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जब सुई की आवाज़ भी ज़ुर्म समझी गई
जब सुई की आवाज़ भी ज़ुर्म समझी गईताली बजाई मैंने बार-बार
मनोज छाबड़ा
किसी आवाज़ की परतों में
अचानक किसी आवाज़ की परतों उतरता चला गयाकछ इस क़दर कि शब्द रह गए वायुमंडल में घुलते हुए