स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण
साक्षात्कार ही वास्तविक धर्म है, बाकी सब तो केवल तैयारी है। व्याख्यान सुनना, किताबें पढ़ना या तर्क करना—मात्र आधार तैयार करना है, यह धर्म नहीं है।
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