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लीलाधर जगूड़ी के उद्धरण

साहित्य की जटिलता, ढाँचे और प्रभाव; दोनों स्तरों पर शुरू से ही मौजूद रही है, इसीलिए ख़ासकर कविता की समझदारी के लिए, अपने भीतर 'शीघ्र बोध' भी पैदा करने का ज्ञानात्मक अभ्यास विकसित करना पड़ता है। सरलीकरण और अतिरंजना से तभी छुटकारा पाया जा सकता है।