उसकी जीभ पर चुका है। मुँह खोलता है।

    लड़का! लड्डू!

    फिर से बोल।

    लड़का! लड्डू! लड़का! लड्डू! लड़का, लड्डू..., वह यह दो शब्द लगातार ऐसे बोल रहा है जैसे लड़के स्कूल में पहाड़े रटकर बोलते हैं, बिना सोचे, बिना समझे।

    शायद माँ ने एक बार कहा था कि साधुओं और पागलों की जीभ पर भगवान का वास होता है। ग़ुस्से में जो भी बोल दें, सच होता है। लड़का पूरा पागल तो नहीं, सिद्धड़ तो है। फिर ब्राह्मण का बच्चा है। शायद इसकी जीभ पर सच जढ़ आया हो। हारे हुए आदमी को अंधविश्वास सच दिखने लगता है, सुनने लगता है।

    लड़का! लड्डू! लड़का लड्डू! लड़का लड्डू... रट जारी है। वह उसे उठाकर ट्रैक्टर पर बिठाता है। चार लड्डू खिलाने में कौन-सा ख़ज़ाना लग जाएगा। शायद इसकी बात सच निकल आए। बीस क़िल्ले अपनी ज़मीन और चार लड़किया! सारी साले जवाँई ले जाएँगे। चिता में आग देने के लिए एक लड़का भी नहीं। पक्का मकान है, साले जवाँई रहेंगे, मौज़ मारेंगे, ख़ानदान का नाम आगे बढ़ाने के लिए एक लड़का भी नहीं। शायद इस सिद्धड़ की बात सच निकल आए! वह ट्रैक्टर हलवाई की दुकान के आगे पीपल के पेड़ के नीचे रोकता है। तीन-चार चारपाइयों पर अधलेटे लोग उठ बैठते हैं। बारिश अभी पड़ी नहीं। खेतों में कोई काम नहीं, इसलिए लोगों की दुपहर अक्सर यहाँ कटती है। फिर दुनिया-भर की बातों का पता हलवाई से लगता रहता है। उसकी दुकान जी. टी. रोड के एकदम किनारे है। कार वाले कई बार पानी पीने के लिए रुकते हैं। चाय भी पी लेते हैं, उनकी बातें हलवाई सुनता रहता है। फिर जितनी अक़्ल कार वालों को होती है, क्या पैदल लोगों को हो सकती है? हलवाई दुकान पर बैठे-बैठे पूछता है—

    लौट आए? क्या हुआ? उसे पता है, चौधरी बीवी को लेकर सुबह हस्पताल गया था।

    चार लड्डू दे!

    ओये, लड़का हो गया क्या! जाट और कंजूस? बोतल मँगवा बोतल!

    बक-बक करे ही जाओगे कि दूँ हाथ! तेरी माँ को अभी कुछ नहीं हुआ। डॉक्टर कहती है कल होगा। सिद्धड़ को चार लड्डू दे। लड़का भुखा है।

    लड़का ट्रैक्टर पर बैठे-बैठे रट लगाना शुरू कर देता है, लड़का! लड्डू! लड़का! लड्डू...! लाला काग़ज़ पर चार लड्डू रखकर दुकान से नीचे उतरकर पीपल के पास जाता है। चौधरी के साथ गाँव के स्कूल में आठ जमातें पढ़ा है, दोस्त है, इसलिए तू-तड़ाक में बोलता है, काग़ज़ पर रखे लड्डू लड़के की ओर बढ़ाकर कहता है—

    रत्ने, तू घास तो नहीं खा गया। सिद्धड़ ने कहा और तू मान गया कि लड़का होगा। वह साला हिमालय से आया है जो सच बोलेगा।

    लाले का वाक्य पूरा होते-होते लड़का चारों लड्डू खा गया है। रत्ने बाक़ी लोगों को बता रहा है कि लड़का कैसे मकौड़े खा रहा था। लड़के के पड़ोस में रह रहा आदमी बताता है कि घरवाले सिद्धड़ को खाने के लिए नहीं देते! घरों के बाहर फेंकी जूठन खाता है—गली के कुत्तों की तरह, दूसरा आदमी एतराज उठाता है कि इतना बुरा हाल तो इसके घर का नहीं। गाँव में जन्म-मरण, शादी-ब्याह होते रहते हैं। पंडित के पास ज़मीन नहीं, सही, कमाई तो होती ही रहती है। तीसरी आवाज़ बताती है कि पंडित की कमाई तो सीधी ठेके की दुकान पर पहुँचती है, घर नहीं। कोई मरे तो बोतल, कोई जन्मे तो बोतल। साला शराबी ब्राह्मण है, शराबी! स्कूल के मास्टर जी हमेशा ऊँची आवाज़ में बोलते हैं, जैसे क्लास में बैठे हों।

    अरे, क्या बड़-बड़ किए जा रहे हो। इधर का ब्राह्मण नहीं, पाकिस्तान वाले पंजाब से आकर यहाँ बसा है। एक दिन मैंने समझाया था कि रोज़ बोतल चढ़ाया करे तो जानते हो क्या बोला था? ब्राह्मण का पृत, कोई जिन्न कोई भूत; कोई बिरला सपूत! लाला मज़े ले रहा है, मास्टरजी को छेड़ता है।

    साला बाम्ण कविता करता है। मास्टरजी इसे फ़िल्मों में भेज दो। मनोज कुमार की फ़िल्म में फिट बैठेगा, फिर लाले ने दोनों हाथ ऊपर उठाकर तान कसी, मेरे देश की धरती...!

    लड़का वहाँ से खिसककर दुकान के पास, ठीक लड्डू के थाल के पास जा ठहरा है, रट लगाता है, लड़का! लड्डू! लड़का! लड्डू...!

    रत्न चौधरी लाले को उसे और लड्डू देने के लिए कहता है, मास्टरजी रत्न से पूछते हैं कि क्या हस्पताल में देखभाल के लिए किसी को छोड़ आया है? रत्न बताता है कि माँ भी वहीं है।

    तेरा दिमाग़ तो नहीं फिर गया रत्ने! अरे, कोई मर्द भी है या नहीं? कोई ज़रूरत पड़ गई तो!'' रत्न उन्हें बताता है कि उसके खेतों में काम करने वाला 'भैया' भी वहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार से जो ग़रीब मज़दूर इधर काम करने आते हैं, उन सबको 'भैया' कहकर बुलाया जाता है।

    लाला काग़ज़ पर चार लड्डू रखकर हाथ आगे बढ़ाता है। लड़के का हाथ काग़ज़ पकड़ने के लिए आगे बढ़ता है तो शरारती लाला अपना हाथ पीछे खींच लेता है। लड़का ज़ोर से चीख़ता है, लड़का! लड्डू...!

    रत्न डाँटता है, ओये हराम के तुख़्म। क्यों तंग करता है बाप को?

    मैं तो दे रहा हूँ, यह सिद्धड़ पकड़ता ही नहीं, यह सिद्धड़ पकड़ता ही नहीं, लाला लड्डू आगे करता है, लड़के के दोनों हाथ लपकते हैं, लाला लड्डू वाला काग़ज़ अपनी पीठ पीछे कर लेता है। लड़के के पेट में बैठा भूख का दानव छलाँग लगाकर बाहर निकलता है, झपटकर मिठाई काटने वाला लंबा चाकू उठा लेता है और छलाँग मारकर दुकान पर चढ़ जाता है। 'बचाओ' की लंबी चीख़ के साथ लाला नीचे कूदता है और पीपल के पेड़ के नीचे भाग आता है। लोग खड़े हो गए हैं। लड़का दोनों हाथों में लंबा चाकू उठाए उधर रहा है। धूप में लिश्कारे मारता चाकू। रत्न लड़के की दोनों बाँहें कसकर पकड़ लेता है, फिर उसके हाथों से चाकू छुड़ाकर परे फेंकता है। उसे दुकान के पास ले जाता है, काग़ज़ पर लड्डू रखकर उसके सामने धर देता है। लड़का खाना शुरू कर देता है। लाला अब भी डर से थरथरा रहा है। कल्पना सच से हमेशा एक क़दम आगे चलती है। वह यह सोचकर काँपे जा रहा है कि अगर इतना लंबा चाकू उसके शरीर में...! मास्टरजी उसे समझा रहे हैं।

    देख लाले! तुझे कितनी बार समझाया है कि हर वक़्त शरारतें किया कर! कभी कोई तेरी ऐसी-तैसी कर देगा। रत्न पकड़ता तो आज सिद्धड़ ने तेरा हिसाब कर देना था। कम-से-कम ब्राह्मणों को छेड़ा कर। सुना नहीं। ब्राह्मण के हाथ में छुरा, वह कसाई से भी बुरा।

    लड़का अब अपने आप थाल में से लड्डू उठाकर खाए जा रहा है। लाले की रोनी सूरत देखकर रत्न उसे हौसला देता है कि वह सारे पैसे चुका देगा।

    मास्टरजी, बारिश नहीं हो रही। जीरी बीजने का मौसम तो बीता जा रहा है।

    हाँ भाई! चावल तो पानी-ही-पानी माँगता है। बीजो तो पानी। पकाओ तो पानी। खाओ तो पानी।

    लड़का पीपल के पास लौट आया है। चिपका पेट उभर आया है। उसकी आँखें मुँदी जा रही हैं। चारपाई पर बैठे लोग उसके लेटने के लिए जगह छोड़ते हैं। थोड़ी दर पहले का विकराल लड़का, उन्हें अभी तक भय है। लड़का लेट गया है। पेट पर हाथ फेर रहा है। लाला अपनी हरकत से बाज नहीं आता—

    साले का पेट तो देखो। कीड़े खाए छिपकली के पेट की तरह फूल गया है। लड़का उसकी बातों से बेख़बर अब तक सो चुका है। तभी मास्टरजी की निगाह सड़क पर जाती है। कोई आदमी बड़ी तेज़-तेज़ साइकिल चलाता हुआ इधर ही रहा है। उसकी पगड़ी की पूँछ हवा में फड़फड़ा रही है। अब साइकिल सड़क से नीचे उतर आई है, पीपल की ओर अंधड़ गति से दौड़ती हुई। सब लोग खड़े हो गए हैं। भैया है। हस्पताल से रहा है। ज़रूर कोई बुरी ख़बर है। तभी अंधाधुंध साइकिल दौड़ा रहा है। भैया साइकिल को ब्रेक मारकर रोकता है। एकदम गति टूटने पर साइकिल उल्टी कि उल्टी। लेकिन रत्न झपाटे से साइकिल का हैंडल अपने पंजे में कम लेता है। भैया नीचे ज़मीन पर लेट गया है। मुँह फाड़कर साँसें ले रहा है।

    क्या हुआ, रत्न पूछता है। भैया मुँह खोलता है लेकिन चमड़े की तरह सूख गई जीभ हिलती तक नहीं। लाला भागकर पानी का गिलास लाता है, भैया के सिर के नीचे हाथ रखकर ऊपर करता है, उसे पानी पिलाता है। सूखे चमड़े की-सी ज़बान तर होती है, शब्द फूटता है, लड़का!

    रत्न चीख़कर कहता है, ओये माँ दे यार! पूरा बक। क्या हुआ?

    चौधरी साहब, लड़का हुआ है, लड़का। बीबी जी बिल्कुल ठीक हैं। माता जी ने आपको हस्पताल बुलाया है।

    जी ओये मेरे शेर! तेरे मुँह में घी-शक्कर। और रत्न अपनी मज़बूत बाँहों में भैया को हवा में उठाता है, अपने कंधों पर बिठा लेता है। लाला नारा मारता है, जै माता शेराँवाली दी और नाचना शुरू कर देता है। वह मुँह से ढोलकी की आवाज़ें निकाल रहा है; ठड़क-ठड़क। एक आवाज़, सबको मिठाई खिलाओ रत्ने! लाला मुँह ढोलक बजाना बंद करके गरजता है, मिठाई की माँ की! बोतल पीएँगे, बोतल। रत्न उसे प्यार से डपटता है।

    ओये लाले दे पुत्तर! एक बोतल क्या सारे ठेका ख़रीद ले। आज सारे गाँव वालों को पिलाऊँगा। लड़का हुआ, हाँ लड़का! रत्न का क़द एकदम कुछ इंच बढ़ गया है।

    यार रत्ने! सिद्धड़ की बात सच निकली। लाला की बात को बीच में काटकर मास्टरजी डपटते हैं।

    ओये आकाशवाणी। तेरे मुँह में कीड़े पड़ेंगे, कीड़े! ख़बरदार अगर कभी सिद्धड़ कहा, बाल भगवान है, बाल भगवान!

