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महादेवी वर्मा के उद्धरण

यदि समाज की परिभाषा ऐसा मनुष्य-समूह हो; जो पारस्परिक सहयोगापेक्षी है, तो उस समाज से व्यक्ति का नितांत स्वतंत्र होना—किसी युग में भी संभव नहीं हो सका है।