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रामावर आराम में
रामावर आराम में, लखी परम अभिराम।भो हराम आराम सब, परो राम सों काम॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
सरस-सरस बरसत सलिल
सरस-सरस बरसत सलिल, तरस-तरस रहि बाम।झरस-झरस बिरहागि सों, बरस-बरस भे जाम॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
अद्भुत डोरी प्रेम की
अद्भुत डोरी प्रेम की, जामें बाँधे दोय।ज्यों-ज्यों दूर सिधारिये,त्यों-त्यों लाँबी होय॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
सुनि सुनि नवला रूप गुन
सुनि-सुनि नवला रूप गुन, करि दरसन अभिलास।सुर दारा छित जोवहीं, करि-करि गगन प्रकास॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
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एमन सोरठ देस हमीर
एमन सोरठ देस हमीर, बहार बिहाग मलार रसीली।शंकरा सोहनी भैरव भैरवी, गुजरी रामकली सरसीली॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
लखि कोमल आँगुरी नागरी की
लखि कोमल आँगुरी नागरी की, अति आगरी तार बजावन में।अनुमान रचै मन पूरन को, उपमान की खोज लगावन में॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
करिके सुर तालन को बिसतार
करिके सुर तालन को बिसतार, सितार प्रवीण बजावती है।परिपूरन राग हू के मन में, अनुराग अपार जगावती है॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
मन खेंचत तार के खेंचत ही
मन खेंचत तार के खेंचत ही, उमहै जब जोड़ बजावन में।उमगैं मधुरे सुर की लहरी, गहरी गमकै दरसावन में॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
द्रुग सौंहैं सितार के मोहैं मनै
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
शरद निशा में व्योम लखि के
शरद निशा में व्योम लखि के मयंक बिन,पूरन हिये में इमि कारन बिचारे हैं।
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
प्रिय सुकुमारि कुमारि हित
प्रिय सुकुमारि कुमारि हित, भय मय तिमिर बिचार।प्रेम विवश देवांगना, करहिं जगत उजियार॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
माता के समान पर पतनी बिचारी नहीं
माता के समान पर पतनी बिचारी नहीं,रहे सदा परधन लेन ही के ध्यानन में।
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
मनुष्य पूर्ण नहीं है
रवींद्रनाथ टैगोर
सारंग झरि सारंग रव
सारंग झरि सारंग रव, सुखद स्याम सारंग।विहरत बर सारंग मिलि, सरसत बरसा रंग॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
तिय तन लखि मोहित तड़ित
तिय तन लखि मोहित तड़ित, गति अद्भुत लखि जात।बार-बार लखि तिय छटा, छन प्रकाश रहि जात॥
राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
पूर्ण सत्य और पूर्ण अहिंसा में भेद नहीं है
महात्मा गांधी
उर प्रेम की जोति जगाय रही
उर प्रेम की जोति जगाय रही, मति को बिन यास घुमाय रही।रस की बरसात लगाय रही, हिय पाहन से पिघलाय रही॥




