यज्ञ करने और करानेवालों का यही उद्देश्य है कि वही पिछड़ी हुई रुग्ण मानसिकता बनी रहे, जिससे वर्ण और वर्ग-भेद बने रहें। वही मानसिकता बनी रहे कि हरिजन दूल्हा घोड़े पर बैठे, तो ऊँची जाति के लोग भड़ककर कहें—'देखो इस ‘चमरे’ की हिम्मत, हमारे सामने घोड़े पर बैठता है।'