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विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण

मीरा की रचनाओं में लोक-लाज, कुल को तोड़ने की बात बहुत बार आई है। यह अकारण नहीं, यह उस बंधनग्रस्त मध्यकालीन स्त्रीमन की अभिव्यक्ति है, जिसके विषय में तुलसी ने लिखा था—'विधाता ने नारी को क्यों सिरजा, उस पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता।'