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अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण

रूप और रंग, वाणी और अर्थ की तरह एक-दूसरे से संयुक्त हैं––यह तो पुरानी बात है, किंतु नए युग में भी कलाकार अगर इस बात को समझते हुए नहीं चलेंगे तब तो भारी विपत्ति होगी––यह कहने में कोई हर्ज नहीं है।

अनुवाद : रामशंकर द्विवेदी