Font by Mehr Nastaliq Web

विनोबा भावे के उद्धरण

साहित्य सर्वजनों के बजाए विशिष्टजनों के लिए ही हो गया, तो वह कोई साहित्य की प्रगति नहीं, संकुचितता ही मानी जाएगी।