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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

यदि कोरा वैचित्र्य या चमत्कार है; तो थोड़ी देर के लिए कुछ कुतूहल या मनबहलाव चाहे हो जाए, पर काव्य की लीन करनेवाली सरसता न पाई जाएगी। केवल कुतूहल तो बालवृत्ति है। कविता सुनना और तमाशा देखना एक ही बात नहीं है।