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भर्तृहरि के उद्धरण

फूलों के गुच्छों के समान स्वाभिमानी मनस्वी पुरुषों की भी दो तरह की स्थिति होती है, या तो समाज में सर्वोपरि स्थान प्राप्त करते हैं, या समाज से दूर रहकर एकांत में अपना जीवन व्यतीत करते हैं।