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महादेवी वर्मा के उद्धरण

स्त्री के विकास की चरम सीमा उसके मातृत्व में हो सकती है, परंतु यह कर्त्तव्य उसे अपनी मानसिक तथा शारीरिक शक्तियों को तोल कर स्वेच्छा से स्वीकार करना चाहिए—परवश होकर नहीं। कोई अन्य मार्ग न होने पर, बाध्य होकर जो स्वीकार किया जाता है—वह कर्तव्य नहीं कहा जा सकता।