दानी बड़े तिहुँ लोकन में

नरोत्तमदास

दानी बड़े तिहुँ लोकन में

नरोत्तमदास

और अधिकनरोत्तमदास

    दानी बड़े तिहुँ लोकन में, जग जीवत नाम सदा जिनको लै।

    दीनन की सुधि लेत भली विधि, सिद्धि करौ पिय मेरो मतो लै॥

    दीनदयाल के द्वार जात सो, और के द्वार पै दीन ह्वै बोलै।

    श्रीजदुनाथ-से जाके हितू, सो तिहूं पन क्यों कन माँगत डोलै॥

    सुदामा की पत्नी सुबुद्धि कहने लगी कि द्वारिकापति श्री-कृष्ण तीनों लोकों के महादानी हैं। संसार उनका नाम स्मरण करके ही जीवित है। वे दीनबंधु हैं। हे नाथ! मेरे विचार से आप शीघ्र ही द्वारिका के लिए प्रस्थान कीजिए। जो प्रभु के द्वार पर जाकर अपने दुःखों के निवारण की प्रार्थना नहीं करते हैं, उन्हें साधारण लोगों के द्वार पर जाकर, दीन बनकर भिक्षा माँगनी पड़ती है। भगवान श्रीकृष्ण जिनके मित्र हों, वह भला क्यों इस बुढ़ापे में द्वार-द्वार भीख माँगता फिरे? अर्थात् आपको द्वार-द्वार भीख नहीं माँगनी चाहिए। श्रीकृष्ण से सहायता लेने में आपको संकोच करने की आवश्यकता नहीं है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सुदामा-चरित (पृष्ठ 40)
    • संपादक : मोहनलाल 'रत्नाकार'
    • रचनाकार : नरोत्तमदास
    • प्रकाशन : ऋषभरचण जैन एवं सन्तति, नई दिल्ली-2

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