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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

यदि कोई अज्ञात रहकर; किसी की ठीक समय पर आपत्ति से रक्षा करता चला जाए, तो उसके प्रति जो कृतज्ञता या पूज्य बुद्धि होगी, उसकी अनुभूति कुतूहलमिश्रित होकर बड़ी ही अनूठी होगी।