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श्री महराना प्रताप सिंह

shri mahrana pratap sinh

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

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श्री महराना प्रताप सिंह

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    परताप सिंह! परताप सिंह!

    ओ, महराना परताप सिंह!

    सिसउँदिया कुलु-भूखन, जग-मग

    मनि, महराना परतापसिंह!

    बूढ़ी महतारी खातिर खिर—

    पिति खायि-खायि का धाक धर्यउ,

    आँचर मा दागु परयि दिह्यउ

    सब राजु-पाटु स्वाहा कीन्ह्यउ।

    तनु- मनु धनु अरपनु कयि दीन्हयउ,

    ओ, महराना परतापसिंह!

    भयिं कउनि-कउनि किरला घर मा,

    तिनका तुम का तनिकउ मान्यउ!

    जङ्गलन पहारन मा बसिकयि ,

    तुम मातु-भूमि का पंहिंचान्यउ

    अंगारुयि अस तुम बरा किह्यउ,

    ओ, महराना परतापसिंह!

    तुम छक्के दिह्यउ छ्वँड़ायि बापुजी—

    कउनि कही किहिंके, तिहिते।

    छत्रापन केरि धजा फहरायउ

    तुम अपने बल-पउरुख ते।

    सिंहन के सिंह रह्यउ स्वामी,

    ओ, महराना परतापसिंह!

    यह छीछाल्यादरि मनइन की,

    तुम कउन्यउ जलमु सहि पउतिउ।

    बिटिया-महतारिन की दुरुगुति ,

    का देखि-देखि का ना करतिउ—

    ग्वहराइ रहे सब, कहाँ गयउ

    तुम महराना परतापसिंह!

    राकस लरिका लयि-लयि भाजयिं,

    पण्डितजी पूजा कीन करयि!

    जब तनुकु ग्वहारि करयिं दुखिया,

    ठाकुर ल्वटिया लयि-लयि भाजयिं!

    आगे तुमते का कही कथा,

    ओ, महराना परतापसिंह!

    तुम आवउ हिरदउँ जागि-जागि,

    मुलु हम जायिति हयि सोयि-सोयि।

    जब जलमु-जयन्ती आवति हयि,

    तब हम आयिति हयि रोयि-रोयि।

    तुम देखि लेउ, तुम सोचि लेउ,

    ओ, महराना परतापसिंह!

    तुमरे तप की बलि बेदी पर,

    का जानी क्यतने पंडित-बर,

    रचि-रुचि कयि हार चढ़ायिनि हयि,

    कबिता के सुंदर फूलन पर!

    लयि लेउ पढ़ीसउ की पाती—

    श्री महराना परतापसिंह!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 87)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

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