जब साहित्य पर संसार की नश्वरता का रंग चढ़ा हो, और उसका एक-एक शब्द नैराश्य में डूबा हो, समय की प्रतिकूलता के रोने से भरा हो और श्रृंगारिक भावों का प्रतिबिम्ब बन गया हो, तो समझ लीजिये कि जाति जड़ता और ह्रास के पंजे में फंस चुकी है और उसमें उद्योग तथा संघर्ष का बल बाकी नहीं रहा; उसने ऊँचे लक्ष्यों की ओर से आँखें बन्द कर ली हैं, और उसमें से दुनिया को देखने-समझने की शक्ति लुप्त हो गई है।