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श्याम मनोहर के उद्धरण

परंपरा वही होती है, जिसमें व्यक्ति और समाज के भीतर कला, शास्त्र, दर्शन आदि के गहन प्रश्नों के बारे में कौतूहल कार्यरत होता है।

अनुवाद : निशिकांत ठकार