    मास्टरजी ने लाले का नाम आकाशवाणी रखा हुआ है, सारी सच्ची-झूठी ख़बरों का केंद्र हमेशा वह और उसकी दुकान होती है।

    उस शाम रत्न ने सिद्धड़ के बाप की ऐसी-तैसी कर दी। लोग जब लड़के को कंधे पर उठाकर वहाँ लाए थे तो अंदर बैठे बाप और माँ के दिल में यह सुखदायक आशा जागी थी कि लड़का ज़रूर जी. टी. रोड पर किसी मोटर के नीचे गया होगा, मर गया। सुख की साँस ली थी, लेकिन बाहर निकले तो माज़रा और ही था। लड़का रत्न चौधरी के कंधों पर था और लाला ढोलक की थाप पर भँगड़ा डाल रहा था। बाप डर गया। भगवान ख़ैर करे। लाले ने तहमद में खोंसी बोतल, जो अब तक आधी हो चुकी थी, उसे देते हुए कहा था—ओये पंडता! तेरे घर भगवान पैदा हुआ है, भगवान! मास्टरजी ने उसे सारी बात बताई—लड़के की ज़बान पर सरस्वती का वास है। जो कहता है ठीक निकलता है। रत्न ने लड़के को कंधे से नीचे उतारकर चारपाई पर बिठाया, पंडित को भभकी मारी—ओये पंडत, इस बाप को दोनों टैम रोटी दिया कर! आज से इसके लिए रोटी मेरे घर से आएगी। और कान खोलकर सुन्न! मुझे जानता है न! बीस किल्ले ज़मीन है। साले तेरी दोनों टाँगें तोड़ दूँ तो थाने में रपट भी दर्ज होगी—! फिर उसके लड़के के दोनों पैरों पर माथा टेका था—जय हो बाल भगवान की! मास्टरजी ने रत्न के कान में कुछ कहा। उसने सौ का नोट निकालकर लड़के की माँ की ओर बढ़ाया, इसके लिए कपड़े बनवा लो। जिस दिन मुझे नंगा दीख गया, तुम्हारे घर को फूँक दूँगा। हाँ, मेरी बीस किल्ले ज़मीन है। सौ का नोट हाथ में पकड़ते ही माँ के दिल में बारह बरस से जम गई ममता जैसे सारे बाँध तोड़कर बाढ़ की-सी बाहर बह आई। चारपाई पर लड़के के पास बैठकर उसका सिर गोद में खींच लिया था। लगातार चूमे जा रही है। पंडित लाले की दी हुई आधी बोतल गटक चुका है। शराबी है तो क्या? ज़मानाख़ास है। दुनिया देखी है। सबके सामने बीवी पर गरजा, ओये जानवर की औलाद! भगवान के बराबर बैठती है। उसे चूमती है। तुझे तो नरक में भी जगह मिलेगी! फिर सबके सामने उसका हाथ पकड़कर चारपाई से नीचे घसीटा था, लड़के के पाँव के पास पटक दिया था, यह है तेरी जगह। बाल भगवान के पैरों में। लोग सन्नाए हुए यह नाटक देख रहे हैं। पंडित वैसे भी ग़ुस्से वाला आदमी है, फिर आज पहली बार इतने आदमियों पर अपना जादू चलता देख वह आपे से बाहर हो गया है। उछलकर उसने दरवाज़े के पास पड़ी लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी उठा ली, बीवी की ओर लपका, तू कुत्ती दी। भगवान के पास बैठेगी? उसे चूमेगी? मैं तेरे टोटे-टोटे कर दूँ तो असली बाप का नहीं! रत्न और लाले ने उसके हाथ से कुल्हाड़ी छीनी। मास्टरजी ने समझाया—पंडितजी, आपको ग़ुस्सा शोभा नहीं देता। औरतें बेवक़ूफ़ होती हैं। फिर माँ है। प्यार तो उमड़ ही आता है न! लड़का सिद्धड़ से बाल भगवान हो गया तो बाप—'ओये पंडता' से पंडितजी! घरवाली को आज उसकी गालियाँ बुरी लग रही हैं, शराब; सौ रुपए के नोट की ओट में उसे यह सब कुछ सहन करने में तिल-भर तकलीफ़ नहीं हो रही। मास्टरजी ने लाले से पूछा, ओये आकाशवाणी! कुछ खाने का हीला भी किया है कि ख़ाली पेट पिलाकर मारने का इरादा है! लाले ने आँखें मटकाकर जवाब दिया, थोड़ी और छक लो मास्टरजी। जी.टी. रोड पर ढाबे में खाना बन रहा है। दस कुक्कड़ कटवाए हैं, दस्स! पैसे भी मैं दूँगा। यार के घर लड़का हुआ है, लड़का, फिर उसने पंडितजी को छेड़ा, पंडितजी, घर की दाल खाओगे कि ढाबे का मुर्ग़ा। देख लो। धर्म भ्रष्ट हो जाए! पंडितजी ने छाती फुलाकर जवाब दिया, आकाशवाणी सबको बता दे। सारे जहान को ख़बर कर दे। हम रावण कुल के ब्राह्मण हैं, खाते हैं, पीते हैं और राज करते हैं। हाँ, मुर्ग़ा खाऊँगा, पूरा मुर्ग़ा!

    सब लोग एक छोटे मेले की शक्ल में घर से निकलते हैं। बोलियाँ डालते, बुल्लारे कहलाते हुए जी.टी. रोड पर बने ढाबे पर पहुँचते हैं। ढाबे वाला सबको जानता है, अक्सर उसके वहाँ ही रात को दवा-दारू का अड्डा जमता है। लंबी-सी सलाख में मुर्ग़ा अड़ाए तंदूर में भून रहा है। छलाँग लगाकर थड़े से नीचे उतरता है। रत्न को जपकी डालकर मिलता है। तहमद में खोंसी देसी की बोतल निकालता है और रत्न के मुँह के पास ले जाता है।

    बस जी ले। होर नहीं, टिकेगी नहीं!

    होर नहीं दा पुत्तर। साले पी। लड़का हुआ है, लड़का। अब तो तू क़त्ल कर सकता है, क़त्ल!

    रत्न बोतल मुँह से लगाता है। लाला पूछता है—

    सरदारजी, यह लड़के और क़त्ल वाली बात क्या बनी!

    जीता रत्न से बोतल वापस लेता है, अभी बोतल का गर्दन वाला हिस्सा ख़ाली हुआ है। आधे हिस्से पर उँगली रखता है, गर्दन पीछे करता है, गटक-गटक की छोटी-छोटी आवाज़ें निकलती हैं और आधी ख़त्म। साथ पलंग पर बैठे ट्रक ड्राइवरों की ओर बढ़ाकर कहता है—

    लो मरावो तुस्सी भी छको। रोटी देर नाल खावाँगे!

    एक तीखी हँसी वाली आवाज़, जीते मुंडा जम्मे और आधी लाल परी! रत्न नौ का नोट ढाबे के छोकरे की ओर बढ़ाता है। जीता उसके हाथ से नोट छीनकर उसकी जेब में खोंसता है और छोकरे को हाँक देता है, अंदर से निकाल ले। पहले ही पाँच मँगवा रखी थीं। आज मेरी तरफों!

    हाँ लाले! पूछ, क्या पूछना है!

    लड़का पैदा होना और क़त्ल करना। बात क्या बनी?

    तू समझेगा। लूँण-तेल बेच! जट्ट तब तक कमज़ोर है जब तक उसके लड़का नहीं। लड़का हो गया, नाम आगे चलाएगा। बस्स! जो बोले उसकी गर्दन फुर्र। फाँसी होगी तो लड़का बड़ा होकर कचहरी जाने वालों से, फाँसी चढ़वाने वालों से हिसाब बराबर कर लेगा। प्यारे, तू क्या समझे। लड़का तो क़त्ल करने का लाइसेंस होता है, लाइसेंस! वाहे गुरु भेजता है।

    पलंग पर खड़ा होकर एक ड्राइवर ज़ोर से खाँसता है। इस खाँसने को इस तरफ़ खंगूरा भारना कहते हैं, मतलब होता है, चुप हो जाओ। कान पर हाथ रखता है, दूसरे हाथ से मूँछों के गीले बाल होंठों से परे करता है और बोली मारता है—

    कुड़ी ते ओह लैंणी जो हँसके थैंक्यू बोले।

    बाक़ी यार-दोस्त भी तहमद कस लेते हैं। एक ड्राइवर ट्रक स्टार्ट करता है और लाइटें जला देता है। मास्टरजी को 'बोली' समझ नहीं आई, पंजाबी जो नहीं। रत्न समझाता है—हमने तो वही लड़की लेनी है जो हँसकर थैंक्यू बोले।

    भँगड़ा शुरू हो गया है। इतनी आवाज़ें सुनकर पेड़ों पर बैठे परिंदों को ग़लती लगती है कि शायद सवेरा हो गया है—पंख फड़फड़ाते हैं, आवाज़ें होती हैं, फिर टहनियों पर दुबक जाते हैं, नहीं, सवेरा नहीं हुआ।

    कुड़ी ते ओह लैंणी जो हस्स के थैंक्यू बोले...

    जितने मुँह, उतनी बातें। आसपास के इलाक़े में यह बात आग की तरह फैल गई कि बाल भगवान में साक्षात् भगवान का वास है, बोलते बिल्कुल नहीं, जब बोलेंगे तो बस एक या दो शब्द, लेकिन सच्च, रत्न चौधरी के घर लड़का पैदा होना था, हो गया, लेकिन जब बाल भगवान की भविष्यवाणी की बात एक मुँह से दूसरे मुँह तक पहुँची तो हर आदमी ने अपनी कल्पना से उसमें कुछ-न-कुछ जोड़ दिया। रत्न तो गाड़ी के नीचे सिर देने जा रहा था, बाल भगवान ने रोका। जी, वह बेचारा तो सूखे कीकर से रस्सी बाँधकर फंदा बना चुका था। अगर इस बार भी लड़की हुई तो फाँसी लगा देगा। बाल भगवान ने बचा लिया। सिर्फ़ एक शब्द बोले—लड़का! और देख लो, लड़का हो गया। अरे, विश्वास नहीं आता तो गाँव के लाले से पूछ लो। और दस आदमी वहाँ बैठे थे। उनसे पूछ लो, सबके सामने कहा था।

    अब पीपल के पेड़ के नीचे पानी के मटके रख दिए गए हैं। रत्न ने एक छोकरा वहाँ बिठा दिया है। जी.टी. रोड पर आती-जाती बसें, कारें, इस बला की गर्मी में अब वहाँ रुकती हैं। मुफ़्त ठंडा पानी। दिल्ली की तरह दस पैसे गिलास नहीं। कोई सवारी पूछे तो ड्राइवर या कंडक्टर बाल भगवान वाली बात बताता है! रत्ने के कलेजे में बाल भगवान ने ठंड डाली है और वह लोगों को ठंडा पानी भी पिलाए!

    बाल भगवान के जिस्म पर अब भगवा कुर्ता और सफ़ेद धोती है। कंधे पर लश-लश करता सफ़ेद तौलिया। बड़े भाई हमेशा लंबे-लंबे पट्टे, बाल रखते थे। लेकिन इसकी हज़ामत हमेशा बारीक मशीन से बनवाई जाती थी, कौन रोज़-रोज़ नाई को पैसे दे! बबूल के सूखे काँटों जैसे उसके बाल अब लंबे हैं। माँ अब रोज़ रात को बालों में तेल मलती है, नरम और चमकीले हो गए हैं। ऐन बीचों-बीच चीर निकालती है, और माथे पर सिंदूर का बड़ा-सा टीका! अब बाल भगवान ज़मीन पर नहीं सोते, उन्हें बड़ा-सा तख़्तपोश मिल गया है। दूध जैसी चादर। वह सारा दिन सोए रहते हैं। जब जागते हैं तो सिर्फ़ खाते रहते हैं, फिर सो जाते हैं। बारह साल गली के कुत्ते की तरह भूखे रहे हैं, अब पेट तो भर गया है, लेकिन भूख का भय अभी वैसे का वैसा है, बल्कि और बढ़ गया है। जाने खाने को मिलना कब बंद हो जाए? आदमी को भूख इतना कमज़ोर और निहत्था नहीं बनाती जितना कि भूख का डर!

