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नामवर सिंह के उद्धरण

तुलसीदास कहते हैं ‘कबहूँ हौं यहि रहनि रहौंगो’— यह जो रहनि है, इसे ही कल्वर कहते हैं। यह रहनि यह नहीं है कि कैसे रहेंगे। यह नित्यकर्म करना नहीं है।