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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

तुलसी की प्रतिभा सर्वतोमुखी है और सूर की एकमुखी। पर एकमुखी होकर उसने अपनी दिशा में जितनी दूर तक की दौड़ लगाई है, उतनी दूर तक की तुलसी ने भी नहीं और किसी कवि की तो बात ही क्या है।