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कुँवर नारायण के उद्धरण

साहित्यकार की दृष्टि केवल तत्काल पर ही नहीं रहती; क्योंकि वह केवल 'नया' कुछ ही नहीं, 'स्थायी' कुछ भी रचना चाहता है।