    पंडित जी का घर मंदिर के रास्ते पर पड़ता है। गाँव की औरतें रास्ते में उनके घर चावल, आटा, गँवई फल—जैसे ख़रबूज़े, पपीता, अमरूद वग़ैरह चढ़ाकर मंदिर जाती हैं। घर के सब लोग अब उजले कपड़ों में धुले-धुले दिखते हैं। शाम की रोटी मिलने की दशहत उनके चेहरों से ग़ायब हो गई है। अब चमक है, जो भरे पेट वाले लोगों के चेहरे पर होती है। सुबह-सुबह नहाए-धोए पंडितजी आँगन में बैठते हैं। लाल-सुर्ख़ आँखें लोगों का ख़याल है कि मारी रात बाल भगवान के पास बैठते हैं, जागते रहते हैं, सोए भगवान को पंखा करते हुए। दोस्त-यार आँखों के लाल सुर्ख़ होने की असली वजह जानते हैं। बाल भगवान के कमरे में सवेरे के वक़्त किसी को नहीं जाने दिया जाता। बस उनके कमरे के खुले दरवाज़े से, बाहर आँगन में खड़े होकर उनके दर्शन हो जाते हैं। आँख बंद किए लेटे बाल भगवान और सिरहाने बैठी हाथ-पंखा करती माँ के प्यार की बाढ़ है कि थमती ही नहीं, वह प्यार जो सिर्फ़ कमाऊ लड़के के लिए ही उमड़ता है। भाई-बहन अब बाल भगवान के कमरे में आने से डरते हैं, हिलता है, बोलता है, बस, कभी-कभी आँखें खोलकर देख लेता है। उसका ताला बंद दिमाग़ शब्द और वाक्य अब भी ग्रहण नहीं करता लेकिन भरे पेट ने बाक़ी इंद्रियों में जीवन-संचार कर दिया है! कोई-कोई बात वह बिना कहे समझ जाता है। भाई जब उसके कमरे में चारपाई के पास सिर झुकाकर खड़े हो जाते हैं तो उसे पता चल जाता है, कोई माँग लेकर खड़े हैं। माँ की ओर देखकर सिर हिलाता है। वह उसके सिरहाने के नीचे रखे नोट निकालती है, और लड़कों की उम्र के हिसाब से उन्हें जेबख़र्च देती है। लड़के पर जो चढ़ावा चढ़ता है, उसमें से बहुत-सा आटा, चावल, दाल बच जाती है। रात के अँधेरे में पिता बनिए की दुकान पर बेच आता है। आँगन तो रत्न चौधरी ने ईंटें भेजकर पक्का करवा दिया है। अब उसकी कल्पना में एक पक्के मकान ने जन्म ले लिया है।

    बीवी ने डरते-डरते एक रात पूछा ज़रूर था कि क्या सचमुच लड़के में भगवान का वास हो गया है। उसने पत्नी के फिर से भर आए जिस्म को दबोचते हुए डाँटा था—

    तुझे इससे क्या लेना है? लोग मानते हैं तो मानने दे। साल-भर में इतने रुपए हो जाएँगे कि ज़मीन भी अपनी होगी और मकान भी अपना। रत्ने के मकान की तरह पक्की ईंटों का!

    आजकल पत्नी को उसके मुँह से बदबू नहीं आती। उसका दबोचना अच्छा लगता है। एकदम उसके अंदर सरक जाना कितना अच्छा लगता है।

    लेकिन बोलता तो बिल्कुल नहीं!

    पहले कौन-सा बोलता था। शुक्र कर चुप रहता है, जिस दिन सिद्धड़ बोल पड़ा उस दिन भाँड़ा फूटा—दस दिन से गायत्री-मंत्र रटा रहा हूँ, लेकिन मज़ाल है कि 'ओम' से आगे कुछ रट सके! इतने लोग आते हैं। उनके सामने एकाध मंतर पढ़ दे तो वारे-न्यारे हो जाएँ, लेकिन हरामज़ादा सचमुच सिद्धड़ है।

    गाली मत दो उसे। सारे घर की रोटी चला रहे हैं मेरे बाल भगवान! माँ के जवाब में प्यार और चालाकी घुल-मिल गए हैं।

    तो फिर तुझे गाली दूँ! बिना गाली दिए मुँह का स्वाद ही नहीं बदलता, पति ने छेड़ा।

    हाँ, दे ले गाली। तेरा क्या? उस दिन तो कुल्हाड़ी उठाकर टोटे-टोटे करने लगा था!

    चुप हराम की! लोगों को डरामा करके दिखा रहा था! तेरे टोटे तो मैं वैसे ही कर दूँ। बिना कुल्हाड़ी के, पति ने उसकी भरी-भरी छाती में दाँत गड़ाकर कहा। उसकी लंबी सिसकारी निकल गई, दर्द से नहीं, सुख-संतोष से!

    अब लाले की दुकान के आगे लोहे की कुछ कुर्सियाँ बिछ गई हैं। शहर से बर्फ़-बक्सा भी वह ख़रीद लाया है, कारवालों को अब ठंडी बोतलें बेची जाती हैं, शहर के कॉलेज में जो लड़के पढ़ने जाते हैं। अब वह भी बैठना शुरू हो गए हैं। लाले के कान हमेशा उनकी बातों की तरफ़ लगे रहते हैं, थोड़े-से अँग्रेज़ी के फिकरे भी उसे याद हो गए हैं। आज रविवार है। दुकान के आगे जमघट है, चारपाइयों पर बड़े लोग और कुर्सियों पर छोकरे विराजमान हैं। एक लक्की कार सड़क से नीचे उतरती है, पेड़ के नीचे रुकती है। मोटे पेट वाला आदमी बाहर निकलता है, ठंडी बोतलें माँगता है, लाला कार में बैठी बाक़ी सवारियों को देखकर कहता है—

    उन्हें भी बाहर बुला लें! दो मिनट पेड़ के नीचे बैठेंगे तो साँस जाएगी। बिल्कुल घुप्प गर्मी है। मोटे पेट वाला इशारे से उन्हें बाहर बुलाता है, लाला आँख से इशारा करता है। छोकरे कुर्सियाँ ख़ाली कर देते हैं। उसकी बीवी और जवान लड़का बाहर निकलते हैं। लड़के ने सफ़ेद निक्कर और टी-शर्ट पहनी हुई है, कसरती जिस्म पर कपड़े खुल-से गए हैं। तीनों चुप बैठे हैं, बिल्कुल बातचीत नहीं कर रहे, ज़रूर किसी बड़ी मुसीबत में हैं। लाला उनके पास प्लेट में लड्डू रखकर जाता है। मोटा आदमी 'न' में सिर हिलाता है।

    खा लें। पैसे नहीं लूँगा, भगवान का परसाद है!

    लेकिन परसाद तो मंगल को बाँटते हैं! आज तो ऐतवार ने, औरत कहती है।

    यह उस भगवान का परसाद नहीं। हमारे गाँव के बाल भगवान का है। हर ऐतवार को मैं बाँटता हूँ! लाले की कमाई बाल भगवान की वजह से सौ गुना बढ़ गई है। आसपास के गाँवों के लोग दर्शन के लिए आते हैं तो उसकी दुकान पर चाय-पानी पीते हैं।

    यह बाल भगवान कौन हैं! क्या बताते हैं, अमीर औरत के दिल के किसी कोने में सोया हुआ धर्म जाग उठता है। मास्टरजी पास सरक आए हैं। उन्हें बाल भगवान की कहानी सुनाते हैं। औरत-मर्द कुछ खुसपुस करते हैं। दर्शन कर लिए जाएँ। क्या हर्ज है, शायद कल काम बन जाए, मास्टरजी को मर्द बताता है कि छोटे भाई के साथ उसका साझेदारी में लोहे का कारख़ाना था। स्टील मिल छोटे ने क़ब्ज़ा लिया। नीचे की कोर्ट में वह जीत गया है। कल सैशन कोर्ट में वकीलों की आख़िरी बहस है, शायद फ़ैसला भी हो जाएगा। छोटे भाई के नाम बाप ने जायदाद कर दी थी ज़रूर जीत जाएगा। सब कुछ ख़त्म हो जाएगा। मास्टरजी उसे बाल भगवान के दर्शन की सलाह देते हैं, पंडित के घर से आजकल उन्हें भी खाने-पीने का सामान मिलता रहता है। लेकिन मोटे आदमी का जवान लड़का ग़ुस्से में कहता है—

    वाट नॉनसेंस! आई डोंट बिलीव इन सच फ्रॉड्ज!

    लाले को फ्रॉड्ज का मतलब तो समझ नहीं आया, लेकिन उसे पता है कि नॉनसेंस गाली है। ऊँची आवाज़ में, सबको सुनाकर गरजता है—

    हमारे बाल भगवान को नॉनसेंस कहता है! गाली देता है! छेद दूँगा! उठो, जाओ यहाँ से! उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर लोग खड़े हो गए हैं। उन तीन सवारियों को घूर रहे हैं। मास्टरजी समझाते हैं—

    लाले, पढ़े-लिखों की बात का बुरा मत माना कर, अधर्मी होते हैं। देखा नहीं, सारा देश डुबो रहे हैं! मोटे आदमी ने ज़िंदगी में पहली बार किसी दुकानदार को ग्राहक से लड़ाई पर उतारू देखा है। उसे पक्का विश्वास हो जाता है कि बाल भगवान में कुछ-न-कुछ ज़रूर है जिसकी वजह से यह चाय वाला मरने-मारने पर उतारू हो गया है।

    वे तीनों बाल भगवान के आँगन में पहुँच गए हैं। पीछे लोगों का छोटा-सा जुलूस है, पंडित कमरे से बाहर आँगन में आता है। भरपेट रोटी और भरपेट शराब ने उसके चेहरे पर तीखी चमक ला दी है। उसने बाल कटवाने बंद कर दिए हैं। सिर के दोनों तरफ़ लटक रहे बालों ने उसके कानों को ढँक लिया है। वह मास्टरजी की तरफ़ सवालिया निगाह से देखता है, मास्टरजी मोटे आदमी के बारे में उसे बताते हैं; उसकी मुसीबत भी समझाते हैं, पंडित गड़गड़ाती आवाज़ में कहता है—

    नहीं, मुलाक़ात नहीं हो सकती। भगवान सो रहे हैं! मोटे आदमी का जवान लड़का निक्कर की पिछली जेब से पर्स निकालता है, खोलता है और बड़ी हिकारत से सौ का नोट पंडित की तरफ़ बढ़ाता है। पंडित के अंदर बैठा पारसी थिएटर का नाटक-कलाकार झटके से हाथ आगे बढ़ाता है। नोट पकड़ लेता है, लड़के के चेहरे पर मुस्कान है, तुम लोगों की यही क़ीमत है, वाली! पंडित डरामे पर उतारू है। नोट के दोनों सिरों को उँगलियों में पकड़ता है, दो टुकड़े करता है और उसको लौटा देता है। आवाज़ की गड़गड़ होती है—

    क्यों? तू भगवान को ख़रीदेगा! हराम के तुख़्म! इतना पैसा है तो जज को क्यों नहीं ख़रीद लेते? गाली सुनकर लड़के के कसरती कंधे और चौड़े हो गए हैं। गाली सुनकर उसकी माँ का विश्वास और पक्का हो गया है कि बाल भगवान वाली बात सच है। जो पंडित गाली-गलौच करते हैं, वह भगवान के नज़दीक होते हैं, भिखमंगे पंडित नहीं! गाली सुनकर गाँव के लोगों के सीने तन गए हैं, अपने पंडित को गर्व से देख रहे हैं। सालों की कैसे बोलती बंद कर दी! सौ के नोट का रौब झाड़ रहे थे।

    अब लड़के की माँ पंडित के आगे हाथ बाँधे खड़ी है।

    जगा दो महाराज, हम डूबतों का सहारा अब बाल भगवान ही हैं। लड़के की बात का बुरा मानें। जवानी और बेवक़ूफ़ी कोई अलग थोड़े होती हैं!

    मास्टरजी पंडित को एक कोने में ले जाकर समझाते हैं। पहली बार मोटी आसामी फँसी है, बाल भगवान के कुछ कहने से अगर इन लोगों का काम बन गया तो एक ही झटके में वारे-न्यारे हो जाएँगे। लोग जो चढ़ावे में दाल, चावल, आटा चढ़ाते हैं, उसको बेचने से तो पक्का मकान बनवाने में वर्षों लग जाएँगे। पंडित कल्पना से एक-एक करके ईंटें बाहर निकलती हैं और मकान पक्का हो जाता है। रंग-रोगन के डिब्बे धड़ाधड़ बाहर रहे हैं। मकान को सतरंगा बना रहे हैं। वह बाल भगवान को अंदर जाकर जगाता है, माँ सिरहाने बैठकर हाथ-पंखा झलना शुरू कर देती है। लगातार रोटी मिलने की वजह से लड़के के गाल फूल गए हैं, जैसा अक्सर तस्वीरों में फूले गालों वाले भगवान होते हैं। रंग बाप पर गया है। एकदम अंगारों की तरह भख्त! वह हमेशा उनींदा रहता है, भरे पेट जानवर की तरह माँ उसकी पीठ पीछे बड़ा तकिया रख उसे अधबैठा करती है। औरत अपनी लोहे की फ़ैक्टरी छिन जाने का रोना रोती है। आख़िर में विनती करती है, कल सैशन कोर्ट में आख़िरी तारीख़ है, आप ही हमारी डूबती नैया बचा सकते हैं!

    लड़के के तालाबंद दिमाग़ पर ठक-ठक होती है। शब्द बिल्कुल नए हैं, अंदर घुसने से इंकार कर रहे हैं। औरत के चेहरे से उसे अंदाज़ लग रहा है कि कुछ माँग रही है! भूखी है? उसे अब भी यही लगता है कि कोई जब कुछ माँगता है तो सिर्फ़ रोटी। लेकिन मोटी है। भूखे आदमी कभी मोटे नहीं होते। यह सैशन क्या माँग रही है? कोर्ट क्या है? जब बहुत देर ठक-ठक होने के बावजूद कुछ समझ नहीं आता तो वह आँखें मूँद लेता है। नीचे ज़मीन पर बैठे लोग प्रतीक्षारत उसकी तरफ़ देख रहे हैं। उसकी आँखें बंद हैं, लेकिन इतने लोगों का लगातार देखना वह महसूस कर रहा है। आँखें खोलता है, उस औरत की तरफ़ देखता है। पंडितजी उसे सवाल पूछने का इशारा करते हैं।

    भगवान! हम केस जीतेंगे क्या?

    लड़के को केस और जीतना शब्द का अर्थ आता है। उसने 'न' में सिर हिला दिया।

    भगवान! क्या हम केस हार जाएँगे! लड़के ने फिर 'न' में सिर हिला दिया।

    अब उस औरत, उसके पति और बाक़ी लोगों के चेहरे पर भरपूर हैरानी बैठी है। यह कैसा जवाब है? मोटे मर्द ने पूछा।

    हम जीतेंगे, हारेंगे! लड़के ने फिर 'न' में सिर हिलाया।

    वहाँ बैठे लोग अब फुस-फुस करना शुरू हो गए हैं। उस मोटे मर्द के जवान लड़के का चेहरा ग़ुस्से से तमतमा रहा है। माँ-बाप को अँग्रेज़ी में कहता है—

    आय टोल्ड यू हीज़ फकिन फ़ॉड! वह उठ ठहरा। माँ-बाप भी बाल भगवान को बिना नमस्कार किए उसके पीछे कमरे से बाहर निकल गए। पंडितजी का चेहरा अब बिल्कुल लाल हो गया है, इतने लोगों के सामने इतना अपमान? उन्हें पक्का हो गया है कि बात सारे गाँव में फैल जाएगी और कल से आटे-दाल का चढ़ावा भी बंद हो जाएगा। कुछ समय पहले कल्पना में जो पक्का मकान बन गया है, गिरना शुरू हो जाता है। यह मास्टर का बच्चा उठता क्यों नहीं! जाए तो इस पागल की ख़ैर नहीं। ठुकाई होगी तो देखूँगा, इसका भगवान है कि नहीं।

    शायद बाहर निकले लोगों में से किसी ने रत्न चौधरी को इस घटना के बारे में बता दिया है। वह तेज़ी से कमरे में घुसता है, मास्टरजी उसे सारी बात समझाते हैं। वह चुपचाप बैठा है, इतने सारे लोगों को ख़ामोश बैठे देखकर लड़का डर गया है! डर से वह बचपन से वाक़िफ़ है! रोटी मिलने का डर, भाइयों के रोटी चुरा लेने का डर, बाप का आते-जाते लात, जूता, थप्पड़ मारने का डर। माँ की आँखों में उसके लिए मरने की स्थायी भावना को देखने का डर और भूख का डर, पेट तो अब भरा रहता है, लेकिन भूख के दो लंबे हाथ लगातार बाहर फैले रहते हैं। उसकी छोटी बहन अंदर आती है, भाई का चेहरा देखती है, और उसे पता चल जाता है कि वह अंदर-ही-अंदर काँप रहा है। माँ के हाथ से पंखा लेती है। माँ वहाँ से उठकर अंदर जाती है। वह एक हाथ से पंखा झल रही है, दूसरा हाथ भाई के माथे पर फेर रही है, भाई के अंदर फैल रहा डर उसके हाथ पर शिकंजा गड़ा देता है। सब लोग चुप बैठे लड़के के चेहरे की ओर देख रहे हैं। बहन उससे पूछती है, रोटी दूँ?

    लड़के का पेट भरा हुआ है। लेकिन उसके अंदर बैठा भूख का डर छलाँग लगाकर उसके मुँह में जाता है, वह एक ही साँस में कहता है, हाँ! हाँ! हाँ!

    मास्टरजी के दिल में अँधेरे में एक चिनगारी चमकती हैं। रत्न से पूछते हैं, रत्ने, जब बाल भगवान ने तुम्हें लड़का होने की बात बताई थी तो कब से भूखे थे?

    जवाब पंडित देता है—

    साला हमेशा भूखा रहता था। तीन-चार दिन से तो भूखा होगा ही। तभी मकौड़े खा रहा था!

    तो बस! ठीक है! बाल भगवान तभी सच बात बोलते हैं जब भूखे हों!

    यह क्या बात हुई? रत्न हैरान होकर पूछता है।

    भूख हमेशा सच बुलवाती है! तुझे क्या पता! भूखे आदमी सरकारें पलट देते हैं। भूखा पहले सच बोलता है फिर चाकू मारता है!

    लेकिन रत्न और पंडित के चेहरे पर बैठे शक को मास्टरजी देख लेते हैं। लड़के से कहता है—

    रोटी नहीं, अब तू भूखे रहेगा! रोटी और भूख शब्द खट से लड़के के दिमाग़ में घुस जाते हैं, क्योंकि जन्म से ही वह इन शब्दों के अर्थ समझता है! उसके मुँह से तो कोई शब्द नहीं फूटता लेकिन अंदर बैठा डर आँखों की राह बाहर निकलना शुरू हो जाता है! गाल आँसुओं से गीले हो रहे हैं।

    अब सच बताएगा!

    वह मास्टरजी की कड़कती आवाज़ सुनकर झट से जवाब देता है, हाँ! हाँ! हाँ!

    देखा! भूख की धमकी ने कैसे बोलती बंद कर दी। अब इसे खाने को मत दो!

    रत्न और पंडित मास्टरजी को बताते हैं कि खाने को नहीं देंगे तो मर नहीं जाएगा? पंडित के घर आए चढ़ावे का हिस्सा इस वक़्त मास्टरजी के दिलो-दिमाग़ पर धरना देकर बैठा है। नहीं! लड़के का ज़िंदा रहना ज़रूरी है, तभी उनका काम भी चलता रहेगा। लेकिन लड़के का बाल भगवान बने रहना भी ज़रूरी है, तभी लोग चढ़ावा चढ़ाएँगे। उनके दिल के अंदर दूसरी चिंगारी चमकती है—

    ठीक है। अब लोगों को सिर्फ़ एतवार को बाल भगवान से मिलने दिया जाए। दो दिन पहले इसकी रोटी बंद! ज़िंदा भी रहेगा और सच भी बोलेगा!

    पंडित की कल्पना में फिर से पक्का मकान बनना शुरू हो गया है। मास्टर के कंधे पर हाथ मारकर कहता है, वाह मास्टर! तू तो भगवान का भी बाप है! इस ख़ुशी में हो जाए आज लाल परी का नाच।

    सूरज उतरे तो जी. टी. रोड वाले ढाबे पर जाना। आज मेरी तरफ़ से! रत्न यह कहता हुआ मास्टरजी के साथ बाहर निकल जाता है। पंडित के दाँत अभी से भुने हुए कुक्कड़ के नर्म मांस में गड़ना शुरू हो गए हैं।

    अगली सुबह माँ, बाप और बहन बाल भगवान के कमरे में बैठे हैं। बहन पंखा झल रही है। बाल भगवान उसका हाथ पकड़ते हैं, पंखा उसके हाथों से लेते हैं। तीनों उसे हैरानी से देख रहे हैं। क्या चाहता है? कुछ माँग रहा है क्या?'' मैं! पंखा! लड़के के चेहरे पर ख़ुशी है या शरारत, वह बहन को पंखा झलना शुरू कर देता है। बाप झट से दरवाज़ा बंद कर देता है। किसी ने बाल भगवान को पंखा झलते देख लिया तो बेड़ा गरक हो जाएगा। माँ लड़के के हाथ से पंखा छीनने की कोशिश कर रही है, लड़के ने कसकर डंडी पकड़ रखी है। ऊँची आवाज़ में कहता है, “मैं! पंखा! पंडित बीवी को इशारा करता है कि ज़िद पूरी कर लेने दो! दरवाज़ा तो बंद है। कौन देखेगा!

    क्यों जी! मकान पक्का करवाने में कितनी ईंटें लगेंगी!

    कम-से-कम दस हज़ार। सिर्फ़ ईंटें नहीं, सीमेंट भी चाहिए! पति ने समझाया। लड़का उनकी बातें सुन रहा है, ईंट शब्द उसके दिमाग़ के आसपास घूम रहा है। पूछता है, “ईंट! ईंट!

    पंडित बाहर जाता है, एक ईंट उठाकर लाता है, लड़के को दिखाता है। लड़के की आँखों में अब भी प्रश्नवाचक भाव है। बाप कच्ची दीवार पर ईंट रखता है और उसे समझाता है, ईंट, पक्का मकान! लड़के की आँखों से प्रश्न ग़ायब हो जाता है। स्कूल की दीवार और उसकी ईंटें उसके दिमाग़ में प्रवेश कर जाती हैं! उसके चेहरे पर बात समझ जाने वाली मुस्कान है! नया शब्द उसने सीख लिया है। तोते की तरह रट रहा है, ईंट! ईंट! ईंट! यह नया शब्द रटते-रटते बाल भगवान सो गए हैं। पंडित बीवी को कहता है कि देख लो, कल की बात सारे गाँव में फैल गई है। कोई भी चढ़ावा चढ़ाने नहीं आया। बीवी अब फिर से भूखे पेट और जिस्म में गड़ते पति के तीखे दाँतों के बारे में सोचती है तो काँप-काँप जाती है।

    कोई दुपहर के बाद का वक़्त होगा। घर के बाहर 'बाल भगवान की जय' के नारों वकी आवाज़ें सुनकर पंडित हड़बड़ाकर उठता है, बाहर का दरवाज़ा खोलता है। वही कल वाले तीन लोग हैं, जिनकी आज सुबह सैशन कोर्ट में तारीख़ थी। पीछे गाँव वालों की भीड़ है, लाला, रत्न और मास्टरजी की बाँछें खिली हुई हैं। मोटा मर्द फिर नारा लगाता है—'बाल भगवान की जय'; लोग गला फाड़कर जवाबी नारा लगाते हैं! पंडित हैरान है कि हुआ क्या? मोटा, उसकी पत्नी और जवान लड़का पंडित के पाँव छूते हैं। मोटा बताता है—

    पंडितजी, बाल भगवान ने हमें बचा लिया। कल क्या ठीक वचन बोले थे। जीत होगी और हार।

    आगे की बात उनकी बीवी बोलती हैं—

    वही हुआ जो भगवान ने कहा था। छोटे भाई ने हमारे ख़िलाफ़ केस वापस ले लिया और सुलहनामा होगा!

    आगे की बात लड़के ने बढ़ाई—

    बाल भगवान ने चाचा को उसके पाप की पनिशमेंट दी। कल ही उनके लड़के को हार्ट-अटैक हुआ। बास्टर्ड डर गया। आज सुलह कर ली, उसने दुबारा से पंडितजी के पाँव छुए!

    बाल भगवान के दर्शन करा दें। हमें तो उन्होंने मिट्टी में मिलने से बचा लिया।

    पंडित फिर नाटक करने पर उत्तर आया है—

    नहीं। भगवान सो रहे हैं। उन्हें जगाना मना है!

    औरत ने पंडितायन की ओर देखा; गला बिल्कुल ख़ाली है। अपने गले से सोने का हार उतारा, और उसके गले में डालते हुए कहा—

    भगवान जी की माँ और गला बिल्कुल ख़ाली। जी!

    पंडित को साफ़ दिखा कि सोने की चमक की वजह से बीवी की छाती और सफ़ेद और उजली हो गई है। सूरज डूबने के बाद वाले दृश्य उसके दिमाग़ में कूद रहे हैं, मांस में खुभने के लिए दाँत किट-किट कर रहे हैं।

    पंडितजी, भगवान के दर्शन करे बिना हम नहीं जाएँगे! मोटे आदमी ने आँगन के फ़र्श पर बैठते हुए कहा। पंडित ने बीवी के गले में पड़े सोने के हार को देखा, संकेत करती मास्टरजी की आँखों को देखा और हाँ कर दी।

    दरवाज़े का कुंडा खोला। भगवान सो रहे हैं, चेहरे पर भरे पेट वाली शांति है, सुख है। छोटी बहन पंखा झल रही है। उसने होंठों पर उँगली रख सबको बोलने का इशारा किया। लोग चुपचाप उनकी चारपाई के पास बैठ गए हैं। उन तीनों ने भगवान के पैरों के पास माथा रखा। इतने लोगों के वहाँ होने को लड़के की इंद्रियों ने सुप्तावस्था में भी ग्रहण कर लिया है। वह आँखें खोलता है। हैरान है कि उसके कमरे में भीड़ क्यों है? तभी वह मोटा आदमी नारा लगाता है, बाल भगवान की जय! सारे लोग नारे का जवाब देते हैं। वह आदमी लड़के के पैर पकड़कर उन पर सिर रखता है। लड़का झटके से पैर पीछे खींच लेता है, उठ बैठने के लिए हिलता हैं। वह डर गया है। यह मोटा उसे ज़रूर मारेगा। पंडित गरजता है—

    भगवान को छूने की हिम्मत कैसे पड़ी? दिमाग़ घास चरने तो नहीं चला गया? पीछे हटकर बैठो! वह बेटी के हाथ से पंखा लेता है, उसकी जगह बैठकर झलना शुरू कर देता है। लड़का आश्वस्त हो जाता है। पिता के होते हुए मोटा उसे मार नहीं सकता। उसकी औरत पूछती है—

    पंडितजी, हम भगवान की क्या सेवा करें? मौक़ा तो आपको देना ही पड़ेगा! पंडित पारसी थिएटर का फिकरा मारता है—

    भगवान पैसे से नहीं मिला करते, और मिल जाएँ तो पैसे लिया नहीं करते। उन्हें देना है तो बस सच्चे दिल से श्रद्धा दो, इज़्ज़त दो, माल दो! उन तीनों के चेहरों पर निराशा बैठ गई है। लोग धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे हैं कि बेचारे ठीक ही तो निराश हैं। लाखों का महीने का कारोबार बच गया, बाल भगवान ने बचा दिया। अब कुछ करेंगे नहीं तो हमेशा डर लगा रहेगा कि कहीं फिर सब कुछ स्वाहा हो जाए। मोटे की औरत मास्टरजी से कहती है, आप ही कुछ कहें। पंडितजी को राजी करें। कुछ किए बिना हमारी आत्मा में ठंड कैसे पड़ेगी! इसके पहले कि मास्टरजी कुछ कहें, पंडित गड़-गड़ करती आवाज़ में कहता है—

    नहीं! कुछ नहीं। सब जाओ! इतने लोगों के मुट्ठी में होने का नशा उस पर सवार हो गया है।

    सब चुप। लड़के के बंद दिमाग़ पर लगा ताला हिलना शुरू हो गया है। दुपहर को सोने से पहले जो नया शब्द उसने सीखा था, वह बाहर आने के लिए छलाँगें लगा रहा है। वह बोलने के लिए मुँह खोलता है लेकिन शब्द होंठों पर आने से पहले फिसल जाता है। वह कसकर आँखें बंद करता है। सिर हिलाता है; ताला ज़ोर-ज़ोर से हिलता है, शब्द नीचे खिसकता है, उछलकर होंठों पर बैठता है; वह मुस्कुराता है, आँखें खोलता है, धीमी आवाज़ में कहता है, ईंट, ईंट, ईंट! लोगों के चेहरों पर हैरानी। पंडित हैरान, वह तीनों हैरान। मोटा आदमी पंडित से पूछता है, भगवान क्या कह रहे हैं? उसकी आवाज़ डरी हुई है, भगवान कहीं यह तो नहीं कह रहे कि उसके काम पर ईंट-पत्थर! पंडित की समझ में भी कुछ नहीं रहा। वह मदद माँगती आँखों से मास्टरजी की तरफ़ देखता है। लड़का फिर कहता है—

    ईंट, ईंट, ईंट! वहाँ बैठे लोग अब बिल्कुल डर गए हैं। बाल भगवान किसी ख़तरे या बुरी ख़बर की चेतावनी दे रहे हैं? मास्टरजी के दिमाग़ में खट से ईंट और मकान का रिश्ता जुड़ जाता है। उस मोटे को बताता है—

    बारिशों में बाल भगवान का कमरा टपकता है। शायद इसे पक्का करवाने को कह रहे हैं। भगवान भगतों से हमेशा संकेत-भाषा में बात किया करते हैं!

    लोग हाँ, हाँ करते हैं। मोटा आदमी पूछता है, क्यों भगवान! आपकी यही आज्ञा है न?

    लड़के के दिमाग़ के बाहर यह वाक्य मँडराता है, और बाहर से ही वापस लौट आता है। वह फिर कहता है, ईंट, ईंट, ईंट!

    मोटे को उसकी औरत कहती है—

    सुनो जी! सारा मकान पक्का करवा दो। हमारे भगवान कच्चे मकान में रहें? थू है हम पर!

    भगवान ने आँखें बंद कर ली हैं। सब बाहर निकलते हैं। मोटा इस तीन कमरों वाले कच्चे मकान का आँखों से अंदाज़ा लगाता है। हाथ जोड़कर बोलता है—

    पंडितजी, मैं कल ही दस हज़ार ईंटें भेज दूँगा। कम पड़ें तो ख़बर देना। और जाएँगी!” उसका जवान लड़का करता है—

    पापा, सीमेंट भी भेजना है, ब्रिक्स विल नॉट डू कचहरी में सुलहनामा होने के बाद उसे हौसला हो गया है कि अब लंबी कार उसके पास रहेगी! उसकी माँ कहती है, भगवान कभी ख़बर भेजा करते हैं क्या? हम हर इतवार यहाँ आया करेंगे। जो कमी-बेशी रह जाएगी, ख़ुद देखेंगे! भगवान तो कुछ बोलते ही नहीं!

    पंडित ने भगवान के कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया है। वे तीनों दहलीज़ पर माथा टेकते हैं। औरत धीरे-से बेटे से कुछ कहती है। वह पर्स से सौ के पाँच नोट निकालता है, पंडितायन के हाथ में पकड़ाकर उसकी मुट्ठी बंद कर देता है, “माताजी। अब मत करें। यह भगवान के लिए नहीं। सारे गाँव में आप ही हमारी तरफ़ से मिठाई बाँट दें!

    अब उनका घर पक्का है, दीवारों-दरवाज़ों पर रंग-रोगन है और उनसे ग़रीबी की बू नहीं उगती। अब उन सबके चेहरे गोलमटोल, भरे-भरे हैं और भूख की चुग़ली नहीं करते। अब पंडित की कल्पना में मकान की जगह ज़मीन ने ले ली है। और उसे ज़मीन लेने की जल्दी है, लोगों को सच का पता कभी भी चल सकता है; जब भी चल गया, खेल ख़त्म, पैसा हज़म। अब सिर्फ़ रविवार को लोगों को बाल भगवान से मिलने की इजाज़त है। उनकी प्रसिद्धि अब गाँवों से बाहर निकलकर शहरों में भी फैल गई है और शहर के लोग भी जादू-टोने, साधू-साध के मामले में गाँव के लोगों से कम बेवक़ूफ़ नहीं होते, बल्कि एक क़दम आगे ही होते हैं। लाला की दुकान के साथ अब एक पक्का कमरा बन गया है। मेज, कुर्सियाँ, छत पंखा और रेडियो लग गया है। जो भगत-भाई शहर से आते हैं, अब इस कमरे में बैठकर ठंडा-गर्म पीते हैं। जन-संपर्क का विभाग तो शुरू से ही मास्टरजी ने सँभाल रखा है। लाला ने एक बार उनसे पूछा ज़रूर कि क्या सचमुच बाल भगवान को सब कुछ पता है, आगा-पीछा। मास्टरजी का जवाब सुनने के लिए और बैठकबाज भी पास सरक आए। उन्होंने डपटा—

    देख आकाशवाणी! तुझे सच-झूठ से क्या मतलब? दुकान जो चल निकली है, एक पक्का कमरा जो बन गया है, क्या तेरे बाप ने मरते हुए छोड़ा था? बाल भगवान की कृपा से ही तेरे गाहक बढ़े हैं न? रेडियो, पंखे चल रहे हैं न? क्यों?

    लाला के मुँह पर डर ने ताला लगा दिया है। मास्टरजी समझाते हैं, देखो, धर्म के नाम पर हर हिंदुस्तानी डरपोक है, बेवक़ूफ़ होता है। अरे, जब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक साधुओं, बाबाओं और तांत्रिकों में विश्वास करते हैं तो आम लोगों की बात तो छोड़ ही दो न। याद नहीं, बिहार का एक मुख्यमंत्री दस अँगूठियाँ डालता था। किसी बाबा ने चक्कर चलाया था। हो सकता है, पैरों की दस उँगलियों में भी दस अँगूठियाँ डालता हो!

    लेकिन ऐसा क्यों है? लोगों को अपने हाथों की ताक़त पर विश्वास क्यों नहीं? कॉलेज में पढ़ रहे एक लड़के ने पूछा, जिसे साम्यवाद की नई-नई हवा लगी है! मास्टरजी जानते हैं जिस दिन नौकरी पाने के लिए हज़ारों की रिश्वत देगा, यह लाल रंग अपने आप धुल जाएगा। फिर भी उसे समझाते हैं—

    कौन-से हाथों की ताक़त की ग़लती तुम्हें लग गई है? देखा नहीं। इस देश के लोग हाथों में लाठी पकड़ते हैं, लेकिन मारने के लिए नहीं, सहारे के लिए! और भाई, फिर दिनकरजी भी कह गए हैं, लिख गए हैं—हारे को हरी नाम! बैठकबाजों के कानों के दरवाज़े चौकस हो गए हैं, मास्टरजी ज़रूर कोई चस्के वाली बात सुनाएँगे।

    मास्टरजी, यह दिनकरजी कौन थे?

    अरे भाई, दो अक्खर कभी पढ़ भी लिया करो। हमारे राष्ट्रकवि कहलाते थे। जब तक एम.पी. थे, कई कमेटियों के कुर्सीपति थे, इंद्र की कॉल-गर्ल्स पर लिखते रहे। उनका एक काव्य पढ़ो कभी 'उर्वशी'। मज़ा जाए!

    यह काल-गर्ल्स क्या बला होती हैं जी? लाले ने चटखारा लेकर पूछा।

    होती है तेरी माँ! अरे रंडियाँ। आजकल जैसे काल गर्ल्स को इस्तेमाल करके काम निकलवाया जाता है, स्वर्ग का राजा इंद्र अपनी अप्सराओं से वैसे ही काम निकलवाया करता था!

    अच्छा! फिर क्या हुआ?

    बेचारे जब रिटायर हो गए, कोठी गई, जहाजों में सफ़र बंद! बस, हर बूढ़े हो रहे हिंदुस्तानी की तरह सरकार की शरण से निकले और सीधे पहुँच गए भगवान की शरण में। आख़िरी किताब लिखी—हारे को हरी नाम! तो भाई, तुम ठहरे अनपढ़। अब पढ़े-लिखे लोग मंत्री, नेता, लेखक, कवि तक जब भगवान की महिमा को मानते हैं, तो तुम्हारे पेट में मरोड़ लग गए हैं क्या, जो ऐसे सवालों के चक्कर में पड़ गए हो। कान खोलकर सुन लो। मेरी बात गाँठ बाँध लो। बाल भगवान नहीं तो तुम भी नहीं। गाँव की सड़कें पक्की बन गई हैं न? हाई स्कूल और हस्पताल खुल गया है न? इतने साल तो नेताओं ने इस गाँव पर किरपा नहीं की! अब की है न? सिर्फ़ बाल भगवान के कारण। सुसरो, सवाल मत पूछो। कानों को हाथ लगाओ। जय-जयकार करो, समझे। मास्टरजी पहली बार इतना लंबा बोले हैं। लोग सकता गए हैं? कैसे सीधे हृदय से मास्टरजी बोल रहे हैं, आकाशवाणी उन्हें इशारे से दुकान के अंदर आने को कहता है। गिलास में थोड़ी-सी डालता है, कैंपा मिलाता है, ताकि रंग छुप जाए, लोगों को पता चले। उन्हें पकड़ाता है, लो जी! ठंडा पी लो। हम बेवक़ूफ़ों की वजह से गला मत सुखाया करो!

