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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के उद्धरण

प्रेमी प्रिय के स्वरूप को जितना जाने रहता है, उतने में मग्न होकर भी उसको और जानने के लिए बीच-बीच में उत्कंठित होता रहता है।