कुबेरनाथ राय के उद्धरण
रोज़-रोज़ एक ही रूप, एक ही स्पर्श, एक ही गंध, एक ही स्वाद, एक ही पीड़ारस? मुझे लगता है कि आस्वादन को ही नजरबंद की दिया गया है।
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