सवेरे से ही मैं अपने संसार के बारे में सोचना प्रांरभ कर देता हूँ, क्योंकि यह मेरा संसार जो है—मेरी इच्छा ही इस संसार का केंद्र है। मैं क्या चाहता हूँ, क्या नहीं चाहता, मैं किसे रखूँगा, किसे छोड़ दूँगा—इन्हीं सब बातों को बीच में रखकर मेरा संसार है।
अनुवाद :
रामशंकर द्विवेदी