अवनींद्रनाथ ठाकुर के उद्धरण
मुख से कहे हुए शब्द कोई-न-कोई रूप रखकर आते हैं, काग, बक् कहने के साथ-ही-साथ काले और सफ़ेद दोनों पक्षी आकर हमारे सामने हाज़िर हो जाते हैं!
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