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मुग्ध—ये काली घटा!
तुम्हारी मुग्ध आँखसच्ची चाहत
मुग्ध करता हुआबाल-वृंदों को,
कठपुतलियाँ आह्लादित हैं,दर्शक मुग्ध हैं,
मुग्ध नयनों से हँसकरउसने तुम्हें
पल भरमुग्ध तो हो सकूँगा
मैं देखता मुग्ध मेराप्रेतायित प्रतिरूप
संपदा के द्वारामैं आश्चर्य-मुग्ध होकर
लहलहाती फ़सलों केगर्व में मुग्ध किसान
उसके लुभाने की अदा परमुग्ध मैं।
मुग्ध हम होते रहेंगेकिंतु ओ दादामुनी
कानों ने नहीं—मुग्ध आँखों ने सुना।
जाते हो हथेलियों में मौन मुग्ध!तुम :
साकार होइत देखि कलाकारमुग्ध भऽ रहल अछि
समझ नहीं सकेलिंग के रूप पर मुग्ध
मुग्ध होता हुआकि मैं एक पहाड़ हूँ
मुग्ध समाहित लगनयुग-युग बीतने पर भी
क्यों मुग्ध सदा करते हैं?दंड दो मुझे
मुग्ध पंखुड़ियों से हवा में खिलखिलाकरकह उठा—
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