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काटत हू बितरत बिमल
काटत हू बितरत बिमल, परिमल मलयज-मूल।सींचत हू घृत दूध मधु, सूलहि सृजत बबूल॥
अर्जुनदास केडिया
सुन्दर बिष हू पीजिये
सुन्दर बिष हू पीजिये, मरिये खाई अफीम।दुर्जन संग न कीजिये, गलि मरिये पुनि हीम॥
सुंदरदास
निज प्रतिबिंबन में दुरी
निज प्रतिबिंबन में दुरी, मुकुर धाम सुखदानि।लई तुरत ही भावते, तन सुवास पहिचान॥
बैरीसाल
प्रेम प्रभू हू तें प्रथू
प्रेम प्रभू हू तें प्रथू, बिबुध बिचारी लेहु।कपि सकंध रघुनाथ लिय, सीस चढ़ाय सनेहु॥
दयाराम
छुटै न संपति बिपति हू
छुटै न संपति बिपति हू, ऊँचे जन को संग।बसन फटेहु ना छुटै, ज्यों मजीठ को रंग॥
भूपति
होत निरगुनी हू गुनी
होत निरगुनी हू गुनी, बसे गुनी के पास।करत लुएँ खस सलिलमय, सीतल, सुखद, सुबास॥
दुलारेलाल भार्गव
पति के जीवन निधन हू
पति के जीवन निधन हू, पति अनिरुचत काम।करति न सो जग जस लहति, पावति गति अभिराम॥
रत्नावली
आगि जो लागि समुद्र में
आगि जो लागि समुद्र में, धुवाँ न परगट होय।की जाने जो जरि मुवा, की जाकी लाई होय॥
कबीर
अनहित हू जो जगत को
अनहित हू जो जगत को, दुर्जन बृश्चिक ब्याल।तजत न, तो हित क्यों तजै, संतत संत दयाल॥
अर्जुनदास केडिया
महा असिव हू सिव भयौ
महा असिव हू सिव भयौ, जाहि सीस पै धारि।छुअत न तासु सहोदरन, रे द्विज! कहा बिचारि॥
वियोगी हरि
मन हस्ती मा चढ़त है
मन हस्ती मा चढ़त है, करमन टट्टू होय।नरक परै की विधि करै, मुकुति कहाँ ते होय॥
मीतादास
रूवि पयंगा सद्दि मय
रूवि पयंगा सद्दि मय, गय फांसहि णासंति।अलि-उल गंधहि मच्छ रसि, किमि अणुराउ करंति॥
जोइंदु
मैं ना सखी निहारिहौं
मैं ना सखी निहारिहौं, इन नैनन ब्रज-चंद।मम हिय अति डरपत सदा, फँसि जैहौं छलछंद॥
मोहन
भोली मुन्धि मा गब्बु करि
भोली मुन्धि मा गब्बु करि, पिक्खिवि पडरूवाइँ।चउदह-सइ छहुत्तरइँ, मुंजह गयह गयाइँ॥