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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

समाज और व्यक्ति की भीतरी आत्म-संगति में; बहुविध दरारों और दोषों के तीव्र संवेदनात्मक बोध को लेकर चलनेवाला व्यक्ति, यदि वैज्ञानिक रूप से सिद्ध समाधानों को संवेदनात्मक स्तर पर धारण कर न चले, तो अन्ततः उसे मात्र काल्पनिक आत्म-संगीत या विश्व-संगीत को लेकर ही तो आना होगा।