दो कौड़ी का सेना नाई

सैन भगत

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    दो कौड़ी का सेना नाई, सतगुरु कृपा करी।

    ना कोई ठौर ठिकानो पूरो, ना कोई धिरत धरी।

    मन निरमल चित्त ऊजल राख्यो, आँख नहीं उघरी॥

    सतगुरु साहिब आँख उघारी, धीर हुई सबरी।

    सूधी वाट लगाई सतगुरु, रिदै हुई खबरी॥

    रामानंद गुरु पूरा मिलिया, सिवजी की नगरी।

    दास कबीरा पीपा धन्ना ने, झट अँगुरी पकरी॥

    रैदास की छपरी बैठ्यो, संगत खूब करी।

    साहिब के दरबार नी पाँच्यो, हेर बड़ी सकरी॥

    पीपा ने सति सीता के संग, मुझ पे कृपा करी।

    सीता सति जी सरग सिधार्या, टोड़ा में छतरी॥

    सति सीता की करी परकमा, सरधा अरज करी।

    सयना जतरी संगत लिखी, सन्त नेम गुजरी॥

    कर परनाम छोड़ दियो, सिद्ध टोड़ा को धाम।

    सत संगत करता चल्या, मारग गामो गाम॥

    छै मइना में पौंच्या, गागरोन सुखधाम।

    आहू-काली सिंध के, संगम कर्या मुकाम॥

    पीपा के संग गागरोन में, संगत खूब करी।

    पाँच बरस मुक्काम लगायो, रसना राम सरी॥

    सबद-सबद सत संगत होई, कही-सुणी सब री।

    ना कोई लेणो ना कोई देणो, मेहर बड़ी रब री॥

    संगम की खोह ताड़ी लागी, पीपे देह छरी।

    मिल्यो पौन में पौन देह, धरती पे रही धरी॥

    साठ घड़ी तईं हिरदै भीतर, व्यापी बे सबरी।

    रहूँ मुकामी कै चल जाऊँ, सत संगत बिगरी॥

    आँख मूँद ने सतगुरु ध्यायो, आरत विनय करी।

    सयना सतगुरु परचो दीयो, दुवधा विपद हरी॥

    साधू तो चलता भला, बहता सुच्चा नीर।

    सयना माया मोह तजे, साधू संत फकीर॥

    ठाँव ठौर मुकाम को, छूट गयो सब मोह।

    सयना सतगुरु की क्रपा, रह्यो नहीं कोई भोह॥

    राम धर्या घट भीतरा, सुमरूँ साँस उसाँस।

    सयना झोलो खाँद के, हाथाँ धर्या बाँस॥

    सरधा राखी हिरदा भीतर, सतगुरु साख भरी।

    धोग लगाई साध समाधी, ऊबी वाट पकरी॥

    साँत सुवानी मालव माटी, चीतूँ घरी-घरी।

    पाकी उमर सितत्तर होई, देह हुई जजरी॥

    सयना भगत सतगुरु चरणा में, सुरती लाग परी।

    अंत समै में दरसन दीजो, सतगुरु हाम भरी॥

    दो कौड़ी को सेना नाई, सद्गुरु कृपा करी।

    कै सद्गुरु कै साहिब दाता, जामिन ले उतरी॥

    सैना नाई की कोई हैसियत नहीं थी। दो कौड़ी क़ीमत भी नहीं थी। सद्गुरू ने मुझ पर अपार कृपा कर दी। वे धन्य हैं। तो मेरे पास कोई ठौर-ठिकाना और ही धैर्य था। यद्यपि मेरा मन और चित्त निर्मल प्रभु में तल्लीन थे, फिर भी आँखें बंद थी। अज्ञान छाया था। सतगुरु ने ज्ञान प्रदान किया, धैर्य और सबूरी प्राप्त हुई। सतगुरु ने सीधी वाट दिखा दी। हृदय में भाव हो गया। सारी ख़बर हो गई। मुझे पूरे गुरू के रूप में रामानन्द जी मिल गए हैं। उनके दर्शन शिवजी की नगरी (काशी) में हुए। दास कबीर, पीपाजी, धन्ना भगत ने झट मुझे विश्वास दिया और मुझे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। मैंने संत रैदास की कुटिया में बैठकर ख़ूब सत्संग किया। तब भी मैं साहिब के दरबार तक नहीं पहुँच पाया। ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बहुत जटिल और गली बहुत संकड़ी है। उसमें प्रवेश बहुत कठिन है। संत पीपाजी ने मुझ पर बहुत कृपा की। वैसी ही कृपा सती सीता जी ने भी मुझ पर रखी। टोड़ा में सती सीताजी स्वर्ग सिधार गई। वहीं उनकी समाधि बनी। छतरी बनी। संत पीपाजी और मैंने सती सीताजी की समाधि की परिक्रमा की और विनती की कि जितनी संगत विधि ने लिखी थी। उतनी सत्य और नियम द्वारा व्यतीत हो गई। अब विदा। सती सीताजी की समाधि को प्रणाम कर टोड़ा का सिद्ध धाम त्याग दिया। छह महीनों में गाँव-गाँव सत्संग करते हम गागरोन के सुखधाम पहुँचे। आहू और कालीसिंध नदी के संगम पर मुकाम हुआ। मैंने पाँच बरस तक वहाँ संत पीपाजी के साथ मुकाम लगाया। वहीं राम रस से रसना तृप्त हुई। वहाँ शब्द-शब्द ख़ूब सत्संग होने लगा। ख़ूब कही और सबकी ख़ूब सुनी। यहाँ मन को बहुत शाँति मिली। किसी से लेना देना। अपनी मौज में राम भजन करना और सत्संग करना। रब की बहुत कृपा बनी रही। संगम की गुफा में संत पीपाजी ने समाधि लगाकर प्राणों का त्याग कर दिया। पवन-पवन में मिल गया। देह धरती पर धरी रह गई। संत पीपाजी के महाप्रयाण के बाद साठ घड़ी तक मन व्याकुल रहा। मन में बेसब्री का भाव बना रहा। व्याकुलता यह थी कि मैं अब यहीं मुकाम रखूँ अथवा गागरोन त्याग कर चल पड़ूँ? कुछ तय नहीं कर पा रहा था। मन में अनिश्चय का भाव था। इसी बात की बेसब्री थी। सत्संग बिगड़ गया था। मैंने आँखें मूँदकर सतगुरु जी का ध्यान लगाया। सतगुरु जी से विनय कर आर्तस्वर में उन्हें पुकारा। गुरु जी ने मेरी आर्त पुकार सुन ली और परचा दिया। सारी दुविधा की विपत्ति को दूर कर दिया। गुरु ने बोध करवाया कि साधू चलायमान ही अच्छा लगता है। जल बहता हुआ ही निर्मल रहता है। साधू, संत, फ़क़ीर कभी स्थान विशेष का मोह या माया बंधन नहीं मानते। उनके लिए सारी धरती उनका मुकाम है। सतगुरु जी के प्रबोधन से ठाँव-ठौर और मुकाम का मोह छूट गया। सतगुरु की कृपा से सारी चिंताएँ दूर हो गईं। मैंने राम प्रभु को हृदय में धारण किया। साँसों में नाम को धारण किया। झोले को कंधे पर धारण किया तथा बाँस को हाथों में धारण कर प्रस्थान के लिए तत्पर हो गया। मन में सतगुरु साहिब के प्रति तथा संत पीपा जी के प्रति श्रद्धा धारण कर संत पीपाजी की समाधि को धोक लगाकर खड़ी राह पकड़ ली। कहाँ जाना है... किधर जाना है, कुछ तय नहीं किया। मालवा की पुण्यभूमि बहुत सुहानी शांत है। मुझे यह बात बार-बार याद रहती है। मेरी उम्र पक चुकी है। सतहत्तर वर्ष की उम्र के कारण देह भी जर्जर हो गई है। सैन कहते हैं—अब तो सतगुरु के चरणों की सुरति लग गई है। साहिब ने हामी भर ली है। इस दो कौड़ी के सैना नाई पर सतगुरु साहिब ने बहुत कृपा की है। इतनी जामनी (जमानत) तो केवल सतगुरु और साहिब (ईश्वर) ही दे सकते हैं। साधौ भाई! गुरू दर्शन की इच्छा प्रबल है। लय लग गई है। देह थक चुकी है। पंथ लंबा है। हृदय की सुरति जागृत है। मन-चित्त गुरू चरणों में लग चुका है। मार्ग का भय समाप्त हो गया है। अब तो मेरा कोई पुत्र है, बेटा, रिश्ते-नातेदार, कोई अनुरागी मित्र। सबका मोह त्याग दिया है। वर्षों पहले सबके मोह से मुक्त हो चुका हूँ। मन बैरागी बन चुका है। संसार के सभी जीव मेरे सगे हैं। यह धरती ही मेरा घर परिवार है। मेरा स्वामी तो अब केवल साहिब है। सैना बहुत भाग्यशाली है। सैन कहते हैं—घट में राम बिराजते हैं। सब मोह-माया त्याग दी है। अंत समय सतगुरु के दर्शन हो जाएँ, यही इच्छा है। तभी सैना का भाग्य सत्य होगा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : संत सैन भगत (पृष्ठ 318)
    • संपादक : अशोेक मिश्र
    • रचनाकार : संत सैन भगत
    • प्रकाशन : आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश
    • संस्करण : 2013

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