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दुर्गा भागवत के उद्धरण

वैसे तो भारतीय तथा विश्व के सभी विचारकों को हास्य-व्यंग्य से परहेज ही रहा है, लेकिन विचारकों में अपवाद रहे सिर्फ़ कन्फ़्यूशियस। उन्होंने कहा था कि जो हास्य-व्यंग्य नहीं समझता, वह संत नहीं बन सकता।

अनुवाद : वासंतिका पुणतांबेकर