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कृष्ण कुमार के उद्धरण

राष्ट्र-निर्माण का काम जारी है, पर आज यह काम भाषा के कोमल आकर्षण से कहीं ज़्यादा बलशाली, धर्म और शत्रुता जैसे आवेगों की राजनीति कर रही है।