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रामधारी सिंह दिनकर के उद्धरण

व्यक्तित्व उस मनुष्य में उजागर होता है, जो सहज रूप से धारा में तैर रहा है। जो आदमी पानी के बीच चट्टान देखकर तैरना छोड़कर वहाँ बैठ गया, उसने मानो व्यक्तित्व गँवाकर चरित्र का वरण कर लिया है।