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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

प्रेम दो समान व्यक्तियों का हृदय व्यापार है—खिलानेवाला और खानेवाली, जेवर बनवाने और जेवर पहननेवाली का व्यापार नहीं।