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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

शारीरिक अनुभूति जिस प्रकार तीव्र-सघन होकर अशारीरिक बनती है, उसी प्रकार भावजगत की तीव्र अनुभूति भी सघन होकर शारीरिकता में पर्यवसित होती है।