    बाल भगवान की ज्यों-ज्यों प्रसिद्धि फैल रही है, त्यों-त्यों पेट भी फैलना-फूलना शुरू हो गया है। एक ही शब्द में बात करते हैं। कई बार ठीक, कई बार ग़लत। जिन लोगों का बताया जवाब ग़लत निकलता है, वह अपने कर्मों को दोष देकर चुप हो जाते हैं। जिनका जवाब सही निकलता है, वह पुण्य कमाने के लिए और लोगों को भगवान की शरण में भेजते हैं। फिर इधर के उर्दू के अख़बार चटकारे लेकर ऐसी ख़बरें छापते हैं। और बुज़ुर्ग लोग, दुकानदार तबका अब भी उर्दू के अख़बार पढ़ता है। चटपटी ख़बर और चटखारे लेने वाली ज़ुबान! और फिर प्रत्येक छोटी-मोटी दुकान रेडियो स्टेशन होती है, जहाँ समय विशेष पर नहीं, सारा समय समाचार दर्शन चलता रहता है। हर इतवार लाले की दुकान के आगे कारों, साइकिलों और स्कूटरों की भीड़ लग जाती है। उसके पास अब तीन छोकरे हैं। चाय-पानी पिलाते-पिलाते हाँफ जाते हैं।

    अब बाल भगवान को हफ़्ते में सिर्फ़ तीन दिन खाने को दिया जाता है। वीरवार खाना बंद और सोमवार शुरू। दिमाग़ तालाबंद है तो क्या हुआ? बाक़ी इंद्रियाँ तो काम करती हैं। उन्हें अब बुधवार को सारा दिन हँस-हँसकर खिलाया जाता है तो पता लग जाता है कि अब कुछ दिन रोटी नहीं मिलेंगी। पेट बढ़ने के साथ-साथ भूख के दानव का क़द भी बढ़ गया है। झपटते हाथों से रोटियाँ अंदर डालता जाता है, निगलता जाता है। तीन दिन भूखा रहने की वजह से रविवार को उनके चेहरे पर एक सूखी शांति और पीली चमक होती है; अगले दिन रोटी मिलने की चमक। आँखें फूल गई हैं, जैसे पुतलियाँ चटककर बाहर जाएँगी। लोग उनकी आँखों की ताव नहीं ला सकते! तरह-तरह के सवाल पूछे जाते हैं। दिमाग़ का ताला हिलता है तो जवाब निकलता है, नहीं तो ख़ाली आँखों से पूछने वालों को देखते रहते हैं। जिसे जवाब नहीं मिलता, बाक़ी लोग उसे बाहर जाने के लिए कहते हैं। भाई, औरों ने भी दुःख निवारण कराने हैं। अब तुम्हारा काम नहीं होना तो भगवान कहाँ से जवाब दें? झूठ बोलने से तो रहे। सबके सामने अब भी बाल भगवान के लिए पैसे स्वीकार नहीं किए जाते। लेकिन माँ साथ के कमरे में बैठती है। जो कोई उठता है, पंडितजी इशारे से साथ वाले कमरे में जाने के लिए कहते हैं। पंडितायन अब मुटिया गई है, बिल्कुल सेठानियों की तरह, मोटी और सुंदर। पेट की भूख और शरीर की भूख, अब रोज़ मिट जाती है। इसलिए होंठों पर हमेशा एक घातक मुस्कान थिरकती रहती है। सफ़ेद साड़ी के पल्लू से सिर हमेशा ढँका रहता है। भगत या फरियादी जब उनके कमरे में आता है तो सर ऊपर उठाकर उसे देखती है, अपनी घातक मुस्कान का छोटा-सा वार करती है और चढ़ावे की रक़म अपने आप बढ़ जाती है।

    चुनाव कभी भी हो सकते हैं। आजकल टिकट लेने वालों की या टिकट मिलने के भय से त्रस्त छुटके नेताओं की भीड़ अक्सर लगी रहती है। रत्न चौधरी का नाम शुरू से बाल भगवान के चमत्कारों के साथ जुड़ गया है। अलग-अलग पार्टियों के उम्मीदवार पहले उसके घर पहुँचते हैं, उसकी बैठक भी बड़ी है और बाल भगवान के घरवालों पर उसका प्रभाव भी बड़ा है। लेकिन रविवार को तो सब लोगों के सामने टिकटों की बात नहीं की जा सकती। मास्टरजी, पंडित और रत्न चौधरी की गुपचुप मीटिंग होती है। क्या किया जाए? मास्टरजी का ख़याल है कि नेताओं को बुधवार को मिलने दिया जाए। भगवान को हफ़्ते में एक दिन खाने को दिया जाए। कुछ नहीं होगा। भगवान कभी मरते हैं क्या? पंडित उन्हें बताता है कि भगवान बीमार रहते हैं। कई बार बिस्तरे पर ही हग-मूत देते हैं। देखा नहीं, पहाड़ जितना तो पेट है। सारा बिस्तरा भर जाता है। रत्न में अब तक नेताओं वाले सारे गुण गए हैं। ऊँचा नहीं बोलता, गाली नहीं देता, ग़ुस्सा नहीं करता; अब वह आदमी नहीं, नेता है। फिर कल ही वह राजधानी से लौटा है। पंडित को समझाता है—

    देखो पंडितजी, सारी चिंता मुझ पर छोड़ दो। भगवान बीमार रहते हैं तो पहले क्यों नहीं बताया? कल ही शहर के हस्पताल से बड़े डॉक्टर को ले आऊँगा, उसकी बात ख़त्म होते ही नौकर अंदर आता है। स्टील के भरे गिलास सामने रखता है। काँच के गिलासों में अब नहीं पी जाती। अचानक कोई अंदर जाए तो समझेगा कि चाय सुड़की जा रही है। पंडित एक घूँट में गिलास ख़ाली करता है। रतन नौकर को इशारा करता है। वह फिर गिलास भर लाता है। रत्न जानता है, पंडित के मुँह जब ख़ून लगा हो तो चाहे जो मर्ज़ी मनवा लो।

    देखो पंडितजी! मुझे कल राजधानी से बुलावा आया था। एक बड़े मंत्री को जनता वाले, कांग्रेस वाले और लोकदल वाले टिकट देने को तैयार हैं। लेकिन सवाल तो यह है कि कौन-सी पार्टी जीतेगी। उसी का टिकट लेने का फ़ायदा है।

    तो फिर? पंडित ने दूसरा गिलास ख़ाली करके पूछा।

    पंडितजी, बाल भगवान चाहें तो वारे-न्यारे हो जाएँ। कुछ बता दें तो राजधानी में आपको मकान के लिए मुफ़्त प्लॉट दिला दूँगा। लाखों की क़ीमत है। प्लॉट होगा तो मकान भी बन जाएगा।

    मास्टरजी को रत्न की बात कुछ-कुछ समझ आनी शुरू हो गई है। सीधा सवाल पूछते हैं—

    तूने क्या सोचा है रत्न!

    अब आपसे क्या छुपाना? लोकदल और कांग्रेस वाले मुझे टिकट देने को तैयार हैं। लेकिन बाल भगवान की आज्ञा के बिना मैं किसी पार्टी का टिकट कैसे ले सकता हूँ!

    तू तो फिर मंत्री ज़रूर बन जाएगा। पंडित ने तीसरा गिलास ख़ाली करते हुए कहा।

    पंडितजी, चुनाव जीत गया तो दो एकड़ ज़मीन बाल भगवान को भेंट करूँगा। कल ही कचहरी में चलकर पक्के काग़ज़ पर लिखवा लो!

    पंडित जब नशे में होता है तो सही सोचना शुरू कर देता है। किसी जंगली जानवर की तरह उसके दिमाग़ में घात-प्रतिघात की क्रिया शुरू हो जाती है। लड़के को पेट की बीमारी लग गई है, कभी भी मर सकता है।

    राजधानी की चमचमाती सड़कें और ख़ूबसूरत कोठियों ने उसके दिमाग़ पर अभी से क़ब्ज़ा जमा लिया है। चौथे गिलास को वह अनदेखा कर रहा है। मास्टरजी सलाह देते हैं—

    ऐसे करते हैं कि एक महीने के लिए बाल भगवान के दर्शन बंद। अख़बार में रत्न चौधरी ख़बर निकलवा देगा कि भगवान ने समाधि लगा ली है। एक महीने किसी को दर्शन नहीं देंगे। टिकट तो एक महीने में बँट ही जाएँगे।

    पंडित चौथा गिलास गटकता है और उठ खड़ा होता है। रत्न ठीक कहता है। मास्टर ठीक कहता है। यह मौक़ा फिर नहीं आना। अब बीवी को मनवाने के लिए उसके दिमाग़ में घात-प्रतिघात चल पड़े हैं। पहले प्यार से बात करूँगा। नहीं मानेगी तो जूता, हाँ; जूता पीर है बिगड़ों-तिगड़ों का! लेकिन यह ज़रूरी थोड़ा है कि लड़का जो बात मंत्री को बताएगा वह सच ही निकले! फिर कौन देगा राजधानी में प्लॉट और क्यों देगा रत्न दो एकड़ ज़मीन! नहीं। वह ज़मीन के पक्के काग़ज़ रत्न से पहले ही माँगेगा। रही प्लॉट की बात! उसे पता है, किस मंत्री से रत्न को साँठ-गाँठ है। पिछली तीन बार वह चुनाव जीत चुका है, तीनों बार मंत्री बना है, लेकिन मुख्यमंत्री अभी तक नहीं बन सका। और इस बार वह यह सपना हर क़ीमत पर पूरा करके रहेगा। फिर चुनाव से पहले विरोधी दल वाले अक्सर सत्ताधारी दल वालों को ऐसे सब्ज़ बाग़ दिखाते हैं। कैसे मारा था बाबू जगजीवन राम को? बेचारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तो दूर मंत्री भी नहीं रहा। दूध से मक्खी की तरह बाहर छिटक गया!

    रास्ते में पंडित ने लाले की दुकान से दो किलो लड्डू लिए। जेब में पैसे निकालने के लिए हाथ डाला। लेकिन लाले ने दोनों कान पकड़कर कहा, बक्शो पंडितजी! क्यों मुझ पर पाप चढ़ाते हो! बाल भगवान के क़दमों में मेरी भेंट है!

    वह जब घर की तरफ़ बढ़ा तो दिल में संदेह के काँटे उगने शुरू हो गए! क्या सचमुच लड़के में कोई दैवी शक्ति गई हैं? इतने लोग उसे भगवान मान बैठे हैं! कहीं लड़के को उसकी चालों का पता चल गया तो? फिर उसने ज़मीन पर ज़ोर से पैर पटककर शक के इन काँटों को कुचल दिया। अपने आपको गाली निकाली, कुत्ते के! थोड़ी पिएगा तो वाही-तबाही ही सोचेगा। सिद्धड़ कहाँ का भगवान है! बिस्तरे पर ही टट्टी-पेशाब निकल जाता है थू! चला ले जितने दिन चलता है यह खोटा सिक्का!

    घर पहुँचने से पहले ही राजधानी की चम चम करती सड़कें उसके दिमाग़ में फिर घुस आई हैं। बड़े लड़के ने आठवीं पास कर ली है। कल ही रत्न से कहेगा कि मंत्री से कहकर पहले उसे नौकरी दिलाए; तभी भगवान से आगे की बात होगी! एक बार यह बेवक़ूफ़ी-भरी बात उसके दिमाग़ में आती ज़रूर है कि बाल भगवान से पूछकर वह ख़ुद क्यों चुनाव लड़े! थू! वह मुँह से इस बदबू को बाहर थूकता है!

    लड़का खा रहा है। थाली में रोटियों का छोटा-सा पहाड़ बना हुआ है। वह रोटी उठाता है, दो टुकड़े करता है, दोनों हाथों में दो गोल गेंदें बनाता है। एक गेंद मुँह में डालता है, अधचबाया ही उसे अंदर धकेलता है और दूसरी गेंद बनी रोटी मुँह में डाल लेता है। यह डर अब भी उसके दिल में घर करके बैठा हुआ है कि कोई उसकी रोटी चुरा लेगा! पिता के हाथ में उसने बड़ा लिफ़ाफ़ा देख लिया है। कुत्ते की तरह नाक फुलाकर गंध लेने की कोशिश कर रहा है कि क्या है। पिता अंदर से थाली लाता है, लिफ़ाफ़े से आधे लड्डू निकालकर उसमें डालता है और लड़के के आगे रख देता है। लड़का रोटियों की थाली को देख रहा है, लड्डू से भरे थाल को देख रहा है। कहीं कोई रोटियाँ तो नहीं उठा लेगा? पिता उसे कहता है, दोनों खा ले!

