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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

संगीत में स्वरमाला सात राजाओं के धन की तरह सिर्फ़ सात होती हैं, किंतु सत्ताईस लाख से भी अधिक रूप पाकर वे सातों सुर झलक मारने लगते हैं, गुणी के कंठ में सतलड़ी हार होकर।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी