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राधावल्लभ त्रिपाठी के उद्धरण

साहित्य के संसार में; साकार वृत्त के संकीर्ण दायरे कितनी ही बार समर्थकवि जनों ने तोड़े, तोड़ कर नये वृत्त गढ़े, इन सारे विखंडन और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में वे साकार से निराकार तक पहुँचे।