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हिम-श्री को देखा—लगा
जय जय जगमगित जोति, भारत भुवि श्री उदोतिकोटि चंद मंद होत, जग-उजासिनी
श्री अमुक और अमुक कोऐसी और ऐसी एक भेंट देकर
लयि लेउ "पढ़ीसउ" की पाती—श्री महराना परतापसिंह!
फैली खेतों में दूर तलकमखमल की कोमल हरियाली,
(1)जय-जय सदगुन सदन अखिल भारत के प्यारे।
हे हमर सन्तान!बीच तिरहुत मध्य तोहर छौह जन्मस्थान।
'पिता!' सुनते हैं श्री विश्वेश,'जननि?' श्री प्रकृति सुकृति सुखधाम।
श्री इज़्ताक रुबिन से रत्ती-भर ज़्यादा,श्री रॉबर्ट डंकेल
काव्य रसिक श्री श्री बालकृष्ण व्यास महानुभाव सेअभी सुना है
एक सौ आठ पंखुड़ियों वाला एक कमलखिलने लगा पूर्ण रूप से
मैत्रीमयश्री क़िस्मत
अंकित श्रीहनुमानबलधाम
श्री-श्री बाबा के विशाल तंबू के लिएछोड़कर यहाँ घास चरने आ गई है
प्रतेजस-आननालावण्य-श्री मितस्मिता
श्री कैलाशक बाट छै।(2)
अ तुम्हारी आँख के अश्रु कहाँ गएकुछ बोलते क्यों नहीं अ
इकतालीसयह श्री पावन, गृहिणी उदार;
‘जय श्री राम’ पर पहुँचा दिया।
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