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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

शुद्ध वियोग का दुःख; केवल प्रिय के अलग हो जाने की भावना से उत्पन्न क्षोभ या विषाद है, जिसमें प्रिय के दुःख या कष्ट आदि की कोई भावना नहीं रहती।