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जीव बिना जिव बाँचे नहीं
जीव बिना जिव बाँचे नहीं, जिव का जीव उधार।जीव दया करि पालिये, पंडित करो विचार॥
कबीर
देह जीव यौं मिली रहै
देह जीव यौं मिली रहै, ज्यौं पांणी अरू लौंन।बार न लाई बिछुरतें, सुन्दर कीयौ गौंन॥
सुंदरदास
अखिल लोक के जीव हैं
अखिल लोक के जीव हैं, जु तिन को जीवन जल।सकल सिद्धि अरु रिद्धि जानि, जीवन जु भक्ति-फल॥
चतुर्भुजदास
जीव ब्रह्म सेवा करै
जीव ब्रह्म सेवा करै, ब्रह्म बराबरि होइ।दादू जाणै ब्रह्म कौं, ब्रह्म सरीखा सोइ॥
दादू दयाल
सुन्दर सूता जीव है
सुन्दर सूता जीव है, जाग्या ब्रह्म स्वरुप।जागन सोवन तें परै, सद्गुरु कह्या अनूप॥
सुंदरदास
सतगुर दाता जीव का
सतगुर दाता जीव का, स्रवन सीस कर नैन।तन मन सौँज सँवारि सब, मुख रसना अरु बैन॥
दादू दयाल
तब लगि कुसल न जीव कहुँ
तब लगि कुसल न जीव कहुँ, सपनेहुँ मन बिश्राम।जब लगि भजत न राम कहुँ, सोक धाम तजि काम॥
तुलसीदास
ब्रह्म जीव अर जगत में
ब्रह्म जीव अर जगत में, भेद न जाण्यो कोय।पीपा राम मिलियाँ पछे, सगलो भरम नसोय॥
संत पीपा
जाव भलै जरि जरति जो
जाव भलै जरि, जरति जो, उरध उसाँसनि देह।चिरजावौ तनु रमतु जो, प्रलय-अनलु कै गेह॥
वियोगी हरि
जीव जले विरह अग्नि में
जीव जले विरह अग्नि में, क्यों कर सीतल होय।बिन बरषा पिया बचन के, गई तरावत खोय॥