    लड़के की आँखों में कुछ समझने का भाव वह देखता है। दोनों थालियाँ उसके बिल्कुल पास सरकाता है, लड्डू! रोटी! दोनों खा ले! लड़का झपाटे से लड्डू उठाता है, पूरा-का-पूरा मुँह में डाल लेता है। फिर रोटी उठाता है, लड्डू को उसमें लपेटता है। मुँह खोलता है। इतना बड़ा गोला अंदर नहीं जा रहा। और ज़ोर लगाता है। अब मुँह किसी गुफ़ा-द्वार जैसा लग रहा है। दूसरे हाथ की उँगलियों से गोले को दबाकर अंदर धकेल रहा है। पिता को उबकाई आती है। मुँह पर हाथ रखता है और अंदर चला जाता है।

    बेटी रसोई में ही बैठी खा रही है। 'लड़के कहाँ हैं' पूछने पर पत्नी बताती है कि शहर गए हैं, नई फ़िल्म देखने। बारह बजे के बाद ही आएँगे। वह बेटी को कहता है—

    जल्दी-जल्दी खा! भाई के कमरे में जाकर सो। उसकी तबीयत ख़राब हो तो आवाज़ देना। बिस्तरा गंदा करे तो मत जगाना। सवेरे साफ़ हो जाएगा। समझी! लड़की हाँ में सिर हिलाती है। उसे पता है, पिता जब जल्दी सो जाने के लिए कहता है तो कुछ होता ज़रूर है। उनके कमरे से माँ की हाय-हाय और सी-सी की आवाज़ें कितनी देर आती रहती हैं। बाप पता नहीं माँ को इतना क्यों मारता है? पिता उसे घूर रहा है। वह और रोटी नहीं माँगती, हालाँकि एक फुल्के की भूख अभी और है। उठकर भाई के कमरे में चली जाती है। बीवी तिरछी मुस्कान फेंकती है—

    रोटी दूँ कि पहले ठर्रा चढ़ाना है? शराब पीने को वह हमेशा ठर्रा चढ़ाना कहती है।

    नहीं। खाना डाल! आज दिल नहीं कर रहा! वह जवाब में पूरी मुस्कान फेंकती है।

    रहने दो। रत्ने मोचे के घर ही काम कर आए हो! मुझे मत बनाया करो। मैं तेरी रग-रग पहचानती हूँ!

    वह बनावटी ग़ुस्से में डाँटता है, “भाषण बंद कर। जल्दी कर। नहीं तो मैं यहीं...।

    अच्छा, अच्छा! चुप हो जाओ। लड़की जागी हुई है। आवाज़ उस कमरे तक पहुँच जाती है। तुम बोलते जो इतने हौले हो!

    वे दोनों बड़ी देर से साथ-साथ लेटे हैं। लेकिन आज पति किसी तरह की नोच-कचोट नहीं कर रहा। बड़े प्यार से उसके जिस्म के हर हिस्से पर हाथ फेर रहा है; इतने हौले जैसे वह काँच की बनी हो। उसे अच्छा तो लग रहा है लेकिन मज़ा नहीं रहा।

    क्यों? आज सोना नहीं क्या? सारी रात ऐसे ही गुज़ारने का इरादा है? उसने पति की बाँह पर धीरे से काटा! पति ने उसके बालों को मुट्ठी में लिया। झटका दिया, और उसका सिर अपनी छाती पर रख लिया। दर्द हुआ, लेकिन मीठी सिसकी में बदलता हुआ। वह अब उसके बालों की जड़ों को खुजला रहा है।

    सुन! राजधानी रहना है? रत्न मुफ़्त प्लॉट दिला देगा!

    रत्ने को क्या आन पड़ी जो हमें प्लॉट दिलाएगा, यह जवाब देते हुए सबसे पहले राजधानी की लकदक करती सड़कों के किनारे लगे गुलमोहर के पेड़ों के सिंदूरी फूल उसकी आँखों में उतर आए। बाल भगवान के प्रताप से बड़े लड़कों को नौकरी तो मिल ही जाएगी। उसे अभी, इसी क्षण अपना गाँव गंदा और बू-भरा लगना शुरू हो गया है। लेकिन जब वह यह बात सुनती हैं कि अब लड़के को लगातार भूखा रखना पड़ेगा तो चुप हो जाती है। सिर उसकी छाती से उठाती है, तकिए पर रख लेती है।

    कुछ नहीं होगा। तू क्यों जी को लगाती है। पहले भी तो भूखा ही रहता था। फिर रत्न कल शहर के बड़े हस्पताल से बड़ा डॉक्टर ले आएगा।

    राजधानी में मकान और बेटे के भूखा रहने में से मकान का चुनाव करने को उसका दिल कह रहा है। पति महसूस करता है कि उसका अकड़ा शरीर ढीला हो रहा है; वह पास सरक आई है। वह उसकी पीठ का मांस अपनी मुट्ठी में भरता है और ज़ोर से मसल देता है। अब वह लगातार उसे चाट रही है, गरमा गई मादा की तरह। पति उसके उभारों में दाँत खुभोता है, वह नशीली आवाज़ में 'और ज़ोर से काटो' कहती है, पति के दाँत मांस में खुभ जाते हैं।

    देखो, लड़कों को भी ताकीद कर दो कि उसे खाने को कुछ नहीं देना। बिल्कुल भूखा रहना चाहिए। वह भूखे पेट ही सच बोलता है!

    अच्छा, अच्छा। आओ न! पत्नी अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए करवट बदलती है। साथ के कमरे से बेटी की आवाज़ आती है।

    माँ। इसने बिस्तर गंदा कर दिया!

    तभी, उसी क्षण उसके दिल में ज़हर का काँटा उग आता है। भगवान ऐसों को संभाल ही ले तो अच्छा। लड़की को कहती है—

    सो जाओ। सुबह साफ़ कर दूँगी।

    नहीं। यहाँ बहुत बदबू है। अभी कर दो।

    पंडित गरजता है—

    ओये कुत्ती दी। बक-बक बंद करती है कि मैं आऊँ फिर। लड़की चुप, लेकिन माँ की तेज़ नाक में तीखी बदबू सरसराकर घुसती रही है। हालाँकि बीच का दरवाज़ा बंद है। पति दूसरी सीढ़ी चढ़ता है। वह उस क्षण बेटे और मकान दोनों में से मकान का चुनाव कर लेती है। बेहोश हो रही आवाज़ में कहती है, “ठीक है। इसका खाना-पीना बंद! तुम फ़िक्र मत करो। लड़कों को मैं अब समझा दूँगा! पति हँफ गई आवाज़ में डपटता है, चुप कुत्ती दी! मुर्दों की तरह क्यों पड़ी है! हिल! ज़ोर से हिल!

    रत्नी अपनी मोटरसाइकिल पर शहर से बड़े डॉक्टर को लाया है। वह बाल भगवान की पूरी जाँच-पड़ताल करता है। पूछता है कि क्या टट्टी में ख़ून आता है। माँ 'हाँ' में सिर हिलाती है। फिर यह भी बताती है कि लड़का सारा दिन खाता रहता है। डॉक्टर को बाल भगवान के चमत्कारी होने का पता है। यह भी पता है कि रत्न की ऊपर तक पहुँच है। उसे बताता है कि लड़के के पेट में फोड़ा है। अलसर। ऑपरेशन जल्दी होना चाहिए। फिर उसे सारा दिन लिटाए मत रखो। ख़ूब घूमने दो। जो रोटी अंदर जाती है, ज़हर बन जाती है। पंडित उसे जवाब देता है—

    भगवान घर से बाहर नहीं जा सकते। जो दवाई देनी है, दो! पिता को पता है कि लड़के को घूमने देगा, दूसरे लड़कों के साथ खेलने देगा तो लोगों का विश्वास उसके भगवान होने से उठ जाएगा। फिर सिद्धड़ है। उल्टा-सुल्टा बाहर बोल देगा तो मिल चुका राजधानी में मुफ़्त मकान! डॉक्टर इस सारे खेल को समझता है। उसका चेहरा तन जाता है। रत्न उसे बाहर आँगन में ले जाता है। बड़े मंत्री वाली बात बताता है। रत्न का बड़े मंत्री से रसूख है, यह सुनते ही डॉक्टर को अगले साल सिविल हस्पताल से ट्रांसफ़र की बात याद जाती है। जो रौब-दाब, माल-मत्ता सिविल हस्पताल में है, सब धरा का धरा रह जाएगा अगर किसी क़स्बे के बड़े हस्पताल में बदली हो गई। फोड़ा महीने में फट भी सकता है। नहीं भी फट सकता। और यह एक महीना अब उसके लिए भी बिल्कुल महत्त्वपूर्ण हो गया है। अंदर आता है, कहता है—

    फ़िक्र की बात नहीं। अभी मैं इलाज शुरू करता हूँ। असर नहीं हुआ तो फिर ऑपरेशन की सोचेंगे। और हाँ, मैं हस्पताल से दवाइयाँ भेज दूँगा। कंपाउंडर सुबह-शाम टीका लगाने जाए करेगा। कोई डर की बात हो तो मुझे बुला भेजें।

    पंडित फीस के पैसे निकालने के लिए जेब में हाथ डालता है—

    पंडितजी! मुझे भी पुन्न कमा लेने दें। बाल भगवान को पहले अच्छा कर लूँ। फिर आपसे लड्डू ज़रूर खाऊँगा!

    लड़के को पाँच दिन से खाने को कुछ नहीं मिला। उसके कमरे में भाइयों का, बहन का, भगतों का, सबका जाना बंद है। पंडित कमरे के बाहर, सर्दियों की धूप में बैठा पहरा देता रहता है। बाहर से गुज़रने वालों को वह हमेशा आँखें बंद किए बैठा दिखाई देता है। बाल भगवान ने समाधि लगाई है। देखो, पिता भी सारा दिन मंतर पढ़ता रहता है। क्यों हो। ब्राह्मण है, हमेशा तप करते हैं। अंदर से थोड़ी-थोड़ी देर के बाद 'रोटी, रोटी, रोटी' शब्द दरवाज़े पर दस्तक देता रहता है। लेकिन लड़के को सिर्फ़ नीबू-पानी दिया जाता है। मास्टरजी ने बतलाया है, गांधीजी तो दो-दो महीने भूख-हड़ताल पर रहे। बस नींबू-पानी पीते थे। देख लो। कुछ हुआ। लक्कड़ की तरह हो गया था जिस्म! रोटी कोई ज़रूरी थोड़े है? बाल भगवान को कुछ नहीं होगा।

    रत्न बता गया है कि आज रात अँधेरा पड़ने पर बड़ा मंत्री आएगा! शायद भगवान आज ही सच बता दें। बस। कल से खाना शुरू!

    बंद दरवाज़े के अंदर से ठक-ठक की आवाज़ आती है। पंडित झटके से उठता है। तो लड़का बिस्तरे से उठकर दरवाज़े तक गया है! रोटी, रोटी, रोटी!

    वह दरवाज़ा खोलता है, लड़के की गर्दन में पंजा डालता है, उसे घसीटकर तख़्तपोश के पास ले जाता है। और गुर्राता है लेट जा! लड़का डर और भूख से काँप रहा है, दोनों उसकी आँखों के रास्ते बाहर निकल रहे हैं। बाहर गली से मास्टरजी की आवाज़ आती है—

    पंडितजी, रत्न के यहाँ चलना है। मंत्रीजी पहुँच गए हैं। चलो, लिवा लाएँ!

    पंडित बाहर जाते हुए जल्दी में बाल भगवान के कमरे का ताला लगाना भूल जाता है। छोटी बहन अंदर आती है। भाई के सिर के पास बैठती है। उसके मांथे पर हाथ रखती है। अँगारों की तरह तप रहा है। तेज़ बुख़ार है। सिर दबाना शुरू कर देती है। भाई उसकी कलाई पकड़ता है। भूख-भरी आँखों से उसे देखता है, मरियल आवाज़ में कहता है, भूख। रोटी!

    बहन को पता है कि घर में क्या हो रहा है। उसे पता है, भाई को इतने दिनों से भूखा रखा जा रहा है। वह फूट-फूटकर रोना शुरू कर देती है। भाई अब भी उसकी ओर लगातार देखे जा रहा है। बहन को उसकी आँखों में रोटियाँ ही रोटियाँ दिखाई देती हैं। पिता मारेगा। राक्षस की तरह मारेगा। लेकिन अभी वह छोटी है। उसका दिल लालच के पास गिरवी नहीं। भागकर रसोई में आती है। अपनी छोटी-सी चुन्नी में रोटियों का ढेर छुपा लाती है।

    “खा ले। जल्दी खा ले। बापू गया तो जान निकाल लेगा!

    लड़का अब पंजों के बल अधबैठा है। बहन रोटियों के टुकड़े करती है और वह चबाता जाता है। बिना सब्ज़ी के रोटियाँ गले में फँस रही हैं। उसका मुँह धीरे चल रहा है।

    जल्दी खाओ! बापू आया कि आया! लड़का डरी-डरी आँखों से दरवाज़े की तरफ़ देखता है, पूरी की पूरी रोटी की गेंद बनाता है, उसे मुँह के अंदर ठेलता है। बहन पानी का गिलास उसके मुँह से लगाती है। वह छोटा घूँट मारता है, गिलास परे ठेलता है। पानी नहीं। रोटी! अब वह दोनों हाथों से रोटियों के टुकड़े-टुकड़े कर रही है, मुँह में हँस रहा है। घर के बाहर पैरों की आवाज़ें आती हैं। बहन उसके आगे से रोटियाँ उठाती है, चुन्नी से उसका मुँह पोंछती है, लिटा देती है और रसोई की तरफ़ भागते हुए कहती है, बताना मत। नहीं तो शामत जाएगी!

    मंत्री, पंडित, मास्टरजी और रत्न अंदर आते हैं। रत्न और मास्टर बाल भगवान के पैरों को माथे से छूते हैं। मंत्री कुछ अतिरिक्त देर तक भगवान के पैरों पर सिर रखे रहता है। उसके चेहरे पर मांस की परत-दर-परत चढ़ी हुई है और चिकनी चमड़ी किसी फिसलन वाली जगह की तरह चमक रही है। वह टोपी उतारकर हाथों में कड़ता है और खादी के छोटे तौलिए से चेहरा साफ़ करता है। उसे गर्मी, सर्दी, हर मौसम में पसीना आता है, अख़बार वाले उसके बारे में यह मुहावरा कभी भी इस्तेमाल नहीं करते कि मंत्री के पसीने छूट गए। भगवान की माँ अंदर आती है, बेटे के सिरहाने बैठ जाती है। उसके सुनहरी सेब चेहरे को देखते ही जाने क्यों मंत्री को पुराने पड़ गए जूते के चमड़े-सा अपनी पत्नी का सूखा-सख़्त चेहरा याद जाता है। उसके बारे में प्रसिद्ध है कि सीधा सवाल पूछता है, सीधा जवाब देता है। विरोधी पक्ष वाले, अख़बार वाले सिर धुनते रह जाते हैं अपने सवालों का जवाब समझने के लिए! पिछले दिनों चुनावों में वह जीता है, दोनों बार मंत्री बनाया गया है; लेकिन मुख्यमंत्री हमेशा उसे मरियल और बाँझ विभाग देता है, शिक्षा या स्वास्थ्य। हालाँकि विरोधी दल के लोगों के किले को तोड़ने-फोड़ने में उसे महारत हासिल है। लेन-देन वही करता है उन्हें दल बदलवाने के लिए। विरोधी दल वालों ने उसका नाम चलता-फिरता बैंक रखा हुआ है! वह बाल भगवान की माँ से कहता है—

    माताजी, आप तो भगवान को लेकर राजधानी जाएँ; जब-जब देश पर कोई संकट आएगा, भगवान से सलाह ले लेंगे। सरकार की तरफ़ से मकान के लिए जगह हम दिलाएँगे।

    देखो। जैसे बाल भगवान की आज्ञा। उसने साड़ी का पल्लू ठीक किया, अपनी तिरछी मुस्कान का वार करते हुए! उसके सुच्चे मोतियों-से दाँत देखकर मंत्री को कीलों से काले अपनी घरवाली के दाँत याद गए।

    जैसे आपकी मर्ज़ी होगी, कोई भगवान की मर्ज़ी अलग थोड़े होगी। हम लोग वहाँ पर मकान बनाने का भी कोई-न-कोई हीला कर लेंगे। बाल भगवान की कृपा हो जाए तो सब काम सिद्ध समझें।

    पंडित को लगता है लड़के का मुँह दो-तीन बार हिला है। कहीं इसे किसी ने कुछ खाने को तो नहीं दिया ? लेकिन किसकी हिम्मत है, वह खड़े-खड़े खाल नहीं खींच लेगा। मंत्री दोनों हाथ जोड़कर भगवान को बताता है—

    चुनाव रहे हैं। जनता जीतेगी, लोकदल जीतेगा या कांग्रेस जीतेगी, मैं किस पार्टी से जीत सकता हूँ? इतना लंबा वाक्य लड़के के दिमाग़ के बाहर ही चक्कर काटता रहा। हाँ 'जीतना' शब्द बंद दिमाग़ के ताले पर खट-खट करता रहा। दिमाग़ से संकेत रहे हैं, शब्द सुना हुआ है, पहले भी किसी ने कहा है। शब्द धीरे-धीरे खिसककर होंठों पर बैठता है। लड़का उसे कसकर पकड़ता है, कहीं फिर फिसल जाए। आवाज़ का धक्का देता है और शब्द बाहर उछल जाता है। वह बोलता है “जीत!” पंडित, मास्टर और रत्न के चेहरों पर गुलाब फूटते हैं। मास्टर मंत्री से कहता है—

    भगवान ने बता दिया। आपकी जीत होगी। मंत्री खेला-खाया हुआ है, इतनी जल्दी तो उसने कभी अपने ऊपर भी विश्वास नहीं किया, मास्टरजी, सवाल मेरे जीतने का नहीं। पार्टी कौन-सी जीतेगी, जिसकी सरकार बनेगी। मास्टरजी उसे समझाते हैं—

    भगवान तो बस एक शब्द में ही जवाब देते हैं। पार्टी चाहे जो जीते। सरकार तो कांग्रेस की ही बनेगी। यह कोई बंगाल तो है नहीं कि जो पार्टी जीते उसी की सरकार बने। मंत्री अब कच्चा चबा जाने वाली आँखों से मास्टर को देख रहा है। यह साले पढ़े-लिखे लोग भी देश का नुक़सान करते हैं। तभी अँग्रेज़ों के वक़्त इतनी पढ़ाई नहीं थी। कैसे शांति से राज करेगा। अनपढ़ का क्या? सरकार ने जो कहा सतवचन। रत्न भाँप जाता है कि मंत्री को बुरा लगा है। विधायक बनने का उसका सपना हिल जाता है। वह मंत्री को सलाह देता है, आप छोटा-सा सवाल करें। भगवान लंबे सवालों का जवाब नहीं देते। इशारों में बात करते हैं। मंत्री अपने चेहरे से ग़ुस्सा उतारता है, उसकी जगह घी के डिब्बे वाली चिकनी मुस्कान चेहरे पर लाता है। हाथ जोड़कर सवाल पूछता है, भगवान! जनता? लोकदल? कांग्रेस अब लड़का बिल्कुल घबरा गया है। बाक़ी लोग तो एक बार उसके बोलने पर उठ जाते हैं, यह आदमी नहीं उठ रहा। ज़रूर इसी ने उसका खाना बंद किया है। वह आँखें बंद कर लेता है। उसका शरीर ज़ोर से काँपता है। पिता तो जानता है, लड़का एक बारी में नए शब्द समझता है, बोल सकता है। वह दुहराता है, जनता? लोकदल? कांग्रेस? तीनों शब्द अब हिंसक पशु का रूप धारण कर लेते हैं, लड़के के दिमाग़ पर एक साथ आक्रमण कर देते हैं। लड़के के सिर में इनके पंजे गड़ जाते हैं। इन्हें परे छिटकाने के लिए वह ज़ोर-ज़ोर से सिर हिलाना शुरू कर देता है लेकिन पंजे मांस में गड़ गए हैं। वह थक जाता है। सिर हिलाना बंद कर देता है। वह मंत्री की ओर देखता है और आँखें मूँद लेता है। थोड़ी देर सब लोग उसके बोलने का इंतज़ार करते हैं। लेकिन वह चुप है, उसकी साँस अब समतल चल रही है। माँ-बाप को पता चल जाता है कि सो गया है। पंडित कहता है, भगवान ने समाधि लगा ली है। अब जवाब नहीं देंगे। आप लोग फिर आएँ। सब उठ पड़ते हैं—मंत्री लड़के की माँ के आगे हड्डी फेंकता है—

    जिस दिन बाल भगवान मुझे सीधी आज्ञा देंगे बस समझ लें, उसी दिन मैं भगवान को राजधानी ले जाऊँगा। जब आप आज्ञा देंगे, फिर जाऊँगा। पंडित उन्हें बाहर तक छोड़ने जाता है। माँ के दिमाग़ से राजधानी की सड़कें और सिंदूरी फूलों के पेड़ बाहर सरकने लग पड़ते हैं। बड़े भाई और छोटी बहन कमरे में जाते हैं। बड़े लड़के के पूछने पर माँ बताती है कि बाल भगवान ने कोई जवाब नहीं दिया। पंडित अंदर आता है। सारे परिवार को उस कमरे में खड़ा देखकर गरजता है, क्यों? तुम सारे यहाँ क्यों खड़े हो? तुम्हारी माँ का नाच हो रहा है क्या? उसकी गरजती आवाज़ सुनकर लड़का आँखें खोल लेता है। पिता उसे शब्द रटाने की कोशिश करता है, बोल जनता! लड़के को पता है कि वह बोलेगा तो रोटी मिलेगी। बड़ा भाई कहता है, बोल जनता। लड़का जवाब देता है, जनता।

    अब बोल लोकदल! लड़के की नाक फूलती है, उसे रोटियों की बास आनी शुरू हो जाती है, वह बोलता है लोकदल। पंडित का, बड़े भाई का, माँ का चेहरा खिल जाता है। पंडित कहता है, “अब बोल कांगरस। छोटी लड़की पिता को कहती है, “बापू कांगरस नहीं कांग्रेस। के पैर में पड़ता है। वह भाई से कहती है, “बोल कांग्रेस। लड़का इस शब्द से कुश्ती करना शुरू कर देता है, लेकिन होंठों पर आना तो दूर, शब्द दिमाग़ के ताले पर खट-खट भी नहीं करता है। उसकी आँखों से आँसू बहने शुरू हो जाते हैं। बड़ा भाई कहता है, बोल कांग्रेस। लड़का जवाब देता है, रोटी। भूख। पिता तेज़ी से रसोई में जाता है। रोटियों का ढेर थाली में रखकर लौटता है, थाली उसकी चारपाई से दूर रख देता है। लड़का उठने की कोशिश करता है। वह किसी डरे हुए कुत्ते की तरह रोटियों को देखता है। आसपास खड़े लोगों को देखता है। वह जीभ से होंठ चाट रहा है।

    बोल कांग्रेस। कांग्रेस। कांग्रेस। सारी रोटियाँ दूँगा। लड्डू दूँगा।

    माँ कहती है, क्यों पीछे पड़े हो उसके। उससे नहीं बोला जाएगा।

    चुप कुत्ती दी! तीनों शब्द इसे रटाने हैं। पक्के याद कराने हैं। अगले हफ़्ते तेरा ख़सम मंत्री फिर आएगा। जब तक इसे यह शब्द याद हुए तो ले लेना मकान राजधानी में।

    बड़ा भाई ग़ुस्से में उसे कहता है, बोल कांग्रेस, कांग्रेस, कांग्रेस।

    लड़के के पेट का फोड़ा हिल रहा है, दिमाग़ का ताला हिल रहा है, सारा शरीर हिल रहा है। अब उसकी जीभ लगातार होंठों को चाट रही है, लपलपा रही है। उसकी सारी इंद्रियाँ, सारा भूख का भय उसके होंठों के आसपास घूम रहा है। वह फिर ज़ोर लगाता है। आवाज़ निकलती है—कांग।

    कांग नहीं कांग्रेस। बोल कांग्रेस, कांग्रेस, कुत्ते दे! बोल कांग्रेस।

    वह माँ की ओर देखता है, पेट का गोला गले की तरफ़ बढ़ रहा है, माँ, रोटी। भूख। वह भागकर लड़के से चिपक जाती है, छोटी बेटी रोटियों का थाल उसे देने के लिए उठाती है। बाप बेटी को लात मारता है, वह गिरती है, छन्न्न की आवाज़ के साथ थाल नीचे गिरता है, रोटियाँ कमरे में बिखर जाती हैं। माँ और कसकर लड़के से चिपक जाती है—

    इसे रोटी खाने दे। तू राक्षस है, राक्षस। तुझे कीड़े पड़ेंगे। पति उसे बालों से पकड़ता है, घसीटकर चारपाई से नीचे फेंकता है। अब वह लड़के के सिर पर खड़ा है। उसकी लाल-लाल आँखें सुलगते अंगारों की तरह लड़के की चमड़ी जला रही हैं। वह गरजता है, बोल कांग्रेस। आज मैं तेरा ख़ून कर दूँगा। बोल कांग्रेस।

    लड़का उठकर बैठ गया। उसका गला फूल गया है। सारी-की-सारी जीवन शक्ति गले में अड़ गई है।

    बाप गरजता है, भाई गरजता है, बोल कांग्रेस।

    लड़का मुँह खोलता है। पेट का गोला और कांग्रेस दोनों उसके होंठों तक आते हैं। वह ज़ोर लगा रहा है। पेट का गोला मुँह में फटता है, वह नीचे गिर जाता है। मुँह किसी काली गुफ़ा के द्वार की तरह खुलता है। फफ-फफ की आवाज़ों के साथ गोला फूटता है। ख़ून की कै होती है। छींटे छिटकते हैं। वह ज़मीन पर गिरा लगातार हाथ-पैर पटक रहा है। रोटी की ओर सरक रहा है। फफ-फफ। दूसरा गोला फूटता है। ख़ून का छोटा-सा दरिया कमरे में फैल रहा है। किसी गर्दन कटे जानवर की तरह वह धीरे-धीरे हिलना बंद कर देता है। उसके खुले मुँह से ख़ून की मोटी-सी लकीर अब भी बाहर बह रही है, कमरे में फैल रही है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 136)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : स्वदेश दीपक
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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