प्रियतम के लिए कुछ करने की इच्छा नहीं होती, तथापि ख़ूब प्रेम करता हूँ—यह बात जैसी है और सोने की पीतल से बने पंडूक की बात भी वैसी है। स्वार्थबुद्धि ही प्रायः वैसा प्रेम करती है, इसीलिए वैसे निष्काम धर्माक्रांत प्रेम को देखकर सावधान होना अच्छा है, नहीं तो विपदा की संभावना ही अधिक है।
अनुवाद :
श्रीरामनंदन प्